श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय 11/119-130 ]
अमृतप्रवाह भाष्य—'पड़िछा'-'परीक्षा' शब्दसे 'पड़िछा'
शब्द बना है; इसलिये तत्त्वकी आलोचना करना ही
पड़िछाका कार्य है॥ 119 ॥
सेव्यके इङ्गितमात्रसे ही सेवा करना उत्तम :-
प्रभुर आज्ञा पालिह दुँहे सावधान हञा।
आज्ञा नहे, तबु करिह, इङ्गित जानिया ॥ 122 ॥
अनुवाद-आप दोनों महाप्रभुकी आज्ञाका
सावधानीपूर्वक पालन करना। यदि वे स्पष्टरूपसे आज्ञा
न भी दें, तो भी उनका सङ्केत समझकर ही सब
सेवाओंको करना ॥ 122 ॥
अनुभाष्य-महाप्रभुके पास जो सब भक्त गौड़ादि
देशोंसे आये हैं, उनके लिये रहनेके लिये अच्छे स्थान,
अच्छे प्रसादकी व्यवस्था एवं उत्तमरूपसे श्रीजगन्नाथ-दर्शन
आदिमें किसी प्रकारकी असुविधा न हो, इन सबका
ध्यान रखनेके लिये प्रतापरुद्र राजाने पड़िछा-पात्रको
बोल दिया। और भक्तोंकी सुविधा आदिके उद्देश्यसे
महाप्रभुका स्पष्ट आदेश प्राप्त न करनेपर भी, उनका
सङ्केत समझकर, जब जो-जो कर्त्तव्य है, तत्क्षणात्
उसका भी पालन करे, यह बतला दिया ॥ 121-122 ॥
श्रीसार्वभौम और श्रीगोपीनाथका थोड़ी दूर खड़े होकर
भक्त और भगवान्के मिलनका दर्शन :-
एत बलि' विदाय दिल सेइ दुइ-जने।
सार्वभौम देखिते आइल वैष्णव-मिलने ॥ 123 ॥
गोपीनाथाचार्य, भट्टाचार्य सार्वभौम।
दुँहे देखे दूरे प्रभु-वैष्णव-मिलन ॥ 124 ॥
सिंहद्वार दाहिने छाड़ि' सब वैष्णवगण।
काशीमिश्र-गृह-पथे करिला गमन ॥ 125 ॥
भक्तोंसे मिलनेके लिये महाप्रभुका स्वयं आना :-
हेनकाले महाप्रभु निजगण-सङ्गे।
वैष्णवे मिलिला आसि' पथे बहुरङ्गे ॥ 126 ॥
अनुवाद-इतना कहकर राजा प्रतापरुद्रने उन
दोनोंको विदा किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य आये हुए
वैष्णवोंका महाप्रभुके साथ मिलन देखनेके लिये गये।
श्रीगोपीनाथाचार्य और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य-दोनों दूरसे
महाप्रभु और वैष्णवोंका मिलन देखने लगे। इधर
श्रीजगन्नाथ मन्दिरके सिंहद्वारको अपनी दाहिनी ओर
छोड़ करके सभी वैष्णव काशीमिश्रके घरकी ओर
जानेवाले मार्गकी ओर चले। और उधर महाप्रभु अपने
परिकरोंके साथ मार्गमें ही सभी वैष्णवोंको बड़े
आनन्दपूर्वक आकर मिले ॥ 123-126 ॥
श्रीअद्वैतके द्वारा प्रणाम, महाप्रभुका आलिङ्गन :-
अद्वैत करिल प्रभुर चरण वन्दन।
आचार्ये कैल प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥ 127 ॥
दोनोंका प्रेमावेश, बादमें धैर्य :-
प्रेमानन्दे हैला दुँहे परम अस्थिर।
समय देखिया प्रभु हैला किछु धीर ॥ 128 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना
की और महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यका प्रेमपूर्वक आलिङ्गन
किया। दोनों ही प्रेमानन्दमें परम अधीर हो गये, किन्तु
समय और परिस्थिति देखकर महाप्रभु कुछ धीर हो
गये ॥ 127-128 ॥
श्रीवासादिका महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुका आलिङ्गन :-
श्रीवासादि करिल प्रभुर चरण वन्दन।
प्रत्येके करिल प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥ 129 ॥
सभी भक्तोंके साथ यथायोग्य वार्त्तालाप :-
एके एके सर्वभक्तेरे कैल सम्भाषण।
सबा लञा अभ्यन्तरे करिला गमन ॥ 130 ॥
अनुवाद-इसके बाद श्रीवासादि भक्तोंने महाप्रभुके
चरणोंकी वन्दना की। महाप्रभुने भी प्रत्येक भक्तका
प्रीतिपूर्वक आलिङ्गन किया और एक-एक करके सभी
भक्तोंके साथ वार्त्तालाप किया। तब उन सबको अपने
साथ लेकर वे घरके अन्दर चले गये ॥ 129-130 ॥
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