श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1298, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/149-158 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीशिवानन्दसेनसे कहा, – “यह
तो मैं पहलेसे ही जानता हूँ कि आपका मेरे प्रति गाढ़
अनुराग है।” महाप्रभुके वचन सुनकर श्रीशिवानन्द-सेन
प्रेममें आविष्ट हो गये और महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम
करके उन्होंने एक श्लोक पढ़ा ॥ 149-150॥
भगवान्की दयाकी प्रार्थना :-
यमुनाचार्य-कृत स्तोत्ररत्न (26) –
निमज्जतोऽनन्त भवार्णवान्तश्चिराय
मे कूलमिवासि लब्धः।
त्वयापि लब्धं भगवन्निदानीम्
अनुत्तमं पात्रमिदं दयायाः ॥ 151 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 151 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-“हे अनन्त, भवसागरमें निमग्न
रहकर बहुत दिनोंके बाद आपको तटके रूपमें प्राप्त
किया है। हे भगवन्, आपने भी मुझे प्राप्त करके
अपनी दयाके अति उत्तम पात्रको प्राप्त किया है।”
यह श्लोक आलवन्दारु-यमुनाचार्य-कृत स्तोत्रके
अन्तर्गत है ॥ 151॥
अनुभाष्य-
हे अनन्त, चिराय भवार्णवान्तः (संसार-दुःख-जलधि-मध्ये)
निमज्जतः (उत्थानशक्तिरहितस्य मग्नस्य) मे (मम) कूलं
(तटम्) इव [त्वं भगवान् मया] लब्धः असि; हे भगवन्,
इदानीं (सम्प्रति) त्वया अपि दयायाः इदम् अनुत्तमं (नास्ति
उत्तमं परतमं श्रेष्ठं यस्मात् तत् सर्वश्रेष्ठं) पात्रं लब्धं (प्राप्तम्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 151 ॥
श्रीमुरारिगुप्तका दैन्यवशतः आत्मगोपन :-
प्रथमे मुरारि-गुप्त प्रभुरे ना देखिया।
बाहिरेते पड़ि' आछे दण्डवत् हञा ॥ 152 ॥
अनुवाद-श्रीमुरारि-गुप्तने पहले महाप्रभुके दर्शन
नहीं किये, वे बाहर ही दण्डवत् प्रणाम करके भूमिपर
पड़े हुए थे॥ 152 ॥
भगवान्के द्वारा भक्तको ढूँढ़ना :-
मुरारि ना देखिया प्रभु करे अन्वेषण।
मुरारि लइते धाञा आइला बहुजन ॥ 153॥
अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्तको न देखकर महाप्रभुने
उनके बारेमें पूछा। तब बहुतसे वैष्णव श्रीमुरारि गुप्तको
लानेके लिये दौड़ पड़े ॥ 153 ॥
श्रीमुरारिके द्वारा दीनतापूर्वक महाप्रभुका दर्शन :-
तृण दुइगुच्छ मुरारि दशने धरिया।
महाप्रभुर आगे गेला दैन्याधीन हञा ॥ 154 ॥
अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्त तिनकोंके दो गुच्छोंको
अपने दाँतोंमे दबाकर अत्यन्त दीन होकर महाप्रभुके
सामने गये ॥ 154 ॥
स्वयंको अस्पृश्य मानते हुए मुरारिको
महाप्रभुके स्पर्शमें सङ्कोच :-
मुरारि देखिया प्रभु आइला मिलिते।
पाछे भागे मुरारि, लागिला कहिते ॥ 155॥
“मोरे ना धुँइह प्रभु, मुञि त' पामर।
तोमार स्पर्शयोग नहे एइ कलेवर ॥” 156॥
अनुवाद-श्रीमुरारि गुप्तको आते देखकर महाप्रभु
उठकर जब उनसे मिलनेके लिये आये, तब श्रीमुरारि
गुप्त पीछेकी ओर भागते हुए कहने लगे, – “हे प्रभो !
आप मुझे स्पर्श न करें, मैं तो अत्यन्त पतित हूँ। मेरा
यह शरीर आपके स्पर्श करने योग्य नहीं है ॥” 155-156 ॥
भक्तकी दीनताको देखकर भगवान्का आर्द्रभाव :-
प्रभु कहे, – “मुरारि, कर दैन्य सम्वरण।
तोमार दैन्य देखि' मोर विदीर्ण हय मन ॥” 157॥
भक्तोंकी सेवामें रत भगवान् :-
एत बलि' प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन।
निकटे बसाञा करे अङ्ग सम्मार्जन ॥ 158 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, – “हे मुरारि ! तुम इतनी
452 ।