श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1607, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय 18/158-167 ]
राजपूत कृष्णदास और मथुराके सनोड़िया ब्राह्मण-दोनों अनुवाद-उसी समय वहाँपर दस घुड़सवार
ही मार्गको जाननेवाले :- म्लेच्छ-पठान सैनिक आये और महाप्रभुको मूर्च्छित
प्रेमी कृष्णदास, आर सेइत ब्राह्मण। पड़े देखकर वे घोड़ोंसे उतरकर उनके पास आ
गङ्गातीरे-पथे याइवार विज्ञ दुइजन ॥ 158 ॥ गये॥ 163 ॥
अनुवाद-प्रेमी कृष्णदास और सनोड़िया ब्राह्मण-दोनों अनुभाष्य- 'आशोयार'-घुड़सवार सैनिक ॥ 163 ॥
ही गङ्गातटवाले मार्गको भली-भाँति जानते थे॥158॥
महाप्रभुके साथी चारों लोगोंको ही
मार्गमें एक वृक्षके नीचे सभीका 'महाप्रभुकी हत्या करनेवाले डाकू' समझकर
विश्रामके लिये बैठना :- सरदारके द्वारा उनको मारनेका प्रयास :-
याइते एक वृक्षतले प्रभु सबा लञा। प्रभुरे देखिञा म्लेच्छ करये विचार।
बसिला, सबार पथ-श्रान्ति देखिया ॥ 159 ॥ 'ऐइ यति-पाश छिल सुवर्ण अपार ॥ 164 ॥
अनुवाद-चलते हुए महाप्रभुने देखा कि उनके एइ चारि बाटोयार धुतुरा खाओयाञा।
सङ्गी सब थक गये हैं, तो उनको साथमें लेकर वे एक मारि' डारियाछे, यतिर सब धन लञा ॥' 165 ॥
वृक्षके नीचे बैठ गये॥ 159 ॥ तबे सेइ पाठान चारि जनेरे बाँधिल।
काटिते चाहे, गौड़िया सब काँपिते लागिल ॥ 166 ॥
गैयाओंको घूमते देखकर व्रजलीलाका स्मरण :-
सेइ वृक्ष निकटे चरे बहु गाभीगण। अनुवाद-महाप्रभुको मूर्च्छित देखकर म्लेच्छ विचार
ताहा देखि' महाप्रभुर उल्लसित मन ॥ 160 ॥ करने लगे, - 'इस संन्यासीके पास अवश्य ही बहुत
अधिक सोना था। इन चारों डकैतोंने संन्यासीका सब
अनुवाद-उस वृक्षके निकट ही बहुत सी गायें कुछ लूटकर उसे धतूरा खिलाकर मार डाला है।' तब
घास चर रही थीं। उन्हें देखकर महाप्रभुके मनमें बहुत उन पठानोंने उन चारों लोगोंको बाँध दिया और उनको
उल्लास हुआ॥ 160 ॥ मारनेका निश्चय किया। दोनों बङ्गाली भयसे काँपने
लगे॥ 164-166 ॥
हठात् एक वंशीध्वनिके श्रवणसे महाप्रभुकी प्रेम-मूर्च्छा :- अमृतप्रवाह भाष्य- 'बाटोयार'- मार्गमें जो डकैती
आचम्बिते एक गोप वंशी बाजाइल। कर लेते हैं; 'मारि' डारियाछे' - मार डाला है॥ 165 ॥
शुनि' महाप्रभुर महा-प्रेमावेश हैल ॥ 161 ॥ अनुभाष्य- 'बाटोयार' - असहाय पथिकोंको लूटनेवाले
अचेतन हञा प्रभु भूमिते पड़िला। डाकू। 'चारिजनेर' - 1) कृष्णदास राजपूत, 2)
मुखे फेना पड़े, नासाय श्वास रुद्ध हैला ॥ 162 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य 'सनोड़िया'-ब्राह्मण, 3) बलभद्र
अनुवाद-अचानक एक गोपने वंशी बजायी, उसे भट्टाचार्य, 4) बलभद्रके साथी ब्राह्मण ॥ 165-166 ॥
सुनते ही महाप्रभुमें अत्यधिक प्रेमावेश आ गया और
वे मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। उनके मुखसे झाग कृष्णदास और मथुराके ब्राह्मणके द्वारा निर्भय होकर
निकलने लगी तथा उनकी सांस रुक गयी ॥ 161-162 ॥ पठानको अपना परिचयादि देना :-
उसी समय वहाँ दस घुड़सवार पठानोंका आगमन :- कृष्णदास-राजपुत, निर्भय से बड़।
हेनकाले ताँहा आशोयार दश आइला। सेइ विप्र-निर्भय, से-मुखे बड़ दड़ ॥ 167 ॥
म्लेच्छ-पाठान घोड़ा हैते उत्तरिला ॥ 163 ॥
। 161