श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1307, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय 11/221-233 ]
'बेड़ानृत्य' महाप्रभु करि' कतक्षण।
मन्दिरेर पाछे रहि' करये कीर्त्तन ॥ 224 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके आगे-पीछे चार मण्डलियाँ
गान कर रही थी। महाप्रभु जब पछाड़ खाकर गिरने
लगते, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु उन्हें सम्भाल लेते।
महाप्रभुमें अश्रु, पुलक, कम्प, स्वेद, गम्भीर हुँकार आदि
प्रेमके अष्ट-सात्त्विक विकारोंको देखकर लोग
आश्चर्यचकित हो रहे थे। महाप्रभुके नेत्रोंसे पिचकारीकी
भाँति अश्रुधारा निकल रही थी, जो चारों ओर खड़े
लोगोंको भिगो रही थी। महाप्रभु श्रीजगन्नाथ मन्दिरकी
परिक्रमा करके कुछ समयके लिये मन्दिरके पीछे खड़े
होकर कीर्त्तन करते रहे ॥ 221-224 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'लोक सब करये सिनाने'—चारों
ओर सब लोगोंने अश्रुजलसे स्नान किया ॥ 222 ॥
चारों सम्प्रदायके बीचमें महाप्रभुका नृत्य :-
चारिदिके नाचे, सम्प्रदाय उच्चैःस्वरे गाय।
मध्ये ताण्डव-नृत्य करे गौरराय ॥ 225 ॥
बहुक्षण नृत्य करि' प्रभु स्थिर हैला।
चारि महान्तेरे तबे नाचिते आज्ञा दिला ॥ 226 ॥
अनुवाद—चारों ओर चार मण्डलियोंमें भक्त उच्च
स्वरसे गा रहे थे तथा उनके बीचमें श्रीगौरराय ताण्डव
नृत्य कर रहे थे। बहुत समय तक नृत्य करनेके बाद
जब महाप्रभु कुछ स्थिर हुए, तो उन्होंने चार महान्तोंको
नृत्य करनेका आदेश दिया ॥ 225-226 ॥
अकेले पुरुषके नृत्यको ताण्डव नृत्य कहते हैं।
चार महान्त-(1) श्रीनित्यानन्द, (2) श्रीअद्वैत :-
एक सम्प्रदाये नाचे नित्यानन्द-राये।
अद्वैत-आचार्य नाचे आर सम्प्रदाये ॥ 227 ॥
अनुवाद—एक मण्डलीमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने नृत्य
आरम्भ किया और दूसरी मण्डलीमें श्रीअद्वैताचार्य प्रभु
नृत्य करने लगे ॥ 227 ॥
(3) श्रीवक्रेश्वर, (4) श्रीवास :-
आर सम्प्रदाये नाचे पण्डित-वक्रेश्वर।
श्रीवास नाचे आर सम्प्रदाय-भितर ॥ 228 ॥
अनुवाद—तीसरी मण्डलीमें श्रीवक्रेश्वर पण्डित नृत्य
करने लगे और चौथी मण्डलीमें श्रीवास पण्डित नृत्य
कर रहे थे ॥ 228 ॥
कीर्त्तनके बीचमें महाप्रभुका अवस्थान और चारों जनोंके
नृत्य-दर्शनके लिये ऐश्वर्यका प्रकाश :-
मध्ये रहि' महाप्रभु करेन दरशन।
ताँहा एक ऐश्वर्य हइल प्रकटन ॥ 229 ॥
चारिदिके नृत्यगीत करे यत जन।
सबे कहे,―प्रभु करे आमारे दरशन ॥ 230 ॥
चारिजनेर नृत्य देखिते प्रभुर अभिलाष।
सेइ अभिलाषे करे ऐश्वर्य प्रकाश ॥ 231 ॥
दर्शने आवेश ताँर देखि' मात्र जाने।
केमने चौदिके देखे,—इहा नाहि जाने ॥ 232 ॥
अनुवाद—महाप्रभु बीचमें रहकर इन सबको नृत्य
करते देख रहे थे और वहाँ महाप्रभुका एक ऐश्वर्य
प्रकट हो गया। चारों ओर जितने भक्त नृत्य-गीत कर
रहे थे, वे सभी कह रहे थे,―महाप्रभु मेरी ओर ही
देख रहे हैं। महाप्रभुकी इच्छा चारों महान्तोंके नृत्यका
दर्शन करनेकी थी, इसी अभिलाषाके कारण उन्होंने
अपना ऐश्वर्य प्रकाशित किया। दर्शनके आवेशमें चारों
ओर भक्त महाप्रभुको अपने सामने देख रहे थे, किन्तु
महाप्रभु कैसे एक साथ चारों ओर देख रहे हैं―इसे
वे नहीं जानते थे ॥ 229-232 ॥
ब्रजलीलामें सखाओंके मध्यमें बैठे श्रीकृष्णके
पुलिन भोजनके साथ उपमा :-
पुलिन-भोजने येन कृष्ण मध्य-स्थाने।
चौदिकेर सखा कहे,―आमारे नेहाने ॥ 233 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण यमुनाके तटपर भोजन करते
। 461