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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1686, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1686

[ 20/122-128 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
और भोगपरायण व्यक्तियोंका अमङ्गलसे उद्धार करनेके
लिये वेद-पुराणादि प्रकाशित किये हैं॥122॥
श्रीकृष्ण ही तीन प्रकाशोंसे श्रीकृष्णज्ञान देनेवालेके रूपमें
अवतीर्ण—(1) वेद अथवा वेदान्त-भाष्य श्रीमद्भागवत, (2)
भागवत-श्रेष्ठ गुरु, (3) अन्तर्यामी :—
'शास्त्र'-'गुरु'-'आत्म'-रूपे आपनेरे जानान।
'कृष्ण मोर प्रभु, त्राता'—जीवेर हय ज्ञान ॥123॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण 'शास्त्र', 'गुरु' और 'अन्तर्यामी'के
रूपमें जीवको अपने तत्त्वसे अवगत कराते हैं।
श्रीकृष्णका ज्ञान होनेपर जीव यह समझ पाता है कि
'श्रीकृष्ण ही मेरे स्वामी और मेरी रक्षा करनेवाले
हैं'॥'123॥
अनुभाष्य—शास्त्र, गुरु और चैत्यगुरु—इन तीन
रूपोंमें भगवान् उदित होकर बद्धजीवके हृदयमें 'जीवके
प्रभु' अथवा 'जीवोंके उद्धार-कर्त्ता' आदि भावोंको
प्रकाशित करा देते हैं॥123॥
(ङ) ईश्वर-विश्वासी मात्रको ही वेदके अपौरुषेय-ज्ञानके
कारण ग्रन्थकारके द्वारा पूर्वोक्त तीन प्रकारके प्रमाणोंमेंसे
सर्व-प्रत्यक्षीभूत वेद अथवा श्रुतिकी सहायतासे अपने
वक्तव्य एकमात्र शुद्धभक्तिके श्रेष्ठ-अभिधेय होनेका
संस्थापन; शास्त्रोंमें प्रतिपादित तीन प्रकारके अन्वेषणीय
तत्त्व अथवा ब्रह्मवस्तु :—
वेदशास्त्र कहे—'सम्बन्ध', 'अभिधेय', 'प्रयोजन'।
'कृष्ण'—प्राप्य-सम्बन्ध, 'भक्ति'—प्राप्येर साधन ॥124॥
श्रीकृष्ण ही सम्बन्ध, शुद्धभक्ति ही अभिधेय,
प्रेम ही प्रयोजन :—
अभिधेय-नाम—'भक्ति', 'प्रेम'—प्रयोजन।
पुरुषार्थ-शिरोमणि—प्रेम महाधन ॥125॥
साधनभक्तिके साध्य प्रेमकी चेष्टा :—
कृष्णमाधुर्य-सेवा-प्राप्त्येर कारण।
कृष्णे सेवा करे, कृष्णरस-आस्वादन ॥ 126 ॥
अनुवाद—वेदशास्त्र 'सम्बन्ध', 'अभिधेय' और
'प्रयोजन'के विषयमें बतलाते हैं। जीवके प्राप्य श्रीकृष्ण
ही 'सम्बन्ध' हैं, प्राप्य श्रीकृष्णसेवाका साधन ही भक्ति
अथवा 'अभिधेय' है, और पुरुषार्थ-शिरोमणि महाधन
स्वरूप प्रेम ही 'प्रयोजन' है। जीव जब श्रीकृष्णमाधुर्यके
आनन्दको अनुभव करता है, तब वह श्रीकृष्णकी सेवा
करता है। उस सेवाके द्वारा वह श्रीकृष्णरसका आस्वादन
करता है॥124-126॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जीव मायामुग्ध होकर
श्रीकृष्णस्मृति-ज्ञानसे वञ्चित हो गये हैं, ऐसा देखकर
अपार-करुणामय श्रीकृष्ण वेद-पुराण-शास्त्रोंको प्रकाशित
करके उन शास्त्रोंके रूपमें, शास्त्रोंके अर्थ-प्रदर्शक
गुरुरूपमें और अन्तर्यामी आत्मारूपमें जीवको अपने
तत्त्वसे अवगत कराते हैं। सभी वेदशास्त्रोंमें सम्बन्ध-
ज्ञान, अभिधेय-ज्ञान और प्रयोजन-ज्ञानकी शिक्षा है।
जीवके प्राप्य श्रीकृष्ण जो तत्त्व हैं, वे सम्बन्धज्ञानसे
प्राप्त होते हैं। उन श्रीकृष्णको प्राप्त करनेके साधनका
नाम—'भक्ति' है; उसे 'अभिधेय' कहते हैं। श्रीकृष्ण-
प्राप्तिमें 'प्रेम' नामक एक विचित्र कार्य है, उसका नाम
'प्रयोजन' है॥123-125॥
अनुभाष्य—वेदशास्त्रोंमें 'सम्बन्ध', 'अभिधेय' और
'प्रयोजन'—ये तीन विषय कहे गये हैं। शुद्धजीवके प्राप्य
श्रीकृष्ण ही 'सम्बन्ध' हैं; प्राप्य श्रीकृष्णसेवाका साधन ही
'अभिधेय' है; और धर्म-अर्थ-कामभोग और भोगरहित
'मोक्ष'—इन चारों पुरुषार्थोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ महान्धनरूप
प्राप्य श्रीकृष्णप्रेम ही 'प्रयोजन' है॥125॥
चार प्रकारके अभिधेयोंमेंसे सभी शास्त्रोंमें एकमात्र
शुद्धभक्तिके ही निर्विघ्न और अनायास प्राप्त होनेका
वर्णन; उपमा—सर्वज्ञ अथवा सिद्ध महाजनोंका उपदेश :—
इहाते दृष्टान्त—यैछे दरिद्रेर घरे।
'सर्वज्ञ' आसिं दुःख देखि' पुछये ताहारे ॥ 127 ॥
जीवका नित्यसिद्धभाव श्रीकृष्णप्रेम :—
'तुमि केने एत दुःखी, तोमार आछे पितृधन।
तोमारे ना कहिल, अन्यत्र छाड़िल जीवन ॥'128॥
अनुवाद—इसका दृष्टान्त—जैसे किसी दरिद्र व्यक्तिके
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