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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1700, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1700

[ 20/194-202 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
(ख) दूसरे चतुर्व्यूहमें प्रत्येकका तीन-मूर्तिके
रूपमें प्रकाश-विग्रह-बारह मासों और
बारह तिलकोंके बारह देवता :-
चारिजनेर पुनः पृथक् तिन तिन मूर्ति।
केशवादि यथा हैते विलासेर पूर्ति ॥ 194 ॥
अनुवाद-द्वितीय चतुर्व्यूह पुनः पृथक् तीन-तीन
मूर्तियाँ धारण करते हैं जिनसे श्रीकेशवादि विलास-
रूपोंकी पूर्ति होती है ॥ 194 ॥
इन बारह मूर्तिरूपमें वैभवविलासका परिचय :-
चक्रादि-धारण-भेदे नाम-भेद सब।
वासुदेवेर मूर्ति-केशव, नारायण, माधव ॥ 195 ॥
सङ्कर्षणेर मूर्ति-गोविन्द, विष्णु, श्रीमथुसूदन।
ए अन्य गोविन्द-नहे व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 196 ॥
प्रद्युम्नेर मूर्ति-त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर।
अनिरुद्धेर मूर्ति-हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर ॥ 197 ॥
अनुवाद-चक्रादि धारणके भेदसे सबके नामोंका
भेद है। श्रीवासुदेवकी मूर्तियाँ-श्रीकेशव, श्रीनारायण
और श्रीमाधव हैं। श्रीसङ्कर्षणकी मूर्तियाँ-श्रीगोविन्द,
श्रीविष्णु और श्रीमथुसूदन हैं। श्रीसङ्कर्षणकी मूर्तिके
रूपमें वर्णित श्रीगोविन्द अन्य श्रीगोविन्द हैं, व्रजेन्द्रनन्दन
नहीं। श्रीप्रद्युम्नकी मूर्तियाँ-त्रिविक्रम, वामन और श्रीधर
हैं और श्रीअनिरुद्धकी मूर्तियाँ-हृषिकेश, पद्मनाभ और
दामोदर हैं ॥ 195-197 ॥
वे ही बारह मासोंके बारह देवता :-
द्वादश-मासेर देवता-एइ बार जन।
मार्गशीर्षे-केशव, पौषे-नारायण ॥ 198 ॥
माघेर देवता-माधव, गोविन्द-फाल्गुने।
चैत्रे-विष्णु, वैशाखे-श्रीमधुसूदने ॥ 199 ॥
ज्येष्ठे-त्रिविक्रम, आषाढ़े-वामन देवेश।
श्रावणे-श्रीधर, भाद्रे-देव हृषीकेश ॥ 200 ॥
आश्विने-पद्मनाभ, कार्तिके-दामोदर।
'राधा-दामोदर' अन्य व्रजेन्द्र-कोडर ॥ 201 ॥
अनुवाद-बारह मासोंके देवता-यही बारह जन
हैं। मार्गशीर्षके देवता श्रीकेशव, पौषके श्रीनारायण,
माघके श्रीमाधव, फाल्गुनके श्रीगोविन्द, चैत्रके श्रीविष्णु,
वैशाखके श्रीमथुसूदन, ज्येष्ठके श्रीत्रिविक्रम, आषाढ़के
श्रीवामनदेव, श्रावणके श्रीधर, भाद्रके श्रीहृषीकेश, आश्विनके
श्रीपद्मनाभ और कार्तिकके श्रीदामोदर हैं। ये श्रीदामोदर
व्रजेन्द्रनन्दन 'श्रीराधा-दामोदर'से भिन्न हैं ॥ 198-201 ॥
पुनः वे ही बारह तिलक-मन्त्रोंके बारह मूर्ति देवता :-
द्वादश-तिलक-मन्त्र एइ द्वादश नाम।
आचमने एइ नामे स्पर्शि तत्तत्स्थान ॥ 202 ॥
अनुवाद-बारह तिलक-मन्त्रोंके भी यही बारह
नाम हैं। आचमन करते समय इन नामोंका उच्चारण
करते हुए ही उन-उन स्थानोंको स्पर्श करते हैं ॥ 202 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'आचमन'- आह्निकपूजाके बाद
मुखसे जिस जल स्पर्शरूप आचमनका विधान है,
वह ॥ 202 ॥
अनुभाष्य-बारह तिलकमन्त्रोंमें बारह विष्णूनाम
(हःभःविः चतुर्थ विः 170-172 संख्या)-
“ललाटे केशवं ध्यायेन्नारायणमथोदरे।
वक्षःस्थले माधवन्तु गोविन्दं कण्ठकूपके॥
विष्णुञ्च दक्षिणे कुक्षौ बाहौ च मधुसूदनम्।
त्रिविक्रमं कन्धरे तु वामनं वामपार्श्वके॥
श्रीधरं वामबाहौ तु हृषीकेशन्तु कन्धरे।
पृष्ठे च पद्मनाभञ्च कट्यां दामोदरं न्यसेत् ॥”
“ललाटमें केशव, उदरमें श्रीनारायण, वक्षःस्थलमें
माधव, कण्ठकूपमें श्रीगोविन्द, पेटके दायें भागमें विष्णु,
दाहिनी भुजामें मधुसूदन, दायें कन्धेमें त्रिविक्रम, पेटके
बायें भागमें वामन, बायीं भुजामें श्रीधर, बायें कन्धेमें
हृषिकेश, पीठमें पद्मनाभ और कमरमें दामोदरका ध्यान
करके तिलकका न्यास (स्थापन) करें।”
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