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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1476, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1476

[ 15/180–188 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुचरेत् (प्रतिपादयेत्—"यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते", “यो
ब्राह्मणे विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै”, “यः
आत्मनि तिष्ठन्”, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यादि श्रुतिभ्यः)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (श्रुतिके
ये मन्त्र इसी बातका प्रतिपादन करते हैं— “यतो वा
इमानि भूतानि जायन्ते' अर्थात् जिनसे समस्त प्राणी-समुदाय
उत्पन्न हुआ है, “यो ब्राह्मणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च
प्रहिणोति तस्मै” अर्थात् प्रारम्भमें श्रीकृष्णने ब्रह्माको
वेदोंका ज्ञान प्रदान किया और उन्होंने बादमें वैदिक
ज्ञानका प्रचार किया, “यः आत्मनि तिष्ठन्” अर्थात् जो
आत्मामें स्थित है, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” अर्थात् ब्रह्म
सत्य और अनन्त ज्ञानस्वरूप है॥180॥
महाप्रभुके द्वारा सभी भक्तोंको विदायी देना :-
एइ मत सर्वभक्तेरे कहिं सब गुण।
सबारे विदाय दिल करि' आलिङ्गन॥181॥
अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंके समस्त गुणोंका
वर्णन करनेके बाद महाप्रभुने उन सभी भक्तोंको
आलिङ्गन करके उन्हें विदायी दी॥181॥
परस्परके भावि-विरहकी आशङ्कासे
भक्त और भगवान्‌का विषाद :-
प्रभुर विच्छेदे भक्त करेन रोदन।
भक्तेर विच्छेदे प्रभुर विषण्ण हैल मन॥182॥
अनुवाद—महाप्रभुसे विच्छेद होनेपर भक्त रोने लगे
और भक्तके विच्छेदसे महाप्रभुका मन भी उदास हो
गया॥182॥
श्रीगदाधरको टोटा-गोपीनाथकी सेवा देना :-
गदाधर-पण्डित रहिला प्रभुर पाशे।
यमेश्वरे प्रभु याँरे कराइला आवासे॥183॥
अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित महाप्रभुके पास ही रह
गये। महाप्रभुने उन्हें यमेश्वरमें आवास-स्थान प्रदान
किया॥183॥
अमृतप्रवाह भाष्य—पाठान्तरमें 'जलेश्वर' अर्थात्
'जलेश्वरमें' है। यह पाठ शुद्ध और सार्थक नहीं लगता
क्योंकि, जलेश्वर-ग्राममें श्रीगदाधर पण्डितकी किसी
लीलाका उल्लेख नहीं है। समुद्र-बालुके पथसे
यमेश्वर-टोटामें श्रीटोटा-गोपीनाथका मन्दिर है, वहीं
श्रीगदाधर पण्डित (गोस्वामी) श्रीगोपीनाथकी सेवा और
महाप्रभुकी सेवामें आविष्ट होकर रहते थे॥183॥
अनुभाष्य—'यमेश्वर'—पुरुषोत्तममें श्रीमन्दिरके
दक्षिण-पश्चिम कोणमें बालुकाके ऊपर यमेश्वर-टोटा
अथवा बागान है। महाप्रभुने श्रीगदाधर पण्डितको वहीं
वासस्थान दिया॥183॥
छः भक्तोंके साथ महाप्रभुका पुरीमें अवस्थान :-
पुरी-गोसाञि, जगदानन्द, स्वरूप-दामोदर।
दामोदर-पण्डित, आर गोविन्द, काशीश्वर॥184॥
इसब-सङ्गे प्रभु कैसे नीलाचले।
जगन्नाथ-दरशन नित्य प्रातःकाले॥185॥
अनुवाद—श्रीपरमानन्द पुरी गोस्वामी, श्रीजगदानन्द
पण्डित, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीगोविन्द
प्रभु और श्रीकाशीश्वरके साथ महाप्रभुने नीलाचलमें
वास किया। वे प्रतिदिन प्रातःकालमें भगवान् श्रीजगन्नाथका
दर्शन करते थे॥184-185॥
श्रीसार्वभौमका महाप्रभुको एक मास भिक्षा
ग्रहण करनेका निमन्त्रण :-
प्रभु-पाश आसिं सार्वभौम एक दिन।
जोड़हात करि' किछु कैल निवेदन॥186॥
“एबे सब वैष्णव गौड़देशे चलि' गेल।
एबे प्रभुर निमन्त्रणे अवसर हैल॥187॥
'एक सम्पूर्ण मासके निमन्त्रण'को सुनकर महाप्रभुकी
आपत्ति; और संन्यासधर्मके विरुद्ध कहकर
भिक्षाका समय कम करना :-
एबे मोर घरे भिक्षा करह 'मास' भरि'।”
प्रभु कहे,—“धर्म नहे, करिते ना पारि॥”188॥
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