श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1558, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/137-141 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
ब्रह्मानन्दसे भी आकर्षित करके अपने वशमें करता
है॥137॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'मैं ही ब्रह्म हूँ'—ऐसी बुद्धि
जिन लोगोंकी उदित होती है, उनमें माया चिन्ता दूर
होकर चित्स्वरूप-ब्रह्ममें अवस्थितिरूप थोड़ा सा सुखका
उदय तो होता है; किन्तु जो लोग श्रीकृष्णनाम,
श्रीकृष्णरूप, श्रीकृष्णगुण और श्रीकृष्णलीला-रूपी चिन्मय
रस-विलास हृदयमें उदित करा पाते हैं, वे 'ब्रह्मानन्द'से
अनन्त गुणा श्रेष्ठ पूर्णानन्द लीलारस भोग करते हैं।
इसलिये पूर्णानन्द लीलारस-स्वरूप श्रीकृष्णलीला सहसा
ब्रह्मज्ञानीको भी आकर्षित करके अपने वशमें कर
लेती है॥137॥
श्रीकृष्णलीलाके माधुर्यसे आकर्षित ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मरात :-
श्रीमद्भागवतमें (12/12/69)—
स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावो-
ऽप्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम्।
व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं
तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ 138 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो पहले ब्रह्मसुखमें एकान्तचित्त
थे और बादमें जिन्होंने उस सुखको परित्याग करके
श्रीकृष्णकी माधुर्यमयी लीलासे आकृष्ट होकर
श्रीकृष्ण-सम्बन्धी तत्त्वदीप-स्वरूप श्रीभागवत पुराणका
विस्तार किया था; उन समस्त प्रकारके पापोंका नाश
करनेवाले गुरुदेव व्यासपुत्र श्रीशुकको मैं नमस्कार
करता हूँ॥ 138 ॥
अनुभाष्य—वास्तविक रूपमें सुननेके अभिलाषी
शौनकादि ऋषियोंके समक्ष श्रीभागवतके वर्णनको समाप्त
करके महाभागवत श्रीसूत गोस्वामी अपने गुरुदेव
ब्रह्मरात श्रील शुक-गोस्वामीको प्रणाम कर रहे हैं,—
स्वसुखनिभृतचेताः (स्वस्य आत्मनः सुखेन निभृतं पूर्णं
चेतो यस्य सः, आत्माराम इत्यर्थः) तद्व्युदस्तान्यभावः (तत्
तेनैव आत्मारामत्वेन व्युदस्तः सम्यग्-दूरीकृतः अन्यभावो
ब्रह्मेतरे अन्यस्मिन् वस्तुनि भावः रतिः यस्य तथाभूतः) अपि
अजितरुचिरलीलाकृष्टसारः (अजितस्य कृष्णस्य रुचिराभिः
मनोज्ञाभिः लीलाभिः आकृष्टः सारः स्वसुखगतं स्थैर्यं यस्य
सः) यः तत्त्वदीपं (परमार्थभूत-वस्तु-प्रकाशकं) तदीयं
(भगवल्लीलामयं) पुराणं (दशविधलक्षणमय-सन्दर्भात्मकं
श्रीमद्भागवतं) कृपया (लोकस्याजानतः हिताय, सुकृतिवतां
मङ्गलाकाङ्क्षया वा) व्यतनुत (प्रकटितवान्), तम् अखिलवृजिनघ्नं
(सर्वपापनुदं) व्याससूनुं (द्वैपायनात्मजं वैयासकीं शुकदेवं) नतः
अस्मि (प्रणमामि)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥
परम चमत्कारपूर्ण श्रीकृष्णगुण-आत्मारामगणोंको
भी आकर्षित करनेवाले :-
ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द कृष्णगुण।
अतएव आकर्षय आत्मारामेर मन ॥ 139 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णके गुण पूर्ण-आनन्दमय हैं, इसलिये
वे आत्मारामगणोंके मनको ब्रह्मानन्दसे भी आकर्षित
कर लेते हैं॥ 139 ॥
मुक्तपुरुषगण भी श्रीकृष्णके चरणोंके प्रति आकृष्ट :-
श्रीमद्भागवत (1/7/10)में—
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणोः हरिः ॥ 140 ॥
अनुवाद—आत्मामें ही जिनकी रति है, ऐसे
वासना-ग्रन्थियोंसे शून्य सभी मुनि भी बृहत्कर्मा श्रीकृष्णकी
अहैतुकी भक्ति करते हैं; क्योंकि जगत्के चित्तहारी
श्रीहरिका ऐसा ही एक गुण है॥ 140 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 6/186 संख्या देखें ॥ 140 ॥
श्रीकृष्णचरण-तुलसी ब्रह्मज्ञोंके भी मनोहारिणी :-
एइ सब रहु—कृष्णचरण-सम्बन्धे।
आत्मारामेर मन हरे तुलसीर गन्धे ॥ 141 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णकी लीलाओंकी बात तो छोड़ो,
श्रीकृष्णके चरणोंमें अर्पित होनेपर तुलसीकी गन्धमात्र ही
आत्मारामोंके मनका हरण कर लेती है ॥ 141 ॥
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