श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1536, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/287-290 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
मनुष्यकी शक्तिसे वर्णन नहीं किये जा सकते ॥ 287 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
सोलहवें अध्यायके अमृतप्रवाह भाष्यका अनुवाद समाप्त।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 290 ॥
साक्षात् अनन्त भी श्रीगौरलीलाके अन्तको
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे पुनर्गौड़गमन-विलासो नाम
पानेमें समर्थ नहीं :-
षोड़श-परिच्छेदः।
सहस्र-वदने कहे आपने 'अनन्त'।
अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
तबु एक लीलार तँहो नाहि पाय अन्त ॥ 289 ॥
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
अनुवाद-स्वयं श्रीअनन्तदेव अपने सहस्र मुखोंसे
वर्णन कर रहा है॥ 290 ॥
महाप्रभुकी लीलाका गान करते हैं, किन्तु तब भी वे
श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यखण्ड पुनः गौड़गमन-विलास-नामक
एक लीलाका भी अन्त नहीं पाते ॥ 289 ॥
सोलहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
90 ।