श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1497, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय 16/14-23 ]
तथापि चलिला महाप्रभुरे देखिते।
नित्यानन्देर प्रेम-चेष्टा के पारे बुझिते ॥ 15 ॥
अनुवाद- यद्यपि महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको
प्रेमभक्तिका प्रचार करनेके लिये बङ्गालमें रहनेकी ही
आज्ञा दी थी, तथापि वे महाप्रभुके दर्शनोंके लिये चल
पड़े। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी प्रेममयी चेष्टाओंको कौन
समझ सकता है? ॥ 14-15 ॥
गौड़ीय-भक्तोंकी यात्रा :-
आचार्यरत्न, विद्यानिधि, श्रीवास, रामाइ।
वासुदेव, मुरारि, गोविन्दादि तीन भाइ ॥ 16 ॥
पाणिहाटीके श्रीराघव, कुलीनग्रामके
श्रीसत्यराजादिका गमन :-
राघव-पण्डित निज-झालि साजाञा।
कुलीन-ग्रामवासी चले पट्टडोरी लञा ॥ 17 ॥
खण्डसे श्रीनरहरि आदिकी यात्रा :-
खण्डवासी नरहरि, श्रीरघुनन्दन।
सर्वभक्त चले, तार के करे गणन ॥ 18 ॥
अनुवाद- श्रीआचार्यरत्न, श्रीविद्यानिधि, श्रीवास, श्रीरामार्इ,
श्रीवासुदेव, श्रीमुरारि, श्रीगोविन्दादि (श्रीगोविन्द, श्रीमाधव
और श्रीवासुदेव) - ये तीनों भाई, श्रीराघव पण्डित
महाप्रभुके लिये खानेकी बहुतसी वस्तुओंको झोलियोंमें
भरकर और कुलीन-ग्रामवासी रेशमी रस्सियोंको लेकर
चल दिये। खण्डवासी श्रीनरहरि और श्रीरघुनन्दन तथा
अन्य सभी भक्त महाप्रभुके दर्शनके लिये चलने लगे।
कौन उन सबकी गणना कर सकता है? ॥ 16-18 ॥
पथको जाननेवाले श्रीशिवानन्द-सेन सभीके संरक्षक और
परिचालकके रूपमें :-
शिवानन्द-सेन करे घाटि समाधान।
सबारे पालन करि' सुखे लञा यान ॥ 19 ॥
सबार सर्वकार्य करेन, देन वासा-स्थान।
शिवानन्द जाने उड़िया-पथेर सन्धान ॥ 20 ॥
अनुवाद- श्रीशिवानन्द सेनने मार्गके और नदी पार
करनेके सब शुल्कका भुगतान किया। सभीकी
सुख-सुविधाका ध्यान रखते हुए आनन्दसे उनको ले
जा रहे थे। वे सभीके समस्त कार्योंको कर देते और
उन्हें रहनेका स्थान प्रदान करते। वे उड़ीसाके मार्गके
विषयमें सब कुछ जानते थे ॥ 19-20 ॥
अनुभाष्य - 'घाटी-समाधान' - धनकी कमीकी पूर्ति
अथवा निर्दिष्ट पथ और नदीघाटको पार करनेके लिये
यात्रियोंके द्वारा दिये जानेवाले शुल्कको चुकाना ॥ 19 ॥
महाप्रभुके दर्शनके लिये वैष्णव-गृहिणियोंका गमन :-
(1) श्रीअद्वैतपत्नीकी यात्रा :-
से वत्सर प्रभु देखिते सब ठाकुराणी।
चलिला आचार्य-सङ्गे अच्युत-जननी ॥ 21 ॥
अनुवाद- उस वर्ष महाप्रभुके दर्शनके लिये सभी
भक्तोंकी पत्नियाँ भी उनके साथ आयीं। श्रीअद्वैताचार्यके
साथ उनकी पत्नी सीतादेवी, अच्युतकी माता, भी चल
पड़ीं ॥ 21 ॥
(2) श्रीवासकी पत्नी और
(3) श्रीशिवानन्दकी पत्नीकी यात्रा :-
श्रीवास-पण्डित-सङ्गे चलिला मालिनी।
शिवानन्द-सङ्गे चले ताँहार गृहिणी ॥ 22 ॥
अनुवाद- श्रीवास पण्डितके साथ उनकी पत्नी
श्रीमालिनी और श्रीशिवानन्द सेनके साथ उनकी पत्नी
भी चलने लगीं ॥ 22 ॥
शिवानन्दके पुत्र श्रीचैतन्यदासकी यात्रा :-
शिवानन्देर बालक, नाम-चैतन्यदास।
तैँहो चलियाछे प्रभुरे देखिते उल्लास ॥ 23 ॥
अनुवाद- श्रीशिवानन्द सेनके पुत्र, जिनका नाम
चैतन्यदास था, वे भी बड़े उल्लाससे महाप्रभुके दर्शनके
लिये चल पड़े ॥ 23 ॥
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