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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1492, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1492

[ 15/287-297 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रसन्न होऊँगा। जब तक आप लौटकर प्रसाद पा नहीं
लेते, तब तक मैं यहींपर ही बैठा रहूँगा॥" 287-289॥
श्रीभट्टाचार्यका अमोघके लिये क्रोध-प्रदर्शन :-
प्रभु-पद धरि' भट्ट कहिते लागिला।
“मरित' अमोघ, तारे केने जीयाइला॥" 290॥
अनुवाद—महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर श्रीभट्टाचार्य
कहने लगे,—"अमोघ मर जाता तो अच्छा होता,
आपने उसे जीवित क्यों किया? ॥" 290॥
बालक-समझकर अमोघको क्षमा-करनेका उपदेश :-
प्रभु कहे,—"अमोघ शिशु, तोमार बालक।
बालक-दोष ना लय पिता, ताहाते पालक ॥ 291॥
अमोघके अपराध दूर होनेपर वैष्णवता-हेतु
श्रीभट्टाचार्यको प्रसन्न होनेके लिये अनुरोध :-
एबे 'वैष्णव' हैल, तार गेल 'अपराध'।
ताहार उपरे एबे करह प्रसाद॥" 292॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"अमोघ बालक है, और
आपका पुत्र भी है। पिता पुत्रके दोषको नहीं लेते,
क्योंकि वे तो पुत्रका पालन करनेवाले होते हैं। अब
अमोघ 'वैष्णव' बन गया है और उसका 'अपराध' दूर
हो गया है। अब आप निश्चिन्त होकर उसपर कृपा
कर सकते हैं॥" 291-292॥
श्रीभट्टाचार्यका क्रोध त्याग :-
भट्ट कहे,—"चल, प्रभु, ईश्वर-दरशने।
स्नान करि' हेथा मुञि आसिलाङ एखने॥" 293॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—"प्रभो, आप जाकर
श्रीजगन्नाथका दर्शन कीजिये। मैं भी अभी स्नान करके
वहाँ दर्शन करके वापिस आता हूँ॥" 293॥
श्रीभट्टाचार्यकी प्रसाद सेवाके दर्शनके लिये
श्रीगोपीनाथको प्रतीक्षा करनेके लिये आदेश :-
प्रभु कहे,—"गोपीनाथ, इहाञि रहिबा।
इँहो प्रसाद पाइले, वार्त्ता आमाके कहिबा ॥" 294॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"गोपीनाथजी, आप यहाँ
रहिये और श्रीसार्वभौमके प्रसाद पानेपर मुझे आकर
बता देना॥" 294॥
अनुभाष्य— इँहो'—सार्वभौम भट्टाचार्य ॥ 294॥
श्रीभट्टाचार्यका प्रसाद-सेवन :-
एत बलि' प्रभु गेला ईश्वर-दरशने।
भट्ट स्नान-स्मरण करि' करिला भोजने ॥ 295॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शन
करनेके लिये चले गये। श्रीभट्टाचार्यने स्नान और
श्रीजगन्नाथका स्मरण किया तथा उसके बाद भोजन
ग्रहण किया ॥ 295॥
महाप्रभुके ऐकान्तिक भक्त महाशान्त-प्रकृति अमोघ :-
सेइ अमोघ हैल प्रभुर भक्त 'एकान्त'।
प्रेमे नाचे, कृष्णनाम लय महाशान्त ॥ 296॥
अनुवाद—वे अमोघ अब महाप्रभुके 'ऐकान्तिक'
भक्त हो गये, अब वे सब समय प्रेममें नृत्य करते और
शान्तिपूर्वक श्रीकृष्णनामका कीर्तन करते॥ 296॥
अनुभाष्य—शाखा-निर्णयामृतमें—
“अमोघपण्डितं वन्दे श्रीगौरेणात्मसात्कृतम्।
प्रेमाद्गदसान्द्राङ्गं पुलकाकुलविग्रहम्॥”
[अर्थात् “मैं अमोघ पण्डितकी वन्दना करता हूँ
जिन्हें महाप्रभुने आत्मसात् किया था। महाप्रभुके द्वारा
स्वीकार किये जानेपर वे सदा ही प्रेममें डूबे रहते और
उसके कारण उनका कण्ठ गद्गद होना, शरीर पुलकित
होना आदि सात्त्विक विकार प्रकाशित होते थे।”] ॥ 296॥
महाप्रभुकी इस प्रकारकी लीला :-
ऐछे चित्र लीला करे शचीर नन्दन।
येइ देखे, सुने, ताँर विस्मय हय मन ॥ 297॥
अनुवाद—श्रीशचीनन्दन ऐसी विचित्र लीलाएँ करते
हैं। जो भी उनकी लीलाओंको देखता अथवा सुनता
है, वह आश्चर्यचकित हो जाता है॥ 297॥
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