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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1601

अठारहवाँ अध्याय 18/114-116 ]
'सम्बित्' जो उनकी अद्वयज्ञानस्वरूपभूता शक्ति है, इन
दोनोंके द्वारा सदैव आलिङ्गित रहते हैं। किन्तु जीव
सदा अपनी (आरोपित) भगवान्‌की जीवको बाँधनेवाली
अविद्यारूपी मायासे पूरा ढका हुआ है, इसलिये वह
तीन प्रकारके क्लेशों (पाप, बीज और अविद्या) की
निधिकी खान है॥114॥
जीव और श्रीनारायणको समान समझना ही पाखण्ड :–
येइ मूढ़ कहे,–जीव ईश्वर हय 'सम'।
सेइत 'पाषण्डी' हय, दण्डे तारे यम॥' 115 ॥
अनुवाद—जो मूर्ख कहता है,–जीव और ईश्वर
एक समान हैं, वह पाखण्डी है और यमराजके दण्डका
भागी बन जाता है॥'115॥
अनुभाष्य—'पाषण्डी'—आदिलीला 3/78 संख्या देखें।
मायावश जीवके अथवा मायिक जड़वस्तुके साथ
मायाधीश शुद्धसत्त्व चेतन-विग्रह श्रीविष्णुको 'एक'
अथवा समान माननेवाला 'पाखण्डी' है। श्रीभक्तिसन्दर्भके
(255 संख्या)—'नामापराध-वर्णन-प्रसङ्ग'में एक अपराध
'श्रुति-शास्त्रनिन्दा'के वर्णनमें—
“यथा पाषण्डमार्गेण दत्तात्रेयर्षभदेवोपासकानां पाषाण्डिनाम्”
[अर्थात् “दत्तात्रेय और ऋषभदेवके पाखण्डी उपासक-
गण पाखण्डमार्गके अनुसार वेदादि शास्त्रनिन्दक हैं।"]
पुनः अन्य एक अपराध 'अहं-मम-बुद्धि' अथवा
'देहात्मबुद्धि'के वर्णनमें—
“देह-द्रविणादि-निमित्तक-'पाषण्ड'-शब्देन च दशापराधा एव
लक्ष्यन्ते, पाषण्डमयत्वात् तेषाम्”
[अर्थात् “पुनः, 'मैं और मेराकी बुद्धि'के वर्णनमें—
'नामैकं यस्य वाचि'—श्लोकमें देह-धनादि निमित्त
'पाखण्ड'-शब्दके द्वारा भी दसों नामापराध लक्षित हुए
हैं, क्योंकि ये समस्त अपराध ही पाखण्डमय हैं।"]
पुनः (223 संख्यामें)—
“उद्दिश्य देवता एव जुहोति च ददाति च।
स पाषण्डीति विज्ञेयः स्वतन्त्रो वापि कर्मसु॥'
इति पाषण्डित्वञ्च वैष्णव-मार्गाद्भ्रष्टत्वमित्यर्थः।”
[अर्थात् “जो व्यक्ति दूसरे देवताओंके उद्देश्यसे ही
दान और होमादि करता है, उसको पाखण्डी अथवा
कर्मविषयमें स्वेच्छाचारी समझना चाहिये। इसलिये 'पाखण्ड'
वैष्णवमार्गसे भ्रष्ट होना है।"]
पुनः (179 संख्या)में “विष्णुधर्म-ग्रन्थमें विष्णुभक्त
उपरिचर-वसुके द्वारा पाखण्डी असुरोंके उद्धार करनेके
वृत्तान्तका उल्लेख करते हुए कहा गया है—दैत्यगुरु
शुक्राचार्यके आदेशसे दैत्य उपरिचर-वसुको पाखण्ड
मार्गका उपदेश करने लगे। परन्तु ऐसा करनेपर भी
दैत्यगण उनकी कृपासे भगवद्भक्त बन गये। पुनः (153
संख्यामें) हरिनााममें अर्थवाद तथा वैष्णव-अपराधके
वर्णनमें—
“तादृशापराधे भक्तिस्तम्भश्च श्रूयते।
×× देहादिलोभार्थं ये पाषण्डा गुर्ववज्ञादिदशापराधयुक्ताः”
[अर्थात् “इस प्रकारके अपराधोंके कारण भक्ति
स्तम्भित हो जाती है—ऐसा शास्त्रोंमें सुना जाता है।
देह-सम्पत्तिके लोभके उद्देश्यसे नाम ग्रहण करनेका
पाखण्ड करनेवाले और गुरु-अवज्ञादि दस नामापराध
युक्त व्यक्तियोंको श्रीनाम-कीर्तनका फल बहुत देरसे
प्राप्त होता है।"]
इस प्रकार अनेक स्थानोंपर 'पाखण्ड' शब्दका
उपयोग हुआ है। भाः 4/2/28, 30, 32, 5/6/9 एवं
12/2/13, 43 आदि बहुतसे श्लोकोंमें पाखण्डियोंके
पाखण्डका वर्णन है॥115॥
शास्त्र-प्रमाण :—
वैष्णवतन्त्र-वाक्य, पाद्मोत्तर-खण्ड (23/12)में और
हरिभक्तिविलास (1/73)में –
यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः।
समतवेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद्ध्रुवम्॥116॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥116॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो ब्रह्मा-रुद्रादि देवताओंके
साथ श्रीनारायणको 'समान' रूपमें देखते हैं, वे निश्चय
ही 'पाखण्डी' हैं॥116॥
। 155