सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1610, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1610

[ 18/186-194 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—महाप्रभुको देखकर उस 'पीर'का चित्त
द्रवीभूत हो गया। वह अपने शास्त्रके (कुरानके) द्वारा
'निर्विशेष-ब्रह्म'की स्थापना करनेके लिये महाप्रभुसे बात
करना चाहता था॥ 186॥
अनुभाष्य—'निर्विशेष-ब्रह्म'—अज्ञेय, परिचयरहित
'ईश्वर'। 'खुदा' (ईश्वर) और 'बन्दा' (जीव)—इन दो
नित्यभावोंसे रहित चिद्विलासहीन पारलौकिक
अवस्थान॥ 186॥
मुस्लिम-शास्त्रकी युक्तिके द्वारा ही महाप्रभुके द्वारा
उसके मतका खण्डन :—
'अद्वैत-ब्रह्मवाद' सेइ करिल स्थापन।
ताँर शास्त्रयुक्त्ये ताँरे प्रभु कैला खण्डन॥ 187॥
येइ येइ कहिल, प्रभु सकलि खण्डिल।
उत्तर ना आइसे मुखे, महास्तब्ध हैल॥ 188॥
अनुवाद—उस म्लेच्छाचार्यने कुरानके आधारपर
'अद्वैत-ब्रह्मवाद'की स्थापना की, परन्तु महाप्रभुने उसका
खण्डन कर दिया। उसने जो-जो तर्क या विचार रखे,
महाप्रभुने उस सबका खण्डन कर दिया। अन्तमें वह
म्लेच्छाचार्य बिलकुल स्तब्ध हो गया और कुछ भी
नहीं बोल सका॥ 187-188॥
मुस्लिम-शास्त्रोंमें सर्वप्रथम निर्विशेषत्वको स्थापित करनेके
बाद अन्तमें सविशेष-ब्रह्मका ही स्थापन :—
प्रभु कहे, —"तोमार शास्त्र स्थापे 'निर्विशेषे'।
ताहा खण्डि' 'सविशेष' स्थापियाछे शेषे॥ 189॥
कुरानमें सबसे अन्तमें सविशेष-ब्रह्म
श्रीकृष्णका परिचय :—
तोमार शास्त्रे कहे शेषे 'एकइ ईश्वर'।
'सर्वैश्वर्यपूर्ण' तैं हो—श्याम-कलेवर॥ 190॥
सच्चिदानन्द-देह, पूर्णब्रह्म-स्वरूप।
'सर्वात्मा', 'सर्वज्ञ', नित्य सर्वादि-स्वरूप॥ 191॥
सृष्टि, स्थिति, प्रलय ताँहा हैते हय।
स्थूल-सूक्ष्म-जगतेर तैं हो समाश्रय॥ 192॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —"पहले तो तुम्हारे शास्त्र
'निर्विशेष'की स्थापना करते हैं, किन्तु अन्तमें उसीका
खण्डन करके 'सविशेष'की स्थापना करते हैं। तुम्हारे
शास्त्रमें अन्तमें 'एक ही ईश्वर'की बात कही गयी है।
वे ईश्वर सब प्रकारके ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण हैं और उनका
शरीर श्याम वर्णका है। उनकी देह सच्चिदानन्द है, वे
पूर्ण ब्रह्म स्वरूप हैं, वे सर्वात्मा, सर्वज्ञ, नित्य और
सबके आदि-स्वरूप हैं। उन्हींके द्वारा सृष्टि, स्थिति
और प्रलय होता है। वे स्थूल और सूक्ष्म जगत्के
वास्तविक आश्रय हैं॥ 189-192॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'स्वशास्त्र'—कुरान; मुसलमानोंमें
'सूफी' नामक एक सम्प्रदाय है, इनका मत ही 'निर्विशेष
ब्रह्म' अथवा 'अद्वैत ब्रह्मवाद' है, इनका महावाक्य—
“अनलहक्” है। यह सूफी-मत शाङ्कर मतसे उत्पन्न
हुआ है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
तुम्हारे मोहम्मदके शास्त्रमें मोहम्मदके सप्तम स्वर्गमें
ईश्वरके दर्शनके वर्णनमें ईश्वरका पूर्ण विग्रह स्वीकार
किया गया है॥ 186-190॥
उन भगवान्की प्रीति अथवा भक्ति ही संसार-बन्धनसे
मुक्त करनेवाली और परम-पुरुषार्थ :—
सर्वश्रेष्ठ, सर्वाराध्य, कारणेर कारण।
ताँर भक्त्ये हय जीवेर संसार-तारण॥ 193॥
ताँर सेवा बिना जीवेर ना याय 'संसार'।
ताँहार चरणे प्रीति—'पुरुषार्थ-सार'॥ 194॥
अनुवाद—वे ईश्वर सर्वश्रेष्ठ, सभीके आराध्य तथा
सभी कारणोंके भी कारण हैं। उनकी भक्तिसे जीव
संसारसे तर जाता है। उनकी सेवाके बिना बद्धजीवोंका
संसार क्षय नहीं होता। उन्हीं ईश्वरके चरणोंमें प्रीति ही
सभी पुरुषार्थोंका सार है॥ 193-194॥
अमृतप्रवाह भाष्य—उन ईश्वरकी 'एबादत्' अर्थात्
पाँच समय नमाज आदि सेवा नहीं करनेसे जीवको
पुरुषार्थकी प्राप्ति नहीं होती। तुम्हारे शास्त्रमें प्रीतिको ही
पुरुषार्थ कहा गया है; उसमें कर्म-योग-ज्ञानादिको
164 |