श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भूगर्भ, श्रीलोकनाथ-गुणेर आलय॥
श्रीमाधव, श्रीपरमानन्द-भट्टाचार्य।
श्रीमधुन-पण्डित-याँर चरित्र आश्चर्य॥
प्रेमी कृष्णदास, कृष्णदास ब्रह्मचारी।
यादव आचार्य, नारायण कृपावान्।
श्रीपुण्डरीकाक्ष-गोसाञि, गोविन्द, ईशान॥
श्रीगोविन्द, वाणीकृष्णदास अत्युदार।
श्रीउद्धव-मध्ये मध्ये गौड़े गति याँर॥
द्विज-हरिदास, कृष्णदास कविराज।
श्रीगोपालदास याँर अलौकिक काय।
श्रीगोपाल, माधवादि यतेक वैष्णव।”
[श्रीनिवासाचार्यके द्वारा ग्रन्थरूपी रत्नोंको लेकर
वृन्दावनसे गौड़देश जानेके समय विदायी देनेके लिये
एकत्रित वैष्णवगण-परम दयामय श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी,
गुणोंके भण्डार श्रीभूगर्भ और श्रीलोकनाथ गोस्वामी,
श्रीमाधव, श्रीपरमानन्द-भट्टाचार्य, श्रीमधुन-पण्डित जिनका
चरित्र आश्चर्यजनक है, प्रेमी कृष्णदास, श्रीकृष्णदास
ब्रह्मचारी, श्रीयादव आचार्य, कृपामय श्रीनारायण,
श्रीपुण्डरीकाक्ष-गोसाईं, श्रीगोविन्द, श्रीईशान, श्रीगोविन्द,
परम उदार श्रीवाणीकृष्णदास, श्रीउद्धव जो बीच-बीचमें
गौड़देश जाया करते थे, श्रीद्विज-हरिदास, श्रीकृष्णदास
कविराज, श्रीगोपालदास जिनके कार्य अलौकिक होते
थे, श्रीगोपाल, श्रीमाधवादि जितने भी वैष्णव व्रजमें
थे।"]॥ 49-52॥
एक मासके बाद श्रीगोपाल और श्रीरूपका
अपने-अपने स्थानपर लौटना :-
एकमास रहि' गोपाल गेला निज-स्थाने।
श्रीरूप-गोसाञि आइला श्रीवृन्दावने॥ 54॥
अनुवाद-एक मास तक मथुरामें रहकर श्रीगोपाल
अपने स्थानपर लौट गये और श्रीरूप-गोस्वामी श्रीवृन्दावन
धाममें आ गये॥ 54॥
महाप्रभुका काम्यवनमें आगमन :-
प्रस्तावे कहिलुँ गोपाल-कृपार आख्यान।
तबे महाप्रभु गेला 'श्रीकाम्यवन'॥ 55॥
अनुवाद-प्रसङ्ग आनेपर ही मैंने श्रीगोपालकी
कृपाका वर्णन किया है। महाप्रभु श्रीगोपालका दर्शन
करके 'श्रीकाम्यवन'में गये॥ 55॥
अनुभाष्य- 'काम्यवन'-आदि-वाराहमें-
“चतुर्थं काम्यकवनं वनानां वनमुत्तमम्।
तत्र गत्वा नरो देवि मम लोके महीयते॥”
[अर्थात् “ब्रजमण्डलके बारह वनोंमें चौथा वन
काम्यवन है। यह व्रजमण्डलके सर्वोत्तम वनोंमें-से एक
है। इस वनकी परिक्रमा करनेवाला सौभाग्यवान् व्यक्ति
मेरे व्रजधाममें पूजनीय होता है।”]
भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं-तरङ्गमें-
“एइ काम्यवने कृष्णलीला मनोहर।
करिबे दर्शन स्थान कुण्ड बहुतर॥
काम्यवने यत तीर्थ लेखा नाहि तार॥”
[अर्थात् “इस काम्यवनमें श्रीकृष्णकी अनेक मनोहर
लीलाएँ होती हैं। इस वनमें बहुत दर्शनीय कुण्ड हैं।
काम्यवनमें जितने तीर्थ हैं, उनका वर्णन करना सम्भव
नहीं है।"]॥ 55॥
वृन्दावनमें सभी लीला-स्थलियोँका दर्शन :-
प्रभुर गमन-रीति पूर्वे ये लिखिल।
सेइमत वृन्दावने तावत् देखिल॥ 56॥
अनुवाद-मैंने महाप्रभुके वृन्दावनमें भ्रमण करनेका
वृत्तान्त लिखा है। उसी प्रकार ही महाप्रभुने प्रेमाविष्ट
होकर सम्पूर्ण वृन्दावनका दर्शन किया॥ 56॥
वृन्दावनसे नन्दीश्वरमें श्रीनन्दके घरका दर्शन और
प्रेम-विह्वलता :-
ताँहा लीलास्थली देखि' गेला 'नन्दीश्वर'।
'नन्दीश्वर' देखि' प्रेमे हइला विह्वल॥ 57॥
अनुवाद-काम्यवनमें श्रीकृष्णकी लीलास्थलियोंके
दर्शन करके महाप्रभु 'नन्दीश्वर'में (नन्दभवनमें) गये।
नन्दभवनमें पहुँचकर महाप्रभु प्रेममें विह्वल हो गये॥ 57॥
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