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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1222, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1222

[ 9/226-236 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भट्टथारिके चङ्गुलमें महाप्रभुके सङ्गी कृष्णदास ब्राह्मण :-
गोसाञिर सङ्गे रहे कृष्णदास ब्राह्मण।
भट्टथारि-सह ताँहा हैल दरशन ॥ 226 ॥
स्त्रीधन देखाञा तारे लोभ जन्माइल।
आर्य सरल विप्रेर बुद्धिनाश कैल ॥ 227 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके साथ उनका सेवक कृष्णदास आया था। वह ब्राह्मण था, परन्तु भट्टथारियोंके साथ उसकी भेंट हो गयी। भट्टथारियोंने उसे स्त्रियाँ दिखलाकर उसमें लोभ उत्पन्न कर दिया, जिसने उस सरल पवित्र ब्राह्मणकी बुद्धि नष्ट कर दी ॥ 226-227 ॥
अनुभाष्य- 'भट्टथारि'-मध्यलीला 1/112 संख्या देखें ॥ 226 ॥
कृष्णदासको ढूँढ़ते हुए भट्टथारिके
शिविरमें महाप्रभुका आगमन :-
प्राते उठि' आइला विप्र भट्टथारि-घरे।
ताहार उद्देशे प्रभु आइला सत्वरे ॥ 228 ॥
अनुवाद-प्रातःकालमें उठते ही कृष्णदास ब्राह्मण स्त्री लोभसे महाप्रभुको छोड़कर भट्टथारियोंके शिविरमें आ गया। और महाप्रभु उसे ढूँढ़ते हुए शीघ्रतासे वहाँ आ पहुँचे ॥ 228 ॥
भट्टथारियोंसे महाप्रभुके द्वारा कृष्णदासकी याचना :-
आसिया कहेन सब भट्टथारिगणे।
“आमार ब्राह्मण तुमि राख कि कारणे ॥ 229 ॥
आमिह संन्यासी देख, तुमिह संन्यासी।
मोरे दुःख देह, -तोमार 'न्याय' नाहि वासि ॥" 230 ॥
अनुवाद-आकर महाप्रभुने भट्टथारियोंसे कहा,-"मेरे साथी ब्राह्मणको तुमने अपने पास किसलिये रख लिया है? मैं संन्यासी हूँ और आप भी संन्यासी हो, परन्तु आप मुझे जानबूझकर दुःख दे रहे हो, इसका कोई न्यायसङ्गत कारण मुझे दिखलायी नहीं देता ॥ " 229-230 ॥
भट्टथारियोंके द्वारा महाप्रभुपर आक्रमण, किन्तु महाप्रभुके अचिन्त्य-शक्तिबलसे वे ही आक्रान्त हुए :-
शुनि' सब भट्टथारि उठे अस्त्र लञा।
मारिबारे आइल सबे चारिदिके धाञा ॥ 231 ॥
तार अस्त्र तार अङ्गे पड़े हात हैते।
खण्ड खण्ड हैल भट्टथारि पलाय चारिभिते ॥ 232 ॥
महाप्रभुके द्वारा कृष्णदास ब्राह्मणका उद्धार :-
भट्टथारि-घरे ताँहा उठिल क्रन्दन।
केशे धरि' विप्रे लञा करिल गमन ॥ 233 ॥
अनुवाद-यह सुनकर सभी भट्टथारि अपने अस्त्र लेकर उठ खड़े हुए और महाप्रभुको मारनेके लिये सब चारों ओरसे दौड़कर आये। परन्तु उनके अस्त्र उनके हाथोंसे छूटकर उनके ही अङ्गोंपर आघात करने लगे। जब कुछ भट्टथारियोंके शरीर खण्ड-खण्ड हो गये, तब बचे हुए भट्टथारि चारों दिशाओंमें भागने लगे। भट्टथारियोंके शिविरमें उनके सम्बन्धी जोर-जोरसे रोने लगे और महाप्रभु कृष्णदास ब्राह्मणको केशोंसे पकड़कर वहाँसे लेकर चल दिये ॥ 231-233 ॥
आदिकेशव-मन्दिरमें विष्णु-दर्शनसे महाप्रभुका नृत्य-गीत और उनके दर्शनसे सभीका आश्चर्यचकित होना :-
सेइ दिन चलि' आइला पयस्विनी-तीरे।
स्नान करि' गेला आदिकेशव-मन्दिरे ॥ 234 ॥
केशव देखिया प्रेमे आविष्ट हैला।
नति, स्तुति, नृत्य, गीत, बहुत करिला ॥ 235 ॥
प्रेम देखि' लोके हैल महा-चमत्कार।
सर्वलोक कैल प्रभुर परम सत्कार ॥ 236 ॥
अनुवाद-उस दिन चलकर महाप्रभु पयस्विनी नदीके तटपर पहुँचे। वहाँ स्नान करके वे आदिकेशवके मन्दिरमें गये। आदिकेशवके दर्शन करके महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये और उनको प्रणाम करके उनकी
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