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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1122, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1122

[ 8/100-106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महाप्रभुका उल्लास और श्रीरायकी प्रशंसा करना :-
प्रभु कहे,–“आगे कह, शुनिते पाइ सुखे।
अपूर्वामृत-नदी बहे तोमार मुखे ॥ 100 ॥
अद्वितीया श्रीराधाके प्रति श्रीकृष्णका निरपेक्ष प्रेम :-
चुरि करि' राधाके निल गोपीगणेर डरे।
अन्यापेक्षा हैले प्रेमेर गाढ़ता ना स्फुरे ॥ 101 ॥
श्रीराधामें श्रीकृष्णका एकनिष्ठ प्रेम :-
राधा लागि' गोपीरे यदि साक्षात् करे त्याग।
तबे जानि,–राधाय कृष्णेर गाढ़-अनुराग ॥"102 ॥
अनुवाद-इस श्लोकको सुनकर महाप्रभु गद्गद हो
उठे और कहने लगे,–“आगे और कहो राय, मुझे यह
सुनकर बड़ा सुख प्राप्त हो रहा है। तुम्हारे मुखसे
अद्भुत, अनुपम, अमृतकी चमत्कारपूर्ण नदी प्रवाहित हो
रही है। श्रीकृष्ण अन्य गोपियोंके भयसे श्रीराधाको चोरी
करके ले गये। जहाँ अन्यापेक्षा है अर्थात् वे दूसरी
गोपियोंसे भी प्रेम करते हैं, वहाँ श्रीराधाके प्रेमकी
प्रगाढ़ता दूसरी गोपियोंसे अधिक प्रमाणित नहीं होती।
यदि श्रीकृष्ण समस्त गोपियोंके सम्मुख ही उन सबका
परित्यागकर श्रीराधाको अपने साथ ले जाते, तो समझा
जा सकता है कि श्रीकृष्णका श्रीराधाजीके प्रति
सर्वाधिक दृढ़ अनुराग था ॥ 100-102 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-रासलीलामें श्रीकृष्णने देखा, - अन्य
समस्त गोपियोंके साथ विराजमान राधिकाके साथ
निरपेक्ष प्रेम नहीं हुआ, अन्य गोपियोंकी अपेक्षाके
कारण प्रेमकी अति गाढ़ स्फूर्त्ति नहीं हुई, इसी कारण
श्रीकृष्ण गोपियोंके भयसे राधिकाको रासस्थलीसे चोरी
करके अन्य गोपियोंसे अलग होकर वहाँसे चले गये।
“कंसारिरपि” श्लोक (संख्या 105) यहाँ पर उदाहरणीय
है ॥ 101-102 ॥
श्रीराधामें श्रीकृष्णकी प्रीतिका निरुपमत्व :-
राय कहे,–“तबे शुन प्रेमेर महिमा।
त्रिजगते राधा-प्रेमेर नाहिक उपमा ॥ 103 ॥
सेवककी सेवा ग्रहण करनेके लिये उसके
दर्शन न होनेसे सेव्यका विलाप :-
गोपीगणेर रास-नृत्य-मण्डली छाड़िया।
राधा चाहि' वने फिरे विलाप करिया ॥ 104 ॥
अनुवाद-श्रीरायने कहा,-“तब राधाप्रेमकी महिमाको
सुनो। तीनों लोकोंमें श्रीमती राधारानीके प्रेमकी कोई
उपमा नहीं है। श्रीराधाके मान करके रास छोड़ जानेपर
श्रीकृष्ण गोपियोंकी रास-नृत्य-मण्डलीको छोड़कर श्रीराधाको
खोजनेके लिये विलाप करते हुए वनमें घूमने
लगे ॥ 103-104 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिका रासमण्डलीमें गोपियोंकी
साधारण प्रेम-सुलभ ममताको देखकर कौटिल्यवामतासे
युक्त होकर रासमण्डलीको छोड़कर चली गयीं। श्रीकृष्णकी
इच्छा थी कि श्रीमती रासलीलाके रसकी पुष्टि करें,
किन्तु उनके भावमें श्रीकृष्ण खिन्न होकर विलाप
करते-करते श्रीमतीको ढूँढ़नेके लिये वनमें घूमने
लगे ॥ 104 ॥
श्रीराधा ही श्रीकृष्णप्रीति-सेवाकी मूर्ति :-
श्रीगीतगोविन्द (3/1)-
कंसारिरपि संसारवासनाबद्धशृङ्खलाम्।
राधामाधाय हृदये तत्याज व्रजसुन्दरीः ॥ 105 ॥
अनुवाद-कंसारि (श्रीकृष्ण) ने सम्पूर्ण साररूप
रासलीलाकी वासनाके बन्धनको दृढ़ करनेवाली शृङ्खलारूपी
रासक्रीड़ाकी परमाश्रया श्रीराधाको हृदयमें पूर्णरूपसे
धारण करके अन्य सभी गोपियोंको त्याग दिया ॥ 105 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/219 संख्या देखें ॥ 105 ॥
श्रीगीतगोविन्द (3/2)-
इतस्ततस्तामनुसृत्य राधिकामनङ्ग-
बाणव्रण-खिन्नमानसः ।
कृतानुतापः स कलिन्दनन्दिनी-
तटान्तकुञ्जे विषसाद माधवः ॥ 106 ॥
274 ।