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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1170, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1170

[ 8/246-250 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "सम्पत्तियोंमें जीवकी सबसे
बड़ी सम्पत्ति क्या है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर
दिया, — "जिनके पास श्रीराधाकृष्णप्रेम रूप सम्पत्ति है,
वही सबसे बड़ा धनी है॥"246॥
अनुभाष्य-जड़ीय भोगोंमें लिप्त होकर जीव अधिक
भोगवासनाओंकी पूर्ति करनेवाले धनको ही प्राप्य
वस्तुओंमें सबसे श्रेष्ठ समझते हैं। किन्तु सम्पत्तिके
तारतम्यके विचारमें सूक्ष्म अप्राकृत-बुद्धिके अनुसार
श्रीराधाकृष्णप्रेमके समान सम्पत्ति और कुछ भी नहीं है।
(भाः 10/39/2)—
"किमलभ्यं भगवति प्रसन्ने श्रीनिकेतने।
तथापि तत्परा राजन्न हि वाञ्छन्ति किञ्चन॥"
"समस्त सम्पत्तिके मूलस्वरूप भगवान्‌के प्रसन्न
होनेपर और क्या प्राप्त करना बाकी रह जाता है?
तथापि हे राजन्! भक्त लोग श्रीकृष्णप्रेम-धनके अतिरिक्त
उनसे और कुछ भी नहीं चाहते॥"246॥
(4) कृष्णभक्तका विरह ही तीव्रतम दुःख :-
'दुःख-मध्ये कोन् दुःख हय गुरुतर?'
'कृष्णभक्त-विरह बिना दुःख नाहि देखि पर॥'247॥
अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "सब दुःखोंमेंसे कौनसा
दुःख सबसे भारी है?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर
दिया, — "श्रीकृष्णभक्तके विरहसे बढ़कर और कोई दुःख
मैं नहीं देखता हूँ॥"247॥
अनुभाष्य—(भाः 3/30/6)—
"मामणाराध्य दुःखार्त्तः कुटुम्बासक्तमानसाः।
सत्सङ्ग-रहितो मर्त्यो वृद्धसेवा-परिच्युतः॥"
"मेरी आराधना न करके कुटुम्बमें आसक्त चित्तवाले
जीव साधुसङ्गरहित और पूर्व साधुसेवासे भ्रष्ट होकर
दुःखों और कष्टोंमें पड़ जाते हैं।" (यह श्लोक उद्धृत
संख्याके अनुसार मूलग्रन्थमें दिखायी नहीं देता)
(बृः भाः 1/5/44)—
'स्वजीवनाधिकं प्रार्थ्यं श्रीविष्णुजनसङ्गतः।
विच्छेदेन क्षणं चात्र न सुखांशं लभामहे॥"
महाराज युधिष्ठिर श्रीनारदसे बोले, — "वास्तवमें भगवान्
श्रीविष्णुके भक्तोंका सङ्ग हमें अपने जीवनसे भी अधिक
प्रार्थनीय है, परन्तु अब उन्हीं भक्तोंके विच्छेदसे हम इस
संसारमें एक क्षणके लिये तनिक भी सुख प्राप्त नहीं
कर पा रहे हैं॥"247॥
(5) कृष्णप्रेमी ही सर्वश्रेष्ठ मुक्त :-
'मुक्त-मध्ये कोन् जीव मुक्त करि' मानि?'
'कृष्णप्रेम याँर, सेइ मुक्त-शिरोमणि॥'248॥
अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "मुक्तगणोंमेंसे किस जीवको
मुक्त मानना चाहिये?" श्रीरामानन्द रायने उत्तर
दिया, — "जिनमें श्रीकृष्णप्रेम है, वे ही मुक्त-शिरोमणि
हैं॥"248॥
अनुभाष्य—(भाः6/14/4)—
"मुक्तानामपि सिद्धानां नारायण परायणः।
सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥"
"हे महामुने! करोड़ों मुक्त और सिद्ध पुरुषोंमें भी
प्रशान्तात्मा नारायण-परायण भक्त अत्यन्त दुर्लभ हैं॥"248॥
(6) कृष्णलीला-गान ही शुद्ध-जीवात्माका सहज धर्म :-
'गान-मध्ये कोन् गान—जीवेर निज धर्म?'
'राधाकृष्णेर प्रेमकेलि—येइ गीतेर मर्म॥'249॥
अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, — "समस्त गानोंमें कौन-सा
गान जीवका निज (स्वरूप) धर्म है?" श्रीरामानन्द रायने
उत्तर दिया, — "श्रीराधाकृष्णकी प्रेमकेलि लीलाओंका गान
करना ही समस्त गीतोंका सार है॥"249॥
अनुभाष्य—(भाः 10/33/36)—
"अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमाश्रितः।
भजते तादृशीः क्रीड़ा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत्।"
"भगवान् श्रीकृष्णने भक्तोंके प्रति अनुग्रह करनेके
लिये जो गोलोककी रासलीला प्रपञ्चमें प्रकट की है,
उसे श्रवण करके मनुष्य देहधारी प्राणीमात्र ही भगवत्-सेवामें
तत्पर होंगे॥"249॥
(7) कृष्णभक्तका सङ्ग ही जीवका एकमात्र श्रेय :-
'श्रेयो-मध्ये कोन् श्रेयः जीवेर हय सार?'
कृष्णभक्त-सङ्ग बिना श्रेयः नाहि आर॥'250॥
322 ।