श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1578, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 18/17–26 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीनारायणके आदि प्रकाश हैं। महाप्रभु प्रेममें मत्त
होकर श्रीहरिदेवके आगे नृत्य करने लगे। महाप्रभुके
अद्भुत रूप और प्रेमके विषयमें सुनकर सब लोग उन्हें
देखनेके लिये आये॥ 17-19॥
महाप्रभुके दर्शनसे सभीको विस्मय; श्रीहरिदेवके
सेवकोंके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :-
प्रभु-प्रेम-सौन्दर्य देखि' लोके चमत्कार।
हरिदेवेर भृत्य प्रभुर करिल सत्कार ॥ 20 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके प्रेम तथा सौन्दर्यको देखकर
लोग आश्चर्यचकित हो गये। श्रीहरिदेवके सेवकोंने
महाप्रभुका बहुत आदर-सत्कार किया॥ 20 ॥
ब्रह्मकुण्डमें बलभद्रके द्वारा रसोई बनाना,
महाप्रभुका स्नान और भोजन करना :-
भट्टाचार्य 'ब्रह्मकुण्डे' पाकयात्रा कैल।
ब्रह्मकुण्डे स्नान करि' प्रभु भिक्षा कैल॥ 21 ॥
अनुवाद—श्रीबलभद्र भट्टाचार्यने ब्रह्मकुण्डपर रसोई
बनायी। महाप्रभुने ब्रह्मकुण्डमें स्नान करनेके बाद
भोजन ग्रहण किया॥ 21 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पाक'—चावल, सब्जी आदि
बनाना॥ 21 ॥
श्रीहरिदेव मन्दिरमें रात्रि व्यतीत करना और गोवर्धन-स्थित
श्रीगोपालके दर्शनकी चिन्ता :-
से-रात्रि रहिला हरिदेवेर मन्दिरे।
रात्र्ये महाप्रभु करे मनेते विचारे ॥ 22 ॥
'गोवर्धन-उपरे आमि कभु ना चड़िब।
गोपाल-रायेर दरशन केमने पाइब!' ॥ 23 ॥
अनुवाद—उस रात महाप्रभु श्रीहरिदेवके मन्दिरमें
ही रहे और रात्रिमें विचार करने लगे कि 'मैं गोवर्धनके
ऊपर तो कभी भी नहीं चढूँगा, तब फिर मुझे
गोपाल-रायके दर्शन किस प्रकार प्राप्त होंगे!'॥ 22-23 ॥
म्लेच्छके भयके छलसे श्रीगोपाल-ठाकुरके
द्वारा महाप्रभुको दर्शन देना :-
एत मने करि' प्रभु मौन करि' रहिला।
जानिया गोपाल म्लेच्छभय-भङ्गी उठाइला ॥ 24 ॥
अनुवाद—मनमें ऐसा विचार करके महाप्रभु मौन
धारण करके रहे। महाप्रभुके मनकी बातको जानकर
श्रीगोपालने म्लेच्छोंके भयकी चाल चली॥ 24 ॥
ग्रन्थकार-कृत श्लोक :-
अनारुरुक्षवे शैलं स्वस्मै भक्ताभिमानिने।
अवरुह्य गिरेः कृष्णो गौराय स्वमदर्शयत् ॥ 25 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 25 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गोवर्धन पर्वतपर नहीं चढूँगा'—
ऐसी प्रतिज्ञासे युक्त और 'मैं कृष्णभक्त हूँ'—इस
अभिमानसे युक्त श्रीगौरचन्द्रको श्रीगोपालने स्वयं गोवर्धनसे
उतरकर दर्शन दिये॥ 25 ॥
अनुभाष्य—
गिरेः (गोवर्धनशैलस्य) [उच्चप्रदेशात्] अवरुह्य (अवतीर्य)
शैलं (गोवर्धनगिरिम्) अनारुरुक्षवे (आरोढुमनिच्छवे) भक्ताभिमानिने
(भजनीयवस्तुभेदेऽपि आत्मानं सेवकतया मन्यमानाय) स्वस्मै
(आत्मने) गौराय (स्वरूपविग्रहाय कृष्णस्वरूपाय) स्वम् (आत्मानम्)
अदर्शयत् (प्रदर्शयामास)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 25 ॥
म्लेच्छोंके दुराचारकी बातको लोगोंमें फैलाकर श्रीगोपालके
द्वारा नीचे गाँठोलि-ग्राममें उतरना :-
'अन्नकूट'-नामे ग्रामे गोपालेर स्थिति।
राजपुत-लोकेर सेइ ग्रामे वसति ॥ 26 ॥
अनुवाद—श्रीगोपाल उस समय गोवर्धनमें 'अन्नकूट'
नामक ग्राममें विराजमान थे तथा उस ग्राममें राजपूत
लोगोंका वास था॥ 26 ॥
अनुभाष्य—भक्तिरत्नाकरकी पाँचवीं तरङ्गमें,—
“गोपगोपी भुञ्जायेन कौतुक अपार।
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