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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1382, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1382

[ 14/78-87 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

दो-दो भक्तोंके द्वारा जलकेलि करना और
महाप्रभुके द्वारा उसका दर्शन :-
दुइ-दुइ जने मेलि' करे जल-रण।
केह हारे, केह जिने-प्रभु करे दरशन ॥ 78 ॥
अद्वैत-नित्यानन्दे जल-फेलाफेलि।
आचार्य हारिया, पाछे करे गालागालि ॥ 79 ॥
विद्यानिधिर जलकेलि स्वरूपेर सने।
गुप्त-दत्ते जलकेलि करे दुइ जने ॥ 80 ॥
श्रीवास-सहित जल खेले गदाधर।
राघव-पण्डित सने खेले वक्रेश्वर ॥ 81 ॥
सार्वभौम-सङ्गे खेले रामानन्द-राय।
गाम्भीर्य गेल दोंहार, हैल शिशुप्राय ॥ 82 ॥

“पण्डित, गम्भीर दुँहे—प्रामाणिक जन।
बाल-चाञ्चल्य करे, कराह वर्जन ॥” 84 ॥

अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम और श्रीरामानन्द
राय—दोनोंकी चञ्चलताको देखकर मुस्कुराते हुए
श्रीगोपीनाथाचार्यसे कहा,—“इन्हें बाल-चापल्य करनेसे
मना करो, क्योंकि ये दोनों ही विद्वान, गम्भीर और
समाजमें प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं॥”83-84॥

श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुकी कृपा-महिमाका वर्णन :-
गोपीनाथ कहे,—“तोमार कृपा-महासिनधु।
उछलित करे यबे तार एक बिन्दु ॥ 85 ॥
मेरु-मन्दर-पर्वत डुबाय यथा तथा।
एइ दुइ-गण्ड-शैल, इहार का कथा ॥ 86 ॥
महाप्रभुकी कृपासे शुष्कज्ञानी श्रीसार्वभौम भी
अब श्रीकृष्णसेवा-रसमें रसिक :-
शुष्कतर्क-खलि खाइते जन्म गेल याँर।
ताँरे लीलामृत पियाओ,—ए कृपा तोमार ॥” 87 ॥

अनुवाद—कभी दो भक्त एक दूसरेसे जल-युद्ध
करने लगते। इस युद्धमें एक हार जाता और दूसरा
जीत जाता—महाप्रभु ये सब क्रीड़ा देखते। एक-दूसरेपर
जल फेंकनेकी पहली क्रीड़ा श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द
प्रभुके बीच हुई। इसमें श्रीअद्वैताचार्य हार गये और
बादमें वे श्रीनित्यानन्द प्रभुको (प्रेमपूर्वक) गाली देने
लगे। श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि श्रीस्वरूप दामोदरके साथ
और श्रीमुरारि गुप्त वासुदेवदत्तके साथ जलकेलि कर
रहे थे। श्रीवास पण्डित श्रीगदाधर पण्डितके साथ और
श्रीराघव पण्डित श्रीवक्रेश्वर पण्डितके साथ जलकेलि
करते एक-दूसरेपर जल फेंक रहे थे। श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्य श्रीरामानन्द-रायके साथ जल-क्रीड़ा कर रहे
थे, क्रीड़ा करते हुए उनकी गम्भीरता न जाने कहाँ
लुप्त हो गयी और वे बालकोंकी भाँति हो गये॥78-82॥

अनुभाष्य— 'गुप्त'—मुरारि गुप्त; 'दत्त'—वासुदेव
दत्त ॥ 80 ॥

श्रीगोपीनाथको श्रीसार्वभौम और श्रीरायके चापल्यको त्याग
करवानेकी आज्ञा :-
महाप्रभु ताँ दोंहार चापल्य देखिया।
गोपीनाथाचार्ये किछु कहेन हासिया ॥ 83 ॥

अनुवाद—श्रीगोपीनाथने कहा,—“आपकी कृपा
महासिन्धुकी भाँति है। जब उसकी एक बूँद भी
उछलती है, तो वह सुमेरु-मन्दराचल जैसे बड़े
पर्वतोंको भी वहीं डुबो सकती है। ये दोनों तो छोटीसी
पहाड़ियोंके समान हैं, तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात
है कि ये आपकी कृपाके सागरमें डूब रहे हैं। जिनका
(श्रीसार्वभौमका) समस्त जीवन शुष्कतर्क रूपी खली
खाते हुआ व्यतीत हुआ है, उन्हें आप आज अपनी
लीलामृतका पान करा रहे हैं—आपकी इनपर यह
महान् कृपा है॥85-87॥

अनुभाष्य— 'गण्ड-शैल'—पहाड़ी; यद्यपि 'दुई'—अर्थात्
'दो'—शब्दका उल्लेख है, तथापि विशेष रूपसे श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यको लक्ष्य करके ऐसा कहा गया है। 'खलि'—खली
(बीजसे तेल निकालनेके बाद बची हुई खली);
महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करनेसे पहले निर्विशेष-ब्रह्म-ज्ञानी

538 ।