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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1705, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1705

बीसवाँ अध्याय 20/224-239 ]
करते हैं। हृषीकेश—गदा, चक्र, पद्म और शङ्ख धारण
करते हैं। पद्मनाभ—शङ्ख, पद्म, चक्र और गदा धारण
करते हैं। दामोदर—पद्म, चक्र, गदा और शङ्ख धारण
करते हैं। पुरुषोत्तम—चक्र, पद्म, शङ्ख और गदा धारण
करते हैं। श्रीअच्युत—गदा, पद्म, चक्र और शङ्ख धारण
करते हैं। श्रीनृसिंह—चक्र, पद्म, गदा और शङ्ख धारण
करते हैं। जनार्दन—पद्म, चक्र, शङ्ख और गदा धारण
करते हैं। श्रीहरि—शङ्ख, चक्र, पद्म और गदा धारण
करते हैं। श्रीकृष्ण—शङ्ख, गदा, पद्म और चक्र धारण
करते हैं। अधोक्षज—पद्म, गदा, शङ्ख और चक्र धारण
करते हैं। उपेन्द्र—शङ्ख, गदा, चक्र और पद्म धारण
करते हैं ॥ 227-236 ॥
अनुभाष्य—सिद्धार्थ-संहितामें—(हःभःविः पञ्चम विः 176 और 177 संख्या)
“वासुदेवो गदाशङ्खचक्रपद्मधरो मतः।
पद्मं शङ्खं तथा चक्रं गदां वहति केशवः।
शङ्खं पद्मं गदाञ्चक्रं धत्ते नारायणः सदा।
गदां चक्रं तथा शङ्खं पद्मं वहति माधवः।
चक्रं पद्मं तथा शङ्ख गदाञ्च पुरुषोत्तमः।
पद्मं कौमोदकीं शङ्खं चक्रं धत्तेऽप्यधोक्षजः।
सङ्कर्षणो गदाशङ्खपद्मचक्रधरः स्मृतः।
चक्रं गदां पद्मशङ्खौ गोविन्दो धरते भुजैः ॥
गदां पद्मं तथा शङ्खं चक्रं विष्णुर्विभर्ति यः।
चक्रं शङ्खं तथा पद्मं गदाञ्च मधुसूदनः।
गदां सरोजं चक्रञ्च शङ्खं धत्तेऽच्युतः सदा।
शङ्खं कौमोदकीं चक्रमूपेन्द्रः पद्ममुद्वहेत्।
चक्रशङ्कगदापद्मधरः प्रद्युम्न उच्यते।
पद्मं कौमोदकीं चक्रं शंखं धत्ते त्रिविक्रमः ॥
शङ्खं चक्रं गदां पद्मं वामनो वहते सदा।
पद्मं चक्रं गदां शङ्खं श्रीधरो वहते भुजैः ॥
चक्रं पद्मं गदां शङ्खं नरसिंहो विभर्ति यः।
पद्मं सुदर्शनं शङ्खं गदां धत्ते जनार्दनः ॥
अनिरुद्धश्चक्रगदाशङ्खपद्मलसम्भुजः।
हृषीकेशो गदां चक्रं पद्मं शङ्खञ्च धारयेत्॥
पद्मनाभो वहेत् शङ्खं पद्मं चक्रं गदां तथा।
पद्मं चक्रं गदां शङ्खं धत्ते दामोदरः सदा ॥
शङ्खं चक्रं सरोजञ्च गदां वहति यो हरि।
शङ्खं कौमोदकीं पद्मं चक्रं कृष्णो विभर्त्ति यः।
एताश्च मूर्त्तयो ज्ञेया दक्षिणाधः-करक्रमात्॥”
श्लोक-भावानुवादके लिये 224-236 पयारोंका अनुवाद देखें ॥ 224-236 ॥
हयशीर्ष-पञ्चरात्रमें कथित सोलह मूर्तियोंके अस्त्र-भेदका वर्णन :—
हयशीर्ष-पञ्चरात्रे कहे षोलजन।
तार मते कहि एबे चक्रादि-धारण ॥ 237 ॥
केशव-भेदे पद्म-शङ्ख-गदा-चक्रधर।
माधव-भेदे चक्र-गदा-शङ्ख-पद्मकर ॥ 238 ॥
नारायण-भेदे नाना अस्त्र-भेद-धर।
इत्यादिक भेद एइ सब अस्त्रकर ॥ 239 ॥
अनुवाद—हयशीर्ष-पञ्चरात्रमें सोलह मूर्तियोंके विषयमें कहा गया है। इनके हाथोंमें चक्रादि धारणाका अब मैं उसीके मतानुसार वर्णन करता हूँ। इसमें कहा गया है कि केशव अपने हाथोंमें क्रमशः पद्म, शङ्ख, गदा और चक्र धारण करते हैं तथा माधव चक्र, गदा, शङ्ख और पद्म धारण करते हैं जो सिद्धार्थ संहितामें दिये गये वर्णनसे भिन्न है। इसी प्रकार श्रीनारायणके अस्त्र धारणमें भी दोनों मतोंमें पार्थक्य है। इसी प्रकार सभी मूर्तियोंके अस्त्रधारणमें भेद हैं॥ 237-239 ॥
अनुभाष्य—सोलह मूर्तियाँ—1) वासुदेव, 2) सङ्कर्षण, 3) प्रद्युम्न, 4) अनिरुद्ध, 5) श्रीकेशव, 6) श्रीनारायण, 7) माधव, 8) श्रीगोविन्द, 9) विष्णु, 10) मधुसूदन, 11) त्रिविक्रम, 12) वामन, 13) श्रीधर, 14) हृषीकेश, 15) पद्मनाभ, 16) दामोदर।
हयशीर्ष-पञ्चरात्रमें (हःभःविः पञ्चम विः 168-175)—
“आदिमूर्त्तिर्वासुदेवः सङ्कर्षणमथासृजत्।
चतुर्मूर्त्तिः परं प्रोक्तमेकैको भिद्यते त्रिधा।
केशवादिप्रभेदेन मूर्त्तिर्द्वादशकं स्मृतम्॥
पङ्कजं दक्षिणे दद्यात् पाञ्चजन्यं तथोपरि।
वामोपरि गदा यस्य चक्रं चाधो व्यवस्थितम्॥
। 259