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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1450, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1450

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:

[ 15/19-27 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य—'खुटिया'—उड़ीसावासी ब्राह्मणोंकी विशेष
उपाधि; 'माहाति'—उड़ीसावासी कायस्थोंकी विशेष
उपाधि॥ 19॥
राजा, मिश्र, भट्टाचार्य और तुलसी-पड़िछाके
साथ महाप्रभुका लीलाविनोद :—
आपने प्रतापरुद्र, आर मिश्र-काशी।
सार्वभौम, आर पड़िछा-पात्र तुलसी॥ 20॥
इँहा सबा लञा प्रभु करे नृत्य-रङ्ग।
दधि-दुग्ध हरिद्रा-जले भरे सबार अङ्ग॥ 21॥
अनुवाद—उस समय राजा प्रतापरुद्र भी श्रीकाशीमिश्र,
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य और तुलसी पड़िछा-पात्रके साथ
वहाँ उपस्थित थे। इन सबको अपने साथ लेकर
महाप्रभु आनन्दपूर्वक नृत्य कर रहे थे और दही-दूध
और हल्दीवाले जलसे सभी सराबोर हो रहे थे॥ 20-21॥
अनुभाष्य—'पात्र'—उड़ीसावासी सम्मानित व्यक्तियोंकी
उपाधि॥ 20॥
लाठी खेलकर अपने गोपस्वरूपको
दिखलानेका अनुरोध :—
अद्वैत कहे, —"सत्य कहि, ना करिह कोप।
लगुड़ फिराइते पार, तबे जानि गोप॥" 22॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—"मैं सत्य कह
रहा हूँ, आप क्रोध मत कीजियेगा। यदि आप लाठी
घुमाकर दिखा पायेंगे, तभी मैं मानूँगा कि आप गोप
हैं॥" 22॥
अनुभाष्य—'लगुड़'—लाठी; लाठी-खेलमें गोप अथवा
गौड़गण ही सबसे आगे होते हैं॥ 22॥
महाप्रभुके द्वारा लाठीको घुमाकर गोप-लीला-प्रदर्शन :—
तबे लगुड़ लञा प्रभु फिराइते लागिला।
बार बार आकाशे फेलि' लुफिया धरिला॥ 23॥
शिरेर उपरे, सम्मुखे, पृष्ठे, दुइ-पाशे।
पादसन्धये फिराय लगुड़, —देखि' लोक हासे॥ 24॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यकी बात सुनकर महाप्रभु
लाठीको घुमाने लगे। वे बार-बार लाठीको आकाशकी
ओर फेंकते और उसके नीचे आनेपर उसे पकड़ लेते।
महाप्रभु कभी अपने सिरके ऊपर, कभी अपने सामने,
कभी अपने पीछे, कभी अपनी दाहिनी ओर तथा कभी
अपनी बायीं ओर एवं कभी दोनों पैरोंके बीच हाथोंसे
लाठीको घुमाते जा रहे थे। इसे देखकर सभी लोग हँस
रहे थे॥ 23-24॥
अनुभाष्य—'पादसन्धये'—दोनों पैरोंके बीचके
स्थानमें॥ 24॥
उसे देखकर सभीको विस्मय :—
अलात-चक्रेर प्राय लगुड़ फिराय।
देखि' सर्वलोक-चित्ते चमत्कार पाय॥ 25॥
अनुवाद—महाप्रभु लाठीको अलात-चक्रकी भाँति
घुमा रहे थे जिसे देखकर सभी लोगोंके हृदयमें बड़ा
आश्चर्य हो रहा था॥ 25॥
अनुभाष्य—'अलातचक्र'—जलते हुए अङ्गारेको तेजीसे
घुमानेपर जैसे वह एक आगके चक्रकी भाँति प्रतीत
होता है, महाप्रभुने भी उसी प्रकार बड़ी तेजीसे लाठीको
घुमाकर ऐसा प्रदर्शन किया कि देखनेवालोंको चक्रमें
सब जगह लाठी दिख रही थी॥ 25॥
श्रीनिताइके द्वारा भी इस प्रकार लाठी घुमाकर
अपने गोपस्वरूपका प्रदर्शन :—
एइमत नित्यानन्द फिराय लगुड़।
के बुझिबे ताँहा दुँहार गोपभाव गूढ़॥ 26॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने भी उसी प्रकार लाठीको
घुमाकर दिखलाया। वहाँ उन दोनोंके गूढ़ गोपभावको
कौन समझ सकता था ?॥ 26॥
महाप्रभुके मस्तकपर तुलसी-पड़िछाके द्वारा
लाये गये प्रसादी-वस्त्रको बाँधना :—
प्रतापरुद्रेर आज्ञाय पड़िछा-तुलसी।
जगन्नाथेर प्रसाद-वस्त्र एक लञा आसि'॥ 27॥
4 ।