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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1594, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1594

[ 18/67-71 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महावन और श्रीकृष्णका जन्मस्थान गोकुल, दोनों ही वहाँसे अक्रूर-तीर्थ आ गये। वहाँ आकर वे एकान्त
एक और अभिन्न हैं।"] ॥ 67 ॥ स्थानमें रहने लगे ॥ 70 ॥
यमलार्जुन-भञ्जनस्थलके दर्शनसे प्रेमावेश :- अनुभाष्य- 'अक्रूरतीर्थ'-
यमलार्जुनभङ्गादि देखिल सेइ 'स्थल'। “अक्रूरतीर्थमत्यर्थमस्ति प्रियवरं हरेः।
प्रेमावेशे प्रभुर मन हैल टलमल ॥ 68 ॥ तीर्थराजः हि चाक्रूरं गुह्यानां गुह्यमुत्तमम्॥ ”
अनुवाद-यमलार्जुन-भञ्जनादि लीलास्थलीको देखकर [अर्थात् “अक्रूरतीर्थ श्रीहरिका अति प्रियतम है।
वहाँ प्रेमावेशमें महाप्रभुका मन अस्थिर हो गया ॥ 68 ॥ यह तीर्थोंका राजा है और गुह्यसे भी अति गुह्यतम धाम
अनुभाष्य- 'यमलार्जुन'- है।"]
“यमलार्जुनतीर्थञ्च कुण्डं तत्र च वर्त्तते।” (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)-
[अर्थात् “उस स्थानपर यमलार्जुन-तीर्थ और “देख, श्रीनिवास, एइ अक्रूर ग्रामेते।
यमलार्जुन-कुण्ड हैं।"] श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु छिलेन निभृते॥ ”
(भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)- [अर्थात् “हे श्रीनिवास, देखो इस अक्रूर ग्राममें
“एइ यमलार्जुन-भञ्जन तीर्थस्थल। श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु एकान्त स्थानमें रहे थे।"] ॥ 70 ॥
एथा उदूखले कृष्णे यशोदा बाँधिला। वृन्दावनके दर्शनके लिये आगमन एवं कालीय-ह्रद और
बन्धन-स्वीकार कृष्ण कौतुके करिला॥ ” प्रस्कन्दन-क्षेत्रमें स्नान :-
[अर्थात् “यह यमलार्जुन-भञ्जन तीर्थस्थल है। यहाँ आर दिन आइला प्रभु देखिते वृन्दावन।
यशोदा माताने श्रीकृष्णको ऊखलसे बाँधा था। श्रीकृष्णने 'कालीय-ह्रदे' स्नान कैला आर प्रस्कन्दन ॥ 71 ॥
माताके प्रेमके कारण बन्धन स्वीकार किया था] ॥ 68 ॥ अनुवाद-अगले दिन महाप्रभु वृन्दावनके दर्शनके
उसके बाद मथुरामें योगपीठका दर्शन और लिये आये। उन्होंने कालीय-ह्रद और प्रस्कन्दन तीर्थमें
माधवेन्द्रपुरीके शिष्यके घरमें अवस्थान :- स्नान किया ॥ 71 ॥
'गोकुल' देखिया आइला 'मथुरा'-नगरे। अनुभाष्य- 'वृन्दावन'-
'जन्मस्थान' देखि' रहे सेइ विप्र-घरे ॥ 69 ॥ “अहो वृन्दावनं रम्यं यत्र गोवर्धनो गिरिः।”
अनुवाद-महाप्रभु गोकुलका दर्शन करके 'मथुरा'- “वृन्दावनं द्वादशमं वृन्दया परिरक्षितम्॥ ”
नगरीमें आये और उन्होंने वहाँ श्रीकृष्ण जन्मस्थानके [अर्थात् “अहो ! वृन्दावन अति रमणीय स्थान है,
दर्शन किये। मथुरामें वे उन सनोड़िया ब्राह्मणके घरमें जहाँ गिरिराज गोवर्धन हैं। बारह वनोंमें यह बारहवाँ वन
रहे ॥ 69 ॥ है और वृन्दादेवीके द्वारा यह सभी प्रकारसे सुरक्षित
लोगोंकी भीड़के कारण वहाँसे है।"]
जाकर अक्रूरतीर्थमें रहना :- (भक्तिरत्नाकर पाँचवीं-तरङ्गमें)-
लोकेर संघट्ट देखि' मथुरा छाड़िया। “कृष्णेर परमप्रिय धाम-वृन्दावन।
एकान्ते 'अक्रूर-तीर्थे' रहिला आसिया ॥ 70 ॥ कृष्णदेहरूप 'पञ्चयोजन' एइ वन।
अनुवाद-मथुरामें लोगोंकी भीड़को देखकर महाप्रभु ×× वृन्दावन-षोलक्रोश, लोके इहा प्रचार ॥ ”
[अर्थात् “यह वृन्दावन-धाम श्रीकृष्णका परम प्रिय
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