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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1160, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1160

[ 8/200-214 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
(नवीनपत्रकुसुमादिसमाः), अतएव स्वतुल्याः सख्यः
(ललितादिप्रियनर्मसख्यः) कृष्णलीलामृत-रस-निचयैः सिक्तायां
अमुष्यां (राधायाम्) उल्लसन्त्यां च [सत्यां ताः] सख्यः
स्वसेकात् (स्व-सेचनात्) शतगुणम् अधिकं जातोल्लासाः
(हर्षान्विताः) भवन्ति, इति यत्, तत् न चित्रं (विस्मयकरम्)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥210॥
श्रीराधिकाकी सखियोंके प्रति प्रीति :-
यद्यपि सखीर कृष्ण-सङ्गमे नाहि मन।
तथापि राधिका यत्ने करान सङ्गम॥211॥
नाना-छले कृष्णे प्रेरि' सङ्गम कराय।
आत्मसुख-सङ्ग हैते कोटि-सुख पाय॥212॥
श्रीराधा और सखियोंकी परस्पर प्रीतिमें कृष्णका सुख :-
अन्योन्ये विशुद्ध प्रेमे करे रस पुष्ट।
ताँ-सबार प्रेम देखि' कृष्ण हय तुष्ट॥213॥
सहज गोपीर प्रेम,—नहे प्राकृत काम।
कामक्रीड़ा-साम्ये तार कहि 'काम'-नाम॥214॥
अनुवाद—यद्यपि सखियोंकी श्रीकृष्णके साथ सङ्गमकी
थोड़ीसी भी इच्छा नहीं होती, तथापि श्रीराधाजी बड़े
प्रयत्नके साथ उनका श्रीकृष्णसे सङ्गम करा ही देती
हैं। श्रीराधाजी अनेक प्रकारके छल, चतुरायी, युक्तियोंसे
उन्हें श्रीकृष्णके पास भेजती हैं। श्रीराधाजीको भी अपने
सङ्गम-सुखसे जितना आनन्द होता है, उससे भी
करोड़ों गुणा अधिक सखियोंको श्रीकृष्णसे मिलानेमें
प्रसन्नता होती है। राधाजी और सखियोंका एक दूसरेके
प्रति विशुद्ध प्रेम रसका निरन्तर पोषण करता रहता है।
इनके परस्पर प्रेमकी परिपाटीको देखकर श्रीकृष्ण बड़े
सन्तुष्ट होते हैं। गोपियोंका श्रीकृष्णप्रेम सहज-स्वाभाविक
है, इसमें प्राकृत कामकी लेशमात्र गन्ध भी नहीं है।
लौकिक कामक्रीड़ाके समान प्रतीत होनेके कारण ही
इस प्रेमको 'काम' कहा गया है॥211-214॥
अनुभाष्य—'अन्योन्थे'—परस्पर। श्रीराधिका और उनकी
सखियाँ अपने-अपने सुखकी अभिलाषामें किसी प्रकारसे
चेष्टाशीला न होकर एक-दूसरेके द्वारा श्रीकृष्ण सेवा
करवाकर प्रेमको पुष्ट कराती है, उसको देखकर
श्रीकृष्ण सन्तुष्ट होते हैं॥213॥
अमृतानुकणिका—'प्रेम विलास विवर्त्त'के विषयमें
श्रवण करके महाप्रभुने सन्तोष व्यक्त किया कि साध्य
वस्तुकी अवधि यही है, अब आप इसे प्राप्त करनेका
साधन बताइये। तब श्रीरायने कहा—'साधनकी कथा
अत्यन्त रहस्यपूर्ण है। सखियोंके अतिरिक्त
श्रीराधाकृष्णकी लीलामें किसीका अधिकार नहीं है।
क्योंकि वे श्रीराधाकी समतजातीय हैं, उनकी भावनाओंको
समझती हैं, उन्हींके समान महाभाव-स्वरूपा है तथा प्रेम
और सेवाकी परिपाटीमें सुदक्ष हैं। वे ही अभिसार
करवाना, शृङ्गार रचना, संवाद भेजना आदि लीला-विस्तारक
सेवाओंमें कुशल हैं। वे श्रीराधा और श्रीकृष्ण—दोनोंकी
ही परम विश्वासपात्री हैं। श्रीराधाकृष्णकी कुञ्जलीलाओंमें
उन्हींका आश्रय ग्रहण करके प्रवेश सम्भव है।
कुञ्ज-सेवा प्राप्तिका लोभ और रसिक वैष्णवोंका सङ्ग
ही इसका हेतु है। परन्तु जो अभी जड़देहमें आबद्ध
हैं, उन्हें मनके द्वारा भी कदापि ऐसा विचार या
आचरण नहीं करना चाहियें। समुद्र-मन्थनसे उत्पन्न
विषका पान केवल श्रीरुद्र ही कर सकते हैं, अन्य कोई
करे तो वह निश्चय ही विनाश को प्राप्त होगा।
श्रीराधाकृष्णकी लीलाएँ चिन्मय एवं विशुद्ध हैं। सम्पूर्ण
रूपसे स्थूल देहगत सुखोंसे अपरिचित होकर इनमें
प्रवेश प्राप्त होगा, अन्यथा जीव अधःपतित होकर
नरकगामी हो जाता है।
गोविन्दलीलामृत (10/17)—'विभुरपि सुखस्वरूप'
—सर्वव्यापी ईश्वर जिस प्रकार निज चिदैश्वर्यके बिना
पूर्ण नहीं होते, उसी प्रकार अति महान स्वप्रकाश और
सुख स्वरूप अर्थात् अनन्त होनेपर भी श्रीराधाकृष्णका
भाव सखियोंके बिना क्षणमात्रके लिए भी रसयुक्त नहीं
हो सकता। कौन ऐसा रसिक व्यक्ति होगा जो परम
रसिक-रसज्ञ गोपियोंका आश्रय ग्रहण नहीं करेगा,
312 ।