श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1232, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 9/263-268 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कारण है। जीवोंके सुख अथवा दुःखकी प्राप्तिके फलसे
भक्तिके उदित होनेकी सम्भावना नहीं है। श्रीकृष्णकी
सुख प्राप्तिके लिये सेवा ही—भक्ति है। अपने भोगके
लिये किये गये कर्मोंकी निन्दा एवं उनको त्याग
करनेका विधान सभी शास्त्रोंमें, यहाँ तक कि, ज्ञानशास्त्रोंमें
भी कहा गया है। अमल-प्रमाण-शिरोमणि श्रीमद्भागवतमें
शुद्धज्ञानविरागभक्ति-सहित नैष्कर्म्यकी बातका ही विचार
हुआ है और इसीकी ही संस्थापना हुई है। इसलिये
सभी शास्त्रोंमें श्रेष्ठ इस पुराणके आदि, मध्य और
अन्तमें, सर्वत्र ही अत्यन्त तुच्छ फलभोगमें बाँधनेवाले
कर्म और ज्ञानकी निन्दा की गयी है। ग्रन्थके
आकारकी वृद्धिके भयसे इस स्थानपर कोई श्लोक-प्रमाण
उद्धृत नहीं किया है॥ 263 ॥
स्वधर्म-त्यागपूर्वक हरिभजन :-
श्रीमद्भागवत (11/11/32)-
आज्ञायैवं गुणान् दोषान्मयादिष्टानपि स्वकान्।
धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान्मां भजेत् स सत्तम् ॥ 264 ॥
अनुवाद-धर्मशास्त्रोंमें मुझ भगवान्ने जिनको 'धर्म'
कहकर आदेश किया है, उनके गुण-दोषका विचार
करके, उन सभी प्रकारके धर्मोंकी प्रवृत्तिको छोड़कर
जो मेरा भजन करते हैं, वे ही सबसे श्रेष्ठ (साधु)
हैं॥ 264 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/62 संख्या देखें॥ 264 ॥
श्रीमद्भगवद्गीता (18/66) :-
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ 265 ॥
अनुवाद-समस्त धर्मोंका परित्याग करके एकमात्र,
मैं जो भगवान् हूँ, मेरे शरणागत होओ। ऐसा करनेपर
मैं तुम्हें समस्त पापोंसे मुक्त करूँगा। तुम शोक मत
करो॥ 265 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/63 संख्या देखें ॥ 265 ॥
हरिकथामें श्रद्धावान् लोगोंका कर्ममें अधिकार नहीं :-
श्रीमद्भागवत (11/20/9)-
तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।
मत्कथा श्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥ 266 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 266 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जब तक कर्ममार्गमें निर्वेद
(वैराग्य) उदित न हो, अथवा मेरी कथा-श्रवणादिमें
श्रद्धा उत्पन्न न हो, तब तक नित्य-नैमित्तिकादि कर्म
करने चाहिये ॥ 266 ॥
अनुभाष्य-कर्मानुष्ठान और कर्मत्यागके अधिकारके
सम्बन्धमें संशय होनेपर उद्धवजीके प्रश्नके उत्तरमें
श्रीभगवान्ने कहा-
यावता पुमान् न निर्विद्येत (यावन्निर्वेदः कृष्णेतर-कथासु
वैराग्यो न जायते), यावत् मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा न
जायते, तावत् कर्माणि (नित्यनैमित्तिकानि पुण्यकर्माणि) कुर्वीत।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 266 ॥
पञ्चविध मुक्ति त्याग करे भक्तगण।
फल्गु करि' 'मुक्ति' देखे नरकेर सम ॥ 267 ॥
अनुवाद-भक्त लोग 'मुक्ति'को तुच्छ मानकर उसे
नरकके समान देखते हैं, इसलिये वे पाँच प्रकारकी
मुक्तियोंका त्याग करते हैं॥ 267 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-भक्तिमें बाधक-कर्मके सम्बन्धमें
(आपने) शास्त्रके सिद्धान्त सुने। अब देखिये, भक्त
लोग पाँच प्रकारकी मुक्तिकी पिपासाका अवश्य त्याग
करेंगे, क्योंकि वे मुक्तिको नरकके समान तुच्छ मानते
हैं॥ 267 ॥
शुद्धसेवक श्रीकृष्णकी शुद्धसेवा चाहता है, मुक्ति नहीं :-
श्रीमद्भागवत (3/29/13)-
सालोक्य-सार्ष्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमप्युत।
दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ 268 ॥
अनुवाद-(मेरे द्वारा) सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्ष्टि
384 ।