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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1124, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1124

[ 8/107-115 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
करनेपर ही जाना जा सकता है कि श्रीराधाप्रेम तो
अमृतकी खान है ॥ 107 ॥
रासका वर्णन :-
शतकोटि गोपी-सङ्गे रास-विलास।
तार मध्ये एक-मूर्त्ये रहे राधा-पाश ॥ 108 ॥
श्रीराधिकाके श्रीकृष्णप्रेममें वामता-भावकी प्रधानता :-
साधारण-प्रेम देखि' सर्वत्र 'समता'।
राधार कुटिल-प्रेम हइल 'वामता' ॥ 109 ॥
अनुवाद—सौ-करोड़ गोपियोंके साथ रास-विलास
करते समय श्रीकृष्ण जिस प्रकार अपनी एक-एक
मूर्तिसे प्रत्येक गोपीके साथ विराज रहे थे, उसी प्रकार
उनमेंसे एक श्रीकृष्णमूर्ति श्रीराधाके पास भी विद्यमान
थी। अपने प्रति श्रीकृष्णका दूसरी गोपियोंके समान
साधारण प्रेम देखकर श्रीराधामें वाम्य-भाव उत्पन्न हो
गया, क्योंकि प्रेमका स्वभाव ही कुटिल होता है॥ 108-109 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—रासमण्डलमें दो-दो गोपियोंके
बीच एक मूर्ति श्रीकृष्ण एवं श्रीराधिकाके पार्श्वमें एक
मूर्ति श्रीकृष्ण—इस प्रकारसे प्रकाशित हुए थे। श्रीराधिकाने
उसमें अपने कुटिल-प्रेमकी 'वामता' प्रकाशित की ॥ 109 ॥
श्रीकृष्णप्रेमका कौटिल्य :-
उज्ज्वलनीलमणिके शृङ्गारभेद-कथनमें (102)—
अहेरिव गतिः प्रेम्णः स्वभावकुटिला भवेत्।
अतो हेतोरहेतोश्च यूनोर्मान उदञ्चति ॥ 110 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 110 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—(उज्ज्वलनीलमणिमें कहा गया
है)—सर्पके समान प्रेमकी भी स्वाभाविक कुटिल गति
होती है; इसी कारणसे युवक और युवतीमें 'अहेतु'
(बिना किसी कारणसे) और 'सहेतु' (किसी कारणसे)—इन
दो प्रकारका मान उदित होता है ॥ 110 ॥
अनुभाष्य—
अहेः (सर्पस्य) इव प्रेम्णः गतिः स्वभावकुटिला (निसर्गतः
वक्रा) भवेत्; अतः (अस्मात् कारणात्) हेतोः (कारणोदयात्)
अहेतोः च (कारणाभावदपि) यूनोः (कान्ताकान्तयोः) मानः
उदञ्चति (उदेति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 110 ॥
श्रीराधाके रास परित्यागसे श्रीकृष्णका उनको ढूँढ़ना :-
क्रोध करि' रास छाड़ि' गेला मान करि'।
ताँरे ना देखिया व्याकुल हैल हरि ॥ 111 ॥
सम्यक् वासना कृष्णेर, इच्छा रासलीला।
रासलीला-वासनाते राधिका शृङ्खला ॥ 112 ॥
ताँहा बिना रासलीला नाहि ताँर चित्ते।
मण्डली छाड़िया गेला राधा अन्वेषिते ॥ 113 ॥
इतस्ततः भ्रमि' काँहा राधा ना पाञा।
विषाद करेन कामबाणे खिन्न हञा ॥ 114 ॥
श्रीकृष्णकामपूर्त्ति-विग्रह श्रीराधाका असमोर्ध्वत्व :-
शतकोटि-गोपीते नहे काम-निर्वापण।
ताहातेइ अनुमानि श्रीराधिकार गुण ॥” 115 ॥
अनुवाद—राधाजीको सहेतुक मान हो गया और वे
मान करके रासमण्डली छोड़कर चली गयीं। श्रीहरिने
जब उन्हें रासस्थलीमें नहीं देखा, तो वे व्याकुल हो
उठे। रासलीला ही श्रीकृष्णकी सम्पूर्णरूपसे सारभूता
इच्छा है अर्थात् प्रधान-वासना है। रासलीलाकी वासनाको
आबद्ध करनेके लिये राधाजी ही प्रधान शृङ्खला हैं।
श्रीराधाके बिना रासलीलामें श्रीकृष्णका चित्त नहीं
लगता, इसलिये वे रासमण्डलीको छोड़कर श्रीराधाको
ढूँढ़ने चले गये। इधर-उधर भ्रमण करनेपर भी जब
श्रीराधा नहीं मिली, तो श्रीकृष्ण कामबाणसे खिन्न होकर
विषाद करने लगे। रासस्थलीमें शतकोटि गोपियाँ भी
श्रीकृष्णके कामकी पूर्ति नहीं कर सकीं, इससे ही
राधाजीके गुणोंका अनुमान लगाया जा सकता
है॥” 111-115 ॥
अनुभाष्य—इसी अध्यायकी 104 संख्याका अमृतप्रवाह
भाष्य देखें ॥ 112-113 ॥
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