श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय 12/154-164 ]
श्रीकाशीमिश्र और तुलसी-पड़िछाके द्वारा पाँच सौ लोगोंके लिये पर्याप्त प्रसाद भेजना :-
काशीमिश्र, तुलसी-पड़िछा—दुइजन।
पञ्चशत लोक यत करये भोजन ॥ 154 ॥
तत अन्न-पिठा-पाना, सब पाठाइल।
देखि' महाप्रभुर मने सन्तोष हइल ॥ 155 ॥
अनुवाद—श्रीकाशीमिश्र और तुलसी नामक पड़िछा—इन दोनोंने पाँच सौ भक्त जितना खा सकते हैं, उतना अन्न, पिठा-पाना आदि महाप्रसाद भिजवाया। इसे देखकर महाप्रभु मनमें बहुत सन्तुष्ट हुए॥ 154-155 ॥
निजगण सहित महाप्रभुका प्रसाद-सम्मानार्थ बैठना :-
पुरी-गोसाञि, महाप्रभु, भारती ब्रह्मानन्द।
अद्वैत-आचार्य, आर प्रभु-नित्यानन्द ॥ 156 ॥
आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, श्रीवास, गदाधर।
शङ्कर, नन्दनाचार्य, आर राघव, वक्रेश्वर ॥ 157 ॥
प्रभु-आज्ञा पाञा बैसे आपने सार्वभौम।
पिण्डार उपरे प्रभु बैसे लञा भक्तगण ॥ 158 ॥
तार तले, तार तले करि' अनुक्रम।
उद्यान भरि' बैसे भक्त करिते भोजन ॥ 159 ॥
अनुवाद—श्रीपरमानन्द पुरी, महाप्रभु, श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीआचार्यरत्न (श्रीचन्द्रशेखर), श्रीआचार्यनिधि (श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि), श्रीवास पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीनन्दनाचार्य, श्रीराघव पण्डित, श्रीवक्रेश्वर पण्डित आदि सब प्रसाद पानेके लिये बैठ गये। महाप्रभुकी आज्ञा होनेपर श्रीसार्वभौम भी बैठ गये। महाप्रभु और सब भक्त लकड़ीकी चौकियोंपर क्रमानुसार बैठे और समस्त भक्तोंसे उद्यान भर गया॥ 156-159 ॥
अनुभाष्य—'पिण्डा'—उड़िया भाषामें लकड़ीके आसनको कहते हैं, बङ्गाली भाषामें इसे 'पीड़ि' कहते हैं॥ 158 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदास ठाकुरका आह्वान :-
'हरिदास' बलि' प्रभु डाके घने घन।
दूरे रहि' हरिदास करे निवेदन ॥ 160 ॥
श्रीहरिदासका स्वाभाविक दैन्य और शुद्धभक्तके प्रति मर्यादा-बुद्धि :-
“भक्त-सङ्गे प्रभु करुन प्रसाद अङ्गीकार।
ए-सङ्गे बसिते योग्य नहि मुञि छार ॥ 161 ॥
सबसे अन्तमें प्रसाद ग्रहण करनेकी इच्छा; महाप्रभुके द्वारा सम्मति :-
पाछे मोरे प्रसाद गोविन्द दिबे बहिद्वारे।”
मन जानि' प्रभु पुनः ना बलिल ताँरे ॥ 162 ॥
अनुवाद—महाप्रभु बार-बार 'हरिदास' 'हरिदास' नाम लेकर उन्हें पुकारने लगे, परन्तु श्रीहरिदास ठाकुरने दूरसे ही निवेदन किया,—“आप अपने भक्तोंके साथ प्रसाद ग्रहण कीजिये। मैं अधम आप सबके साथ बैठनेके योग्य नहीं हूँ। बादमें श्रीगोविन्द उद्यानके द्वारके बाहर आकर मुझे महाप्रसाद दे देंगे।” उनके मनकी भावनाको समझकर महाप्रभुने उन्हें फिर नहीं पुकारा ॥ 160-162 ॥
श्रीस्वरूपादि सात भक्तोंके द्वारा परिवेशन :-
स्वरूप-गोसाञि, जगदानन्द, दामोदर।
काशीश्वर, गोपीनाथ, वाणीनाथ, शङ्कर ॥ 163 ॥
प्रसाद-सेवनके समय हरिध्वनि :-
परिवेशन करे ताँहा एइ सातजन।
मध्ये मध्ये हरिध्वनि करे भक्तगण ॥ 164 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीकाशीश्वर, श्रीगोपीनाथ, श्रीवाणीनाथ और श्रीशङ्कर—इन सात भक्तोंने वहाँ प्रसादका परिवेशन किया। प्रसाद पाते हुए बीच-बीचमें भक्तलोग हरिध्वनि करने लगे ॥ 163-164 ॥
अनुभाष्य—'हरिध्वनि'—मध्यलीला 11/209 संख्या देखें ॥ 164 ॥
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