श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1229, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय 9/245–258 ]
'उडुपी'—दक्षिण कानाड़ा जिलेमें, म्याङ्गलोरसे छत्तीस
मील उत्तरकी ओर समुद्रके तटपर अवस्थित है (दक्षिण
कानाड़ा-म्यानुयेल एवं बोम्बाई गेजेटियार) ॥ 245 ॥
श्रीमध्वको गोपाल-प्राप्ति और
तबसे शिष्य-परम्परामें सेवा :—
'नर्त्तक गोपाल देखे परम-मोहने।
मध्वाचार्ये स्वप्न दिया आइला ताँर स्थाने॥ 246 ॥
गोपीचन्दन-तले आछिल डिङ्गाते।
मध्वाचार्य-ठाञि कृष्ण आइला कोनमते॥ 247 ॥
मध्वाचार्य आनि' ताँरे करिला स्थापन।
अद्यावधि सेवा करे तत्त्ववादिगण॥ 248 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने 'नर्तक गोपाल'के परम मनोहर
रूपके दर्शन किये। ये विग्रह श्रीमध्वाचार्यके स्वप्नमें
आये थे। जब ये नर्तक गोपाल गोपीचन्दनमें ढके हुए
एक नौकामें आये थे, तब श्रीमध्वाचार्यने उन्हें किसी
प्रकारसे प्राप्त किया था। श्रीमध्वाचार्यने उन्हें लाकर
उडुपीमें स्थापित किया था। आज तक श्रीमध्वाचार्यकी
शिष्य-परम्परामें तत्त्ववादिगण उन श्रीविग्रहकी सेवा
करते आ रहे हैं॥ 246-248 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—दक्षिण भारतके एक प्रदेशमें
उडुपी गाँवमें श्रीमध्वाचार्यकी गद्दी है, उस सम्प्रदायके
आचार्योंको 'तत्त्ववादी' कहते हैं। वहाँपर नर्तक गोपालकी
श्रीमूर्त्ति है। श्रीमध्वाचार्यने जलमग्न एक बड़ी नौकामें
गोपीचन्दनके एक बड़े टुकड़ेके अन्दरसे श्रीगोपालको
प्राप्त किया था॥ 245-247 ॥
श्रीमध्व-स्थापित श्रीकृष्ण-दर्शनसे महाप्रभुका नृत्य-गीत :—
कृष्णमूर्त्ति देखि' प्रभु महासुख पाइल।
प्रेमावेशे बहुत नृत्य-गीत कैल॥ 249 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण-विग्रहके दर्शन करके महाप्रभुको
बहुत आनन्द हुआ और प्रेमावेशमें उन्होंने बहुत समय
तक नृत्य-गान किया॥ 249 ॥
प्रथम दर्शनमें भ्रमवशतः तत्त्ववादियोंका
महाप्रभुको 'मायावादी' समझना :—
तत्त्ववादिगण प्रभुके 'मायावादी'-ज्ञाने।
प्रथम दर्शने प्रभुके ना कैल सम्भाषणे॥ 250 ॥
बादमें महाप्रभुके सात्त्विक विकारोंका
दर्शनकर उनको वैष्णव समझना :—
पाछे प्रेमावेश देखि' हैल चमत्कार।
वैष्णव-ज्ञाने बहुत करिल सत्कार॥ 251 ॥
तत्त्ववादियोंका स्वयंको वैष्णव' माननेका जड़ाभिमान :—
'वैष्णवता' सबार अन्तरे गर्व जानि'।
ईषत् हासिया किछु कहे गौरमणि॥ 252 ॥
महाप्रभुका उनके गर्व-खण्डनरूपी कृपाका सङ्कल्प :—
ताँ-सबार अन्तरे गर्व जानि' गौरचन्द्र।
ताँ-सबा-सङ्गे गोष्ठी करिला आरम्भ॥ 253 ॥
महापण्डित रघुवर्यतीर्थसे महाप्रभुका दीनतापूर्वक प्रश्न :—
तत्त्ववादी-आचार्य-सब शास्त्रेते प्रवीण।
ताँरे प्रश्न कैल प्रभु हञा येन दीन॥ 254 ॥
साध्य-साधनकी जिज्ञासा :—
“साध्य-साधन आमि ना जानि भालमते।
साध्य-साधन-श्रेष्ठ जानाह आमाते॥” 255 ॥
तत्त्वाचार्यका उत्तर—(1) वर्णाश्रम धर्म और श्रीकृष्णके
प्रति समर्पणरूपी कर्ममिश्रा भक्ति ही 'साधन' :—
आचार्य कहे,—“वर्णाश्रम-धर्म कृष्णे-समर्पण।
एइ हय कृष्णभक्तेर श्रेष्ठ साधन॥ 256 ॥
(2) पाँच प्रकारकी मुक्ति ही 'साध्य' :—
'पञ्चविध मुक्ति' पाञा वैकुण्ठे गमन।
'साध्य-श्रेष्ठ' हय,—एइ शास्त्र-निरूपण॥” 257 ॥
महाप्रभुका उत्तर—(1) शरणागत भक्तोंके
लिये नवधा भक्ति ही साधन :—
प्रभु कहे,—“शास्त्रे कहे श्रवण-कीर्त्तन।
कृष्णप्रेमसेवा-फलेर 'परम-साधन'॥ 258 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 250–258 ॥
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