श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1576, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 18/2-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो,
समस्त गौरभक्तवृन्दकी जय हो॥२॥
आरिट्-ग्राममें आकर बाह्यदशाकी प्राप्ति :—
एइमत महाप्रभु नाचते नाचते।
‘आरिट्’-ग्रामे आसि’ ‘बाह्य’ हैल आचम्बिते॥३॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु प्रेमाविष्ट होकर नृत्य
करते-करते आरिट्-ग्राममें पहुँचे। वहाँपर आकर उन्हें
अचानक बाह्यज्ञान हुआ॥३॥
अनुभाष्य—‘आरिट्’-‘अरिष्ट’-ग्राम, वर्तमान समयमें
‘अरिङ्ग’के नामसे जाना जाता है॥३॥
वहाँ राधाकुण्डके विषयमें जिज्ञासा,
सभी उस विषयमें अनजान :—
अरिष्टे राधाकुण्ड-वार्त्ता पुछे लोक-स्थाने।
केह नाहि कहे, सङ्गेर ब्राह्मण ना जाने॥४॥
श्रीराधा-भाव-कान्तिसे युक्त श्रीगौरके द्वारा लुप्त
श्रीराधाकुण्डका प्रकाश :—
तीर्थ ‘लुप्त’ जानि’, प्रभु सर्वज्ञ भगवान्।
दुइ धान्यक्षेत्रे अल्पजले कैला स्नान॥५॥
देखि’ सब ग्राम्य-लोकेर विस्मय हैल मन।
प्रेमे प्रभु करे राधाकुण्डेर स्तवन॥६॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥४-६॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘आरिट्ग्राम’,—जहाँ अरिष्टासुरका
वध हुआ था, वहाँ आकर महाप्रभुने ‘राधाकुण्ड कहाँ
है?’—यह बात सबसे पूछी; किन्तु कोई भी नहीं बता
पाया और उनके सङ्गी ब्राह्मण भी इस विषयमें नहीं
जानते थे। महाप्रभु यह जान गये कि वह तीर्थ ‘लुप्त’
हो गया है। तब सर्वज्ञ भगवान्ने निकटमें स्थित दो
धानके खेतोंमें जो थोड़ा-थोड़ा जल था, उनमें स्नान
किया। इसलिये ये धानके खेत ही राधाकुण्ड और
श्यामकुण्ड हैं, ऐसा सूचित हुआ। [प्रेममें डूबकर
महाप्रभु तब राधाकुण्डकी स्तुति करने लगे।]॥४-६॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीराधासे अभिन्न
श्रीराधाकुण्डकी महिमाका स्तव :—
“सब गोपी हैते राधा कृष्णेर प्रेयसी।
तैछे राधाकुण्ड-प्रिय, ‘प्रियार सरसी’॥७॥
अनुवाद—“सब गोपियोंमेंसे श्रीमती राधिका
श्रीकृष्णकी परम प्रेयसी हैं। उसी प्रकार श्रीकृष्णको
राधाकुण्ड अत्यधिक प्रिय है, क्योंकि वह श्रीमती
राधिकाका अति प्रिय कुण्ड है॥७॥
पद्मपुराण-वाक्य :—
यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा।
सर्वगोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्तवल्लभा॥८॥
अनुवाद—श्रीराधिका जिस प्रकार श्रीकृष्णकी प्रिया
हैं, राधाकुण्ड भी वैसे ही उनका प्रिय स्थान है। सभी
गोपियोंमें श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया हैं॥८॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/215 संख्या देखें॥८॥
येइ कुण्डे नित्य कृष्ण राधिकार सङ्गे।
जले जलकेलि करे, तीरे रास-रङ्गे॥९॥
सेइ कुण्डे येइ एकबार करे स्नान।
ताँरे राधा-सम ‘प्रेम’ कृष्ण करे दान॥१०॥
कुण्डेर ‘माधुरी’—येन राधार ‘मधुरिमा’।
कुण्डेर ‘महिमा’—येन राधार ‘महिमा’॥”११॥
अनुवाद—जिस कुण्डमें श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाके
साथ नित्य जलमें जलक्रीड़ा करते हैं और उसके
तटपर आनन्दपूर्वक रास लीला करते हैं, उसी कुण्डमें
जो एकबार भी स्नान करता है, श्रीकृष्ण उन्हें श्रीमती
राधिकाके समान प्रेम प्रदान करते हैं। राधाकुण्डकी
‘माधुरी’ श्रीमती राधिकाकी ‘मधुरिमा’के समान है और
कुण्डकी ‘महिमा’ भी श्रीमती राधिकाकी ‘महिमा’के
समान है॥९-११॥
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