श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1483, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय [ 15/238–242 ]
महाप्रभुकी प्रचुर अन्न ग्रहण करनेमें आपत्ति;
श्रीभट्टाचार्यकी उनसे शिकायत :—
तथापि एतेक अन्न खाओन ना याय।”
भट्ट कहे,—“जानि, खाओ यतेक युयाय॥ २३८ ॥
नीलाचले भोजन तुमि कर बायान्न बार।
एक एक भोगेरे अन्न शत शत भार॥ २३९ ॥
अनुवाद—महाप्रभुने आगे कहा कि तो भी इतना अन्न नहीं खाया जा सकता।” श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“किन्तु मैं जानता हूँ कि आप कितना खा सकते हैं। नीलाचलमें (श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें) आप दिनमें बावन बार भोजन करते हैं और हर बार आप सैकड़ों पात्रोंमें भरे भोगको खाते हैं॥ २३८-२३९ ॥
महाप्रभुका द्वारका, मथुरा और ब्रजलीलामें भोजन-प्रकार :—
द्वारकाते षोल-सहस्र महिषीर घरे।
अष्टादश माता, आर यादवेर घरे॥ २४० ॥
व्रजे ज्येठा, खुड़ा, मामा, पिसादि गोपगण।
सखावृन्द सबार घरे द्विसन्ध्या-भोजन॥ २४१ ॥
अनुवाद—द्वारकामें सोलह हजार महिषियोंके घरोंमें, अठारह माताओं और यादवोंके घरोंमें एवं व्रजमें ताऊ, चाचा, मामा, फूफा आदि गोपों और सभी सखाओंके घरोंमें दोनों सन्ध्याओंमें आप भोजन करते हो॥ २४०-२४१ ॥
अनुभाष्य—'अष्टादश माता'—देवकी, रोहिणी आदि।
'व्रजे ज्येठा'—अर्थात् ताऊ। (श्रीरूपप्रभु कृत श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)—
“उपनन्दोऽभिनन्दश्च पितृव्यौ पूर्वजौ पितुः”
अर्थात् 'उपनन्द' और 'अभिनन्द'—ये दोनों श्रीकृष्णके ताऊजी हैं।
'खुड़ा'—अर्थात् चाचा। (श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)—
“पितृव्यौ तु कनीयांसौ स्यातां सत्रन्द-नन्दनौ”
अर्थात् 'सन्नन्द' और 'नन्दन' अथवा 'सुनन्द' और 'पाण्डव'—ये कृष्णके चाचा हैं।
'मामा'—(श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)—
“यशोधर-यशोदेव-सुदेवाद्यास्तु मातुलाः”
अर्थात् 'यशोधर', 'यशोदेव' और 'सुदेव' आदि श्रीकृष्णके मामा हैं।
'फूफा'—(श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकामें)—
“महानीलः सुनीलश्च रमणावेतयोः क्रमात्”
अर्थात् 'महानील' और 'सुनील'—श्रीकृष्णके ये दो फूफा हैं, वे 'सानन्दा' और 'नन्दिनी'-नामक दो बुआओंके पति हैं।
'सखावृन्द'—(श्रीकृष्णगणोद्देशदीपिकाके परिशिष्टमें)—
“विशाल-वृषभौर्जस्वि-देवप्रस्थ-वरुथपाः।
मन्दारः कुसुमापीडमणिबन्धकरास्तथाः॥
मन्दरश्चन्दनः कुन्दः कलिन्द-कुलिकादयः।
'कनिष्ठकल्पाः' सेवायां सखायो विपुलाग्रहाः॥ ”
“श्रीदामा दामा सुदामा वसुदाम तथैव च।
किङ्किणी-भद्रसेनांशु स्तोककृष्णाः विलासिनः।
पुण्डरीक-विटङ्काक्ष-कलविङ्क-प्रियङ्गराः।
एते 'प्रियसखाः' शान्ताः कृष्णप्राणसमा मताः॥ ”
“सुबलाज्जुन-गन्धर्व-वसन्तोज्ज्वल-कोकिलाः।
स-नन्दन-विदाग्धाद्याः प्रियनर्मसखा मताः॥ ”
[अर्थात् “विशाल, वृषभ, ओजस्वी, देवप्रस्थ, वरुथप, मन्दार, कुसुमापीड़, मणिबन्धकर, मन्दर, चन्दन, कुन्द, कलिन्द, कुलिक आदि अनेक श्रीकृष्णके 'सखा' हैं। ये श्रीकृष्णसे आयुमें छोटे हैं और सदा श्रीकृष्णकी सेवामें तत्पर रहते हैं। श्रीदाम, दाम, सुदाम, वसुदाम, किङ्किणी, भद्रसेन, अंशु, स्तोककृष्ण, विलासी, पुण्डरीक, विटङ्काक्ष, कलविङ्क, प्रियङ्कर—ये श्रीकृष्णके 'प्रियसखा' हैं और उनके समान आयुके हैं। सुबल, अर्जुन, गन्धर्व, वसन्त, उज्ज्वल, कोकिल, सनन्दन और विदग्ध श्रीकृष्णके 'प्रियनर्मसखा' हैं।”] ॥ २४०-२४१ ॥
उस परिमाणकी तुलनामें श्रीभट्टाचार्यके द्वारा अर्पित अन्न तो अति अल्प :—
गोवर्धन-यज्ञे अन्न खाइला राशि राशि।
तार लेखाय एइ अन्न नहे एक ग्रासी॥ २४२ ॥
३७