श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1376, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 14/21-34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भक्तोंके द्वारा राजाके भाग्यकी प्रशंसा :-
प्रतापरुद्रेर भाग्य देखि' भक्तगणे।
राजारे प्रशंसे सबे आनन्दित-मने ॥ 21 ॥
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रके सौभाग्यको देखकर सभी
भक्तको बहुत आनन्द हुआ और वे उनकी प्रशंसा
करने लगे ॥ 21 ॥
महाप्रभु और भक्तोंकी वन्दना करके राजाका प्रस्थान :-
दण्डवत् करि' राजा बाहिरे चलिला।
योड़ हस्त करि' सब भक्तेरे वन्दिला ॥ 22 ॥
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने हाथ जोड़कर सभी
भक्तोंकी वन्दना की और महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम
करके बाहर चले आये ॥ 22 ॥
सभीके मध्याह्न स्नानके बाद श्रीवाणीनाथके
द्वारा प्रचुर प्रसाद लाना :-
मध्याह्न करिला प्रभु लञा भक्तगण।
वाणीनाथ प्रसाद लञा करिल गमन ॥ 23 ॥
सार्वभौम-रामानन्द-वाणीनाथे दिया।
प्रसाद पाठाल राजा बहुत करिया ॥ 24 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने भक्तोंको साथ लेकर मध्याह्न
स्नान किया। उधर श्रीवाणीनाथ सबके लिये प्रसाद लेने
गये। राजा प्रतापरुद्रने श्रीसार्वभौम, श्रीरामानन्द राय और
श्रीवाणीनाथके द्वारा बहुतसा प्रसाद भिजवा दिया ॥ 23-24 ॥
विचित्र प्रसाद :-
'बलगाण्डि भोगे'र प्रसाद-उत्तम अनन्त।
'नि-सकड़ि' प्रसाद आइल, यार नाहि अन्त ॥ 25 ॥
छाना, पाना, पैड़, आम्र, नारिकेल, काँठाल।
नानाविध कदली, आर बीज-ताल ॥ 26 ॥
नारङ्ग, छोलङ्ग, टावा, कमला, बीजपूर।
बादाम, छोहारा, द्राक्षा, पिण्डखर्जूर ॥ 27 ॥
मनोहरा, लाडु आदि शतेक प्रकार।
अमृतगुटिका-आदि, क्षीर्सा अपार ॥ 28 ॥
अमृतमण्डा, सरवती, आर कुम्ड़ा-कुरी।
रसामृत, सरभाजा आर सरपुरी ॥ 29 ॥
हरिवल्लभ, सेंओति, कर्पूर, मालती।
डालि-मरिच-लाडु, नवात, अमृति ॥ 30 ॥
पद्मचिनि, चन्द्रकान्ति, खाजा, खण्डसार।
वियरि, कदमा, तिलाखाजार प्रकार ॥ 31 ॥
नारङ्ग-छोलङ्ग-आम्र-वृक्षेर आकार।
फूल-फल-पत्रयुक्त खण्डेर विकार ॥ 32 ॥
दधि, दुग्ध, ननी, तक्र, रसाला, शिखरिणी।
स-लवण, मुद्गाङ्कुर, आदा खानि खानि ॥ 33 ॥
लेम्बु-कुल आदि नानाप्रकार आचार।
लिखिते ना पारि प्रसाद कतेक प्रकार ॥ 34 ॥
अनुवाद—'बलगाण्डि' पर लगनेवाले भोगका प्रसाद
उत्तम कोटिका और मात्रामें अनन्त होता है। राजाने
'नि-सकड़ि' अर्थात् जो पकाया न गया हो, वह प्रसाद
इतना भेजा जिसका कोई अन्त नहीं था। उस प्रसादमें
दही, फलोंका रस, डाब (पानीवाला नारियल), आम,
सूखा नारियल, कटहल, अनेक प्रकारके केले और
तालके बीज थे। नारङ्गी, मौसमी, गलगल, संतरा, कीनू
आदि अनेक प्रकारके नींबू-जातीय फल थे। बादाम,
छुहारा, किशमिश, खजूर आदि मेवा थे। मनोहर आदि
सैकड़ों प्रकारके लड्डू, अमृत-गुटिका आदि मिठाइयाँ,
अनेक प्रकारकी खीर थी। पपीता, मौसमी, पेठेकी
मिठाई, मलाई लड्डू, मलाईको घीमें भूनकर बनायी
गयी मिठाई और मलाईका मिश्रण देकर बनी एक
प्रकारकी पूरी थी। घीमें बनायी गयी मीठी रोटी, सफेद
गुलाब, कर्पूर और मालतीके फूलोंसे बनी मिठाइयाँ, मूँग
दालके लड्डू, नवात (एक प्रकारकी मिठाई), इमरती,
कमलके पुष्पसे बनायी चीनी, उड़दकी दालसे बनी रोटी
और पूरी, खाजा, गुड़की मिठाई, चावलको भूनकर
गुड़में मिलाकर बनी मिठाई, तिलकी मिठाई, तिलकी
गजक आदि अनेक प्रकारके व्यञ्जन थे। संतरा,
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