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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1218, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1218

[ 9/200–211 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अग्निष्टोमादि यज्ञोंकी अपेक्षा अधिक फल प्राप्त होता
है। पम्बम्-द्वीपमें स्थित सेतुबन्धमें रामेश्वर-शिवमूर्ति
अर्थात् 'राम ही जिनके ईश्वर हैं',-ऐसे भक्तावतार
शिवकी मूर्ति है॥ 200 ॥
ब्राह्मणोंकी सभामें कूर्मपुराणके पाठका श्रवण :-
विप्र-सभाय सुने ताँहा कूर्म-पुराण।
तार मध्ये आइला पतिव्रता-उपाख्यान॥ 201 ॥
पतिव्रता-शिरोमणि जनक-नन्दिनी।
जगतेर माता सीता-रामेर गृहिणी॥ 202 ॥
अनुवाद—रामेश्वरमें ब्राह्मण-सभामें महाप्रभुने
कूर्म-पुराणकी कथाको सुना। कथामें पतिव्रताका प्रसङ्ग
आया कि जनकनन्दिनी सीताजी पतिव्रता-शिरोमणि हैं,
वे श्रीरामचन्द्रकी पत्नी और जगत्-माता हैं॥ 201-202 ॥
अनुभाष्य—'कूर्मपुराण'—वर्तमान समयके कूर्म-पुराणमें
केवलमात्र पूर्व और उत्तर—दो खण्ड ही प्राप्त होते हैं।
वास्तविक कूर्मपुराण छह हजार श्लोकवाला नहीं; इसमें
सत्तरह हजार श्लोक थे। भागवतके मतानुसार—“तत्
सप्त-दशसाहस्रं सूचतुःसंहितं शुभम्। सप्तदश-सहस्राणि
लक्ष्मीकल्पानुषङ्गिकम्॥”—यह अठारह महापुराणोंमें पन्द्रहवाँ
पुराण है॥ 201 ॥
रावणका छाया-सीताके अपहरणके वृत्तान्तका श्रवण :-
रावण देखिया सीता लैल अग्निर शरण।
रावण हैते अग्नि कैल सीताके आवरण॥ 203 ॥
'मायासीता' रावण निल, शुनिला आख्याने।
शुनि' महाप्रभु हैल आनन्दित मने॥ 204 ॥
सीता लञा राखिलेन पार्वतीर स्थाने।
'मायासीता' दिया अग्नि वञ्चिला रावणे॥ 205 ॥
रघुनाथ आसि' यबे रावणे मारिल।
अग्नि-परीक्षा दिते यबे सीतारे आनिल॥ 206 ॥
तबे मायासीता अग्न्ये कैल अन्तर्धान।
सत्य-सीता आनि' दिल राम-विद्यमान॥ 207 ॥
अनुवाद—रावणको देखकर सीताजीने अग्निदेवकी
शरण ली और अग्निदेवने सीताजीको रावणसे छिपा
लिया। रावणने तो 'मायासीता'का हरण किया था, यह
सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए। अग्निदेवने असली
सीताजीको पार्वतीजीके पास पहुँचा दिया और मायासीता
देकर रावणके साथ छल किया। श्रीरघुनाथने जब
रावणका वध किया और सीताजीकी अग्नि-परीक्षाके
लिये जब उन्हें लाया गया, तब अग्निदेवने मायासीताको
अन्तर्धान करके असली सीताजीको लाकर श्रीरामचन्द्रको
सौंप दिया॥ 203-207 ॥
सत्-सिद्धान्त सुननेसे महाप्रभुको आनन्द
और पुराणके ग्रन्थके पन्नोंको लेना :-
ए-सब सिद्धान्त शुनि' प्रभुर आनन्द हैल।
ब्राह्मणेर स्थाने मागि' सेइ पत्र निल॥ 208 ॥
नूतन पत्र लेखाञा पुस्तके देओयाइल।
प्रतीति लागि' पुरातन पत्र मागि' निल॥ 209 ॥
अनुवाद—ये सब सिद्धान्त सुनकर महाप्रभुको
बहुत आनन्द हुआ और उन्होंने उन ब्राह्मणोंसे
कूर्मपुराणके उन पन्नोंको माँगकर ले लिया। महाप्रभुने
उन पुराने पन्नोंकी नकल करवाकर नये पन्नोंको पुरानी
पुस्तकमें जोड़ दिया और प्रमाणके रूपमें उन्होंने
ब्राह्मणोंसे पुराने पन्नोंको अपने पास रखनेकी अनुमति
ले ली॥ 208-209 ॥
दक्षिण-मथुरामें आकर सीताभक्त ब्राह्मणको पत्रार्पण :-
पत्र लञा पुनः दक्षिण-मथुरा आइला।
रामदास-विप्रे सेइ पत्र आनि' दिला॥ 210 ॥
अनुवाद—उन पन्नोंको लेकर महाप्रभु पुनः दक्षिण
मथुरा (मदुरा)में आये और उन्होंने रामदास ब्राह्मणको
वे मूल-पत्रे दिये॥ 210 ॥
रावणके द्वारा मायासीता-अपहरणसूचक श्लोक :-
कूर्मपुराण और बृहद्वह्निपुराण—
सीताराधितो वह्निश्च्छाया-सीतामजीजनत्।
तां जहार दशग्रीवः सीता वह्निपुरं गता॥ 211 ॥
370 ।