श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1638, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/139-143 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य-मुण्डकमें 3/1/9-“एषोऽणुरात्मा” अर्थात्
यह आत्मा अणुके समान सूक्ष्म है ॥139॥
शास्त्र-प्रमाण :-
श्रीमद्भागवत (10/87/30)में श्रुति-स्तव-व्याख्यामें
उद्धृत-श्लोक-
केशाग्रशतभागस्य
शतांशसदृशात्मकः।
जीवः सूक्ष्मस्वरूपोऽयं
संख्यातीतो हि चित्कणः॥140॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥140॥
अमृतप्रवाह भाष्य-केशके अग्रभागके सौ भाग
करनेपर उसके एक भागके पुनः सौवे अंशके सदृश
स्वरूप ही जीवका सूक्ष्म स्वरूप है; जीव चित्कण और
संख्यातीत (असंख्य) हैं॥140॥
अनुभाष्य-
अयं जीवः हि केशाग्रशतभागस्य (अति-सूक्ष्मकेशाग्रायामस्य
शतधा विभक्तस्य, पुनः तादृश-परमसूक्ष्मांशस्य) शतांशसदृशात्मकः
(पुनः शतखण्डांशतुल्यः) सूक्ष्मस्वरूपः (परमाणुचेतनः चित्कणः
सूक्ष्मचिदणुरखण्डः) संख्यातीतः (अनन्तसंख्यः)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥140॥
श्वेताश्वतर उपनिषदके मन्त्रानुसार
पञ्चदशी चित्रदीप (81)में :-
बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागो जीवः स विज्ञेय इति चाह परा श्रुतिः ॥141॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥141॥
अमृतप्रवाह भाष्य-केशके अग्रभागके सौवे भागको
लेकर उसे सौ भागोंमें विभाग करनेसे जो सूक्ष्म भाग
होता है, जीव-वैसा सूक्ष्म है, प्रधान श्रुतिओंने ऐसा
कहा है॥141॥
अनुभाष्य-
[यः] बालाग्रशतभागस्य (केशाग्रस्य शतधा खण्डितस्य,
तस्य पुनः) शतधा कल्पितस्य (विभक्तस्य) च भागः (खण्डः),-
सः [एव] जीवः (जीवस्वरूपाकारः) विज्ञेयः (ज्ञातव्यः) इति
च परा (श्रेष्ठा) श्रुतिः (श्वेताश्वतरप्रमुखा) आह।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥141॥
श्रीमद्भागवत (11/16/11)में :-
सूक्ष्माणामप्यहं जीवः ॥ 142 ॥
अनुवाद-सूक्ष्म वस्तुओं अर्थात् अणुओंके मध्य मैं
जीवात्मा हूँ॥142॥
अमृतप्रवाह भाष्य-किसी-किसी पाठमें लिखा हुआ
है,- श्रीमद्भागवतमें उद्धवके प्रति श्रीभगवद् वाक्य-
“गुणिनामप्यहं सूत्रं महताञ्च महानहम्।
सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मनः॥”
सूक्ष्मगणोंमें मैं (भगवान्) 'जीव' (भेदाभेद-प्रकाश)
हूँ।॥142॥
अनुभाष्य-भगवान्की विभूतियोंका श्रवण करनेकी
इच्छा करनेपर श्रीउद्धवके प्रति श्रीकृष्णकी उक्ति-
अहं (चिदचिदीश्वरः अद्वयज्ञानात्मकः श्रीभगवान्) सूक्ष्माणां
(अणूनाम् अपि मध्ये) जीवः (जीवात्मा)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥142॥
श्रीमद्भागवत (10/87/30)में :-
अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्वगता-
स्तर्हि न शास्यतेति नियमो ध्रुव नेतरथा।
अजनि च यन्मयं तद्विमुच्य नियन्तृ भवेत्
सममनुजानतां यदमतं मतदुष्टतया ॥143॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥143॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे ध्रुव (सर्वाश्रय) ! यदि सभी
अनन्त शरीरधारी जीव ध्रुव अर्थात् [आपसे उत्पन्न नहीं
होकर] परम नित्य और सर्वव्यापी होते, तो फिर उनका
आपके शासनके अधीन रहनेका नियम नहीं होता।
यदि जीवको 'अणु', सामान्यतः 'नित्य' कहकर स्वीकार
किया जाय, तभी वे आपके अधीन होते हैं। [अग्निरूप
192 ।