श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ शुनितेइ-साक्षाते श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
स्तम्भ १
शुनितेइ गोपालेर हइल १२/१४९
शुनि' प्रभु कहे किछु ६/१९०
शुनिले ना हय प्रभुर १०/११३
शुष्कतर्क-खलि खाइते १४/८७
शैल-उपरि हैते आमा ४/४२
श्लोक करि' एक तालपत्रेते १/६१
श्र
श्रद्धाय चैतन्यलीला शुने ६/२८५
श्रवण-मध्ये जीवेर कोन् ८/२५४
श्रीगोपाल' नाम मोर ४/४१
श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत ८/३०९
श्रीनृसिंह, जय नृसिंह ८/५
श्रीपाद, धर मोर गोसाञिर ९/२८९
श्रीविग्रह ये ना माने ६/१६७
श्रीवृन्दावन-भूमि-याँहा ८/२५३
श्री-वैष्णव एक, —व्येङ्कट ९/८२
श्रीभागवतसन्दर्भ-नाम ग्रन्थ १/४३
श्रीमाधवपुरीर सङ्गे श्रीरङ्ग ९/२९५
श्रुतिगण गोपीगणेर अनुगत ९/१३३
श्रुति-वाक्ये सेइ दुइ ६/१३६
श्रुति ये मुख्यार्थ कहे, सेइ ६/१३५
श्रेयो-मध्ये कोन् श्रेयः ८/२५०
श्रेष्ठ-उपास्य-युगल ८/२५५
शृङ्गार-रसराजमय-मूर्त्तिधर ८/१४२
ष
षड्विध ऐश्वर्य—प्रभुर ६/१६१
षडैश्वर्यपूर्णानन्द-विग्रह ६/१५२
स
सङ्कीर्त्तन-यज्ञे ताँरे करे ११/९९
संस्कार करिये उत्तम ६/७६
सकल-वैष्णवशास्त्र-मध्ये ९/२४०
सकल लोकेर आगे ५/११२
स्तम्भ २
सखीगण हय तार पल्लव ८/२०८
सखी बिना एइ लीला ८/२०२
सखी बिना एइ लीलाय ८/२०३
सखीभावे पाय राधाकृष्णेर ८/२२८
सखीभावे ये ताँरे करे ८/२०३
सखीर स्वभाव एक ८/२०६
सखी लीला विस्तारिया ८/२०२
सखी हैते हय एइ ८/२०१
सङ्गीत-गन्धर्व-सम, शास्त्रे १०/११६
सच्चिदानन्द-तनु, व्रजेन्द्र ८/१३५
सच्चिदानन्दमय कृष्णेर स्वरूप ८/१५३
सच्चिदानन्दमय हय ईश्वर ६/१५८
सत्य एक बात कहौँ १/२०१
सत्यविग्रह ईश्वरे', करह ९/२७७
सत्य-सीता आनि' दिल ९/२०७
सनकादि-शुकदेव ताहाते ६/१९८
संन्यास करि' विश्वरूप ७/४४
संन्यास करिला शिखा १०/१०८
संन्यास ग्रहण कैल १०/१०४
संन्यासी देखिया मोरे ९/२७२
संन्यासी' बलिया मोरे ना ८/१२८
संन्यासीर अल्प छिद्र १२/५१
संन्यासीर धर्म नहे ३/७४
संन्यासीर धर्म नहे—संन्यास ३/१७७
संन्यासीर धर्म लागि' श्रवण ६/१२७
संन्यासीर वेष देखि' ८/२८३
संन्यासीर वेषे मोरे दिला ९/२१४
'सप्तताल-वृक्ष' देखे कानन ९/३१२
सप्तदिन पर्यन्त ऐछे करेन ६/१२३
सब खण्डि' प्रभु निज-मत ६/१७७
सब-भक्तेर आज्ञा निल १४/६
सबे, एक गुण देखि ९/२७७
सबे एक दोष तार १/१९४
स्तम्भ ३
सबे एक सखीगणेर इँहा ८/२०१
सबे दण्डधन छिल, ताहा ५/१५३
सबे बले, केने आइला १/२१३
'समाः'-शब्दे कहे श्रुतिर ८/२२४
सम्पत्तिर मध्ये जीवेर ८/२४६
सम्भाषिले जानिबे तुमि ७/६५
सम्भाषिले जानिबे ताँर ७/६७
सम्यक् वासना कृष्णेर ८/११२
सर्व-अवतारी, सर्वकारण ८/१३३
सर्व-चित्ताकर्षक, साक्षात् ८/१३८
सर्व त्यजि' जीवेर कर्त्तव्य ८/२५३
सर्वत्र जल-याँहा अमृत १४/२२५
सर्वत्र स्थापय प्रभु वैष्णव ९/४४
सर्वत्र हय ताँर इष्टदेव ८/२७३
सर्वदेश वैष्णव' हैल प्रभुर ७/१०८
सर्व मत दुषि' प्रभु ९/४३
सर्वैश्वर्यपरिपूर्ण स्वयं ६/१४०
सर्वैश्वर्य-सर्वशक्ति-सर्वरस ८/१३५
सशरीरे सप्तताल अन्तर्धान ९/३१३
ससागर-शैल मही करे १३/८३
सहज गमन करे, —यैछे १४/२२४
सहज गोपीर प्रेम, —नहे ८/२१४
सहज लोकेर कथा-याँहा १४/२२४
सहजेइ नित्यानन्द-कृष्णप्रेम १/२
सहजेइ पूज्य तुमि, आरे ६/५६
सहजे विचित्र मधुर चैतन्य ४/५
साक्षात् ईश्वर इँह, नाहिक १/१८०
साक्षात् ईश्वर तुमि, के ८/१२१
साक्षात् पाण्डु तुमि, तोमार १०/५३
साक्षात् महाप्रभुर द्वितीय १०/१११
साक्षात् श्रीकृष्ण, तैं हो १०/१५
साक्षाते ना देखिले मने ५/१०५
साक्षाते ना देय देखा १३/६१
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