श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1708, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/244-247 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
स्वांशके प्रधानतः दो रूप-(1) प्रकृतिके अधिष्ठाता
चालक, (2) साधुओंके पालक और असाधुओंके
विनाशक रूपमें अनेक अवतार :-
सङ्कर्षण, मत्स्यादिक,–दुइ भेद ताँर।
सङ्कर्षण—पुरुषावतार, मत्स्यादि—अवतार ॥ 244 ॥
अनुवाद–स्वांशके दो भेद हैं-पहला सङ्कर्षण और
दूसरा मत्स्यादि अवतार। सङ्कर्षणसे पुरुषावतार प्रकाशित
होते हैं और मत्स्यादि अवतार विभिन्न युगोंमें अनेक
लीलाएँ करते हैं॥ 244 ॥
छः प्रकारके अवतार :-
अवतार हय कृष्णेर षड्विध प्रकार।
पुरुषावतार एक, लीलावतार आर ॥ 245 ॥
गुणावतार, आर मन्वन्तरावतार।
युगावतार, आर शक्त्यावेशावतार ॥ 246 ॥
अनुवाद–श्रीकृष्णके अवतार छः प्रकारके होते हैं।
पुरुषावतार, लीलावतार, गुणावतार, मन्वन्तरावतार, युगावतार
और शक्त्यावेशावतार—ये छः प्रकारके होते हैं॥ 245-246 ॥
अनुभाष्य–'पुरुषावतार'—महासङ्कर्षणसे कारणोदकशायी
(भाः 11/4/3), गर्भोदकशायी (भाः 1/3/2-3) और
क्षीरोदकशायी (भाः 1/18/21, 2/2/8, 2/8/16, 10/88/5)—ये
तीन मूर्तियाँ प्रकाशित होती हैं।
'लीलावतार'—(भाः प्रथम स्कन्ध तृतीय अध्याय
देखें) 1) चतुःसन, 2) नारद, 3) वराह, 4) मत्स्य,
5) यज्ञ, 6) नर-नारायण, 7) कर्दम ऋषिके पुत्र
कपिल, 8) दत्त (आत्रेय-भाः 2/7/4), 9) हयशीर्षा
(भाः 2/7/11), 10) हंस (भाः 2/7/19), 11) ध्रुवप्रिय
अथवा पृश्निगर्भ (भाः 2/7/8), 12) ऋषभ, 13) पृथु,
14) नृसिंह, 15) कूर्म, 16) धन्वन्तरि, 17) मोहिनी,
18) वामन, 19) भार्गव परशुराम, 20) राघवेन्द्र,
21) व्यास, 22) प्रलम्बारि बलराम, 23) कृष्ण,
24) बुद्ध, 25) कल्कि—ये पच्चीस मूर्तियाँ लीलावतार
हैं। ये प्रायः प्रतिकल्पमें ही (ब्रह्माके एक दिनका नाम
ही एक 'कल्प' है) आविर्भूत होनेके कारण
'कल्पावतार'-नामसे भी जाने जाते हैं। इनमें 'हंस' और
'मोहिनी'—प्राभावावस्थ अवतार अस्थायी और अल्प
प्रसिद्धिवाले हैं। कपिल, दत्तात्रेय, ऋषभ, धन्वन्तरि और
व्यास,–ये पाँच मूर्तियाँ चिरस्थायी और विस्तृत कीर्ति
एवं मुनियोंके रूपमें प्राभावावस्थ अवतार हैं। और कूर्म,
मत्स्य, श्रीनारायण, वराह, हयग्रीव, पृश्निगर्भ और
प्रलम्बासुरनाशक बलदेव-ये वैभवावस्थ अवतार हैं।
'गुणावतार'-ब्रह्मा, विष्णु और शिव (भाः
10/88/3),—ये तीन मूर्तियाँ।
'मन्वन्तरावतार'—(भाः आठवाँ स्कन्ध-पहला, पाँचवाँ
और तेरहवाँ अध्याय)-1) यज्ञ, 2) विभु, 3) सत्यसेन,
4) हरि, 5) वैकुण्ठ, 6) अजित, 7) वामन,
8) सार्वभौम, 9) ऋषभ, 10) विष्वक्सेन, 11) धर्मसेतु,
12) सुधामा, 13) योगेश्वर, 14) बृहद्भानु,–इन चौदह
मूर्तियोंमेंसे 'यज्ञ' और 'वामन' लीलावतार भी हैं,
इसलिये बारह मूर्तियाँ मन्वन्तरावतार हैं; पुनः ये चौदह
मन्वन्तरावतार 'वैभवावस्थ' अवतारके नामसे भी कहे
जाते हैं।
'युगावतार'-1) सत्ययुगमें 'शुक्ल' (भाः 11/5/21),
2) त्रेतायुगमें 'रक्त' (भाः 11/5/24), 3) द्वापरयुगमें
'श्याम' (भाः 11/5/27), 4) साधारण-कलियुगमें
'कृष्णवर्ण' और विशेष कलियुगमें 'पीतवर्ण' (भाः
11/5/32 और 10/8/13 देखें)।
'शक्त्यावेशावतार'—(क) भगवदावेश-कपिल और
ऋषभदेव, (ख) शक्त्यावेश-1) वैकुण्ठमें स्थित शेष
(निज-सेवनशक्ति), 2) अनन्त (भूधारण-शक्ति),
3) ब्रह्मा (सृष्टिशक्ति), 4) चतुःसन (ज्ञानशक्ति),
5) नारद (भक्तिशक्ति), 6) पृथु (पालनशक्ति),
7) परशुराम (दुष्टदमन शक्ति)—ये सात मूर्तियाँ
हैं॥ 245-246 ॥
किशोर श्रीकृष्णके छः प्रकारके विलासोंमेंसे आयुके धर्मके
भेदसे दो प्रकारके विलास अथवा लीला :-
बाल्य, पौगण्ड हय विग्रहेर धर्म।
एतरूपे लीला करेन व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 247 ॥
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