श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1634, कुल 2549 में से
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श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
और समस्त तत्त्वोंका निरूपण करके उन्हें उनमें
'प्रवीण' बना दिया॥115-117॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'प्रान्त'—सीमा॥115॥
कविकर्णपूरके स्वकृत-ग्रन्थमें श्रीरूप-शिक्षाका उल्लेख :-
शिवानन्द-सेनेर पुत्र 'कविकर्णपूर'।
'रूपेर-मिलन' स्व-ग्रन्थे लिखियाछेन प्रचुर ॥118॥
अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनके पुत्र 'श्रीकविकर्णपूर'ने
स्वरचित ग्रन्थ (श्रीचैतन्यचन्द्रोदयनाटक)में महाप्रभुसे
'श्रीरूपके मिलन'का विस्तारसे वर्णन किया है॥118॥
श्रीरूप-सनातनके द्वारा महाप्रभुकी
व्रजलीला-कथा-प्रकाश :-
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/38)—
कालेन वृन्दावनकेलिवार्त्ता
लुप्तेति तां ख्यापयितुं विशिष्य।
कृपामृतेनाभिषिषेच देव-
स्तत्रैव रूपञ्च सनातनञ्च ॥119॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥119॥
अमृतप्रवाह भाष्य-कालके प्रभावसे वृन्दावनकी
रसक्रीड़ाओंकी कथा लुप्त हो गयी थी, उन कथाओंका
विशेषरूपसे विस्तार करनेके लिये श्रीगौराङ्गदेवने कृपारूपी
अमृतके द्वारा वहाँपर श्रीरूप एवं श्रीसनातनको अभिषिक्त
किया था॥119॥
अनुभाष्य-
कालेन (भगवदिच्छारूप-कालवशेन) वृन्दावनकेलिवार्त्ता
(वृन्दावनसम्बन्धिनी रसक्रीड़ा-कथा) लुप्ता (आच्छन्ना आसीत्)
इति (अतः) तां (कथां) विशिष्य (विशिष्टां कृत्वा) ख्यापयितुं
(प्रकाशयितुं) देवः (श्रीगौरहरिः) तत्रैव वृन्दावने रूपं च
सनातनं च कृपामृतेन (करुणासुधा-वारिणा) अभिषिषेच
(अभिषिक्तवान्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥119॥
श्रीरूपपर कृपा करनेवाले महाप्रभु :-
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/29)में-
यः प्रागेव प्रियगुणगणैर्गाढबद्धोऽपि मुक्तो
गेहाध्यासाद्रस इव परो मूर्त्त एवाप्यमूर्त्तः।
प्रेमालापैर्दृढतरपरिष्वङ्गरङ्गैः प्रयागे
तं श्रीरूपं सममनुपमेनानुजग्राह देवः॥120॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो पहले प्रियगुणसमूहके
(महाप्रभुके गुणोंके) द्वारा गाढ़-बद्ध होनेके कारण
गृहकार्योंसे मुक्त हो गये थे, उन श्रीरूपके ऊपर, उनके
छोटे भाई श्रीअनुपमके साथ, स्वयं रसके समान अमूर्त्त
होनेपर भी श्रेष्ठ मूर्तिमान् श्रीगौराङ्गदेवने प्रयागमें
प्रेमालाप और दृढ़तर (गाढ़) आलिङ्गनके द्वारा अनुग्रह
किया था॥120॥
अनुभाष्य-
यः (श्रीरूपः) प्रागेव प्रियगुणगणैः (प्रियस्य गौरस्य गुणगणैः
गुणसमूहैः) गाढ़बद्धः (गाढ़म् अतिशयं बद्धः आसक्तः) अपि
गेहाध्यासात् (लीलाभिनीत-गृहासक्तेः) मुक्तः (त्यक्तस्पृहः) आसीत्,
तं (श्रीरूपम्) अनुपमेन (अनुजेन) समं (सार्द्धम्) अमूर्त्तः
अपि परः मूर्त्तः रसः इव (स्वरूपं प्रकटीकृत्य) देवः (गौरः)
प्रयागे (गङ्गायामुनसङ्गमे) प्रेमालापैः दृढ़तरपरिष्वङ्गरङ्गैः
(गाढ़ालिङ्गनविलासैः) अनुजग्राह (अनुकम्पां कृतवान्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥
महाप्रभुके द्वितीय स्वरूप, महाप्रभुके सर्वस्व श्रीरूपमें
भक्तिरसतत्त्व-शास्त्रका विस्तार :-
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (9/30)में -
प्रियस्वरूपे दयितस्वरूपे
प्रेमस्वरूपे सहजाभिरूपे।
निजानुरूपे प्रभुरेकरूपे
ततान रूपे स्वविलासस्वरूपे ॥ 121 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥121॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अपने प्रियस्वरूप, दयितस्वरूप,
प्रेमस्वरूप, स्वाभाविक मनोज्ञरूपसे युक्त, मुख्य रूप एवं
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