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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1352, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1352

[ 13/79-80
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
असुरसमूहको उखाड़ फेंकनेवाले, स्थावर और जङ्गम
जनोंके संसार-दुःखको तथा व्रज और पुरवासी सेवकोंके
वियोग दुःखको नष्ट करनेवाले, व्रज और पुरकी
अनुरागिनी स्त्रियोंके कामदेवको (जो अभिलाषा रूप है
तथा संसारको जीतनेकी इच्छावाला होनेके कारण
देवरूप है अथवा 'देव' जो अप्राकृत तत्त्वस्वरूपभूत
अर्थात् स्वप्रकाश है, उसको) सुस्मितश्रीमुख (जिस
मुखमें शोभन-स्मित तथा उपलक्षणके द्वारा प्रसन्नता
और विलासादि भी विराजमान हैं, ऐसे स्वाभाविक
शोभायुक्त हास्यवाले मुख) के द्वारा वर्धित करनेवाले
श्रीकृष्ण सर्वोत्तम रूपमें जययुक्त अथवा विराजमान
हों॥ 79 ॥
अहं-पदार्थ कहलानेवाले जीवात्माका स्वरूप :-
पद्यावली (74) अङ्कमें उद्धृत श्रीकृष्णचैतन्योक्त श्लोक-
नाहं विप्रो न च नरपतिर्नापि वैश्यो न शूद्रो
नाहं वर्णी न च गृहपतिर्नो वनस्थो यतिर्वा।
किन्तु प्रोद्यन्निखिलपरमानन्दपूर्णामृताब्धे-
र्गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः॥ 80 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 80 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, क्षत्रिय-राजा
नहीं हूँ, वैश्य अथवा शूद्र नहीं हूँ, अथवा ब्रह्मचारी
नहीं हूँ, गृहस्थ नहीं हूँ, वानप्रस्थ नहीं हूँ, संन्यासी भी
नहीं हूँ, किन्तु उन्मीलित (अर्थात् नित्य स्वप्रकाशमान)
निखिल परमानन्दसे पूर्ण अमृतसमुद्ररूप 'श्रीकृष्णके
चरणकमलोंके दासोंका दास' कहकर अपना परिचय
देता हूँ॥ 80 ॥
अनुभाष्य-
अहं (जीवात्मस्वरूपः) विप्रः (प्राकृतबुद्ध्या शौक्र-सावित्र्य-
दैक्ष-त्रिविध-जन्माभिमानी ब्राह्मणः) न (न अस्मि), नरपतिः
(क्षत्रियः) च न, वैश्यः न, शूद्रः च न (नाहं वर्णाभिमानीत्यर्थः);
[पुनः] अहं (जीवः) वर्णी (ब्रह्मचारी) न, गृहपतिः (गृहस्थः)
च न, वनस्थः (वानप्रस्थः) न, यतिः (तुर्याश्रमी संन्यासी वा)
न (नास्मि-नाहं आश्रमाभिमानीत्यर्थः)। किन्तु [कोऽहमिति
चेत्? तत्राह-अहं जीवस्वरूपः] प्रोद्यन्निखिल-परमानन्द-पूर्णामृताब्धेः
(प्रकृष्टरूपेण उद्यन् उदयमाविष्कुर्वन् प्रकाशमान इति यावत्,
यः निखिलः परमानन्दः, तेन एव पूर्णः अमृताब्धिः तस्य)
गोपीभर्तुः (गोपीजनवल्लभस्य तस्यैव स्वयंभगवत्तयाः स्वयंरूपत्वाद्वा)
पदकमलयोः (पादपङ्कजयोः) दासदासानुदासः (वैष्णवदास्यानुदास्ये
संप्रतिष्ठितः त्रिगुणातीतः कृष्णदासः)।
श्लोक-भावानुवाद-मैं (जीवात्मस्वरूप) प्राकृत बुद्धिसे
शौक्र, सावित्र्य और दैक्ष, इन तीन प्रकारके जन्माभिमानी
ब्राह्मण नहीं हूँ, क्षत्रिय नहीं हूँ, वैश्य अथवा शूद्र भी
नहीं हूँ (वर्णाभिमानी नहीं हूँ-यह अर्थ है), अथवा मैं
(जीव) ब्रह्मचारी नहीं हूँ, गृहस्थ नहीं हूँ, वानप्रस्थ नहीं
हूँ, चतुर्थाश्रमी संन्यासी भी नहीं हूँ (आश्रमाभिमानी नहीं
हूँ), किन्तु [मैं कौन हूँ, तभी कहा है-मैं जीवस्वरूप]
प्रकृष्टरूपसे प्रकाशमान निखिल परमानन्दसे पूर्ण
अमृतसमुद्ररूप स्वयंरूप स्वयं-भगवान् गोपीजनवल्लभके
चरणकमलोंके दासोंका दास अर्थात् वैष्णवोंके दासानुदास्यमें
प्रतिष्ठित त्रिगुणातीत कृष्णदास हूँ॥ 80 ॥
अमृतानुकणा-श्रुतियोंमें भूतशुद्धिके लिये जो मन्त्र
कहे गये हैं, उनमेंसे आचार्य श्रीशङ्करके द्वारा प्रवर्तित
मायावाद शास्त्रमें जो एक महावाक्य कहकर निर्धारित
हुआ है, उस "अहं ब्रह्मास्मि” (बृहदारण्यक)-मन्त्रका
विद्वत्-रूढ़िवृत्ति-गत अर्थ भगवान् श्रीगौरसुन्दरने स्वयं
रचित “नाहं विप्रः” श्लोकमें सुन्दर रूपसे स्पष्ट किया
है। अर्चनसे पूर्व जिसमें अर्चाकी अधिष्ठान सेवनोपयोगी
रूपमें परिणत होता है, उसके लिये ही भूतशुद्धिकी
आवश्यकता है। क्योंकि, 'नादेवो देवमर्चयेत्'-अदेव
व्यक्तिका देवता-अर्चनमें अधिकार नहीं है। “देवं भूत्वा
देवं यजेत्"-देवत्व लाभ करके ही देवता यजनकी
विधि है। इसलिये लोकातीत भगवद्-नामवतार या
अर्चारवतारके प्रति अपनी सेवाकी वृत्ति प्रकाश करनेसे
पहले साधक जीवको अपने अलौकिक स्वरूप-सम्बन्धमें
अवस्थित होना होगा, अन्यथा लौकिक धर्म-अर्थ-काम-
मोक्ष-वासनारूप पिशाचीके द्वारा आक्रान्त होकर वे
सेवाधिकारसे च्युत हो जायेंगे-यही भूतशुद्धिका तात्पर्य
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