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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1119

आठवाँ अध्याय 8/93-98 ]
आनन्दसे ऐसी विह्वल हो गयीं कि वे यह न समझ
सकीं कि श्रीकृष्ण उनके दोनों ओर विराजमान हैं।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं- 'श्रीकृष्ण
गोपीमण्डलके मध्यमें विराजमान रहते हुए ऐसी तीव्र
गतिसे नृत्य कर रहे थे कि एक परमाणु मात्र समयके
भीतर ही मध्य-स्थलसे आकर मण्डलस्थ करोड़ों
गोपियोंको नृत्य-सहित आलिङ्गन करते हुए पुनः
मध्यस्थलमें उपस्थित हो जाते थे। श्रीकृष्णका यह तीव्र
गतिसे नृत्य-सञ्चालन अलात-चक्रकी अपेक्षा भी
अत्यन्त अधिक तीव्र सूचित हो रहा है, क्योंकि उन
समस्त गोपियोंने श्रीकृष्णको अपने समीप ही अनुभव
किया था।'
इस प्रकारकी अद्भुत क्रियाके सम्पादनका विशेषण
है- 'योगेश्वर'। श्रीकृष्ण दुर्घटन-घटन पटीयसी 'योगमाया'के
अधीश्वर होनेके कारण 'योगेश्वर' हैं। समस्त गोपियाँ
ही श्रीकृष्णके आलिङ्गनकी इच्छाका पोषण करती हैं
और श्रीकृष्ण भी उनकी इच्छा पूर्ण करना चाहते हैं।
इसलिये योगमायाने जितनी गोपियाँ थीं, उतनी संख्यामें
श्रीकृष्णकी प्रकाशमूर्ति प्रकटितकर दोनों पक्षोंकी इच्छा
पूर्ण की। ऐसा होनेपर भी श्रीकृष्ण जो प्रत्येक गोपीके
निकट देखे जा रहे थे, वह उनकी नाट्य-विद्याका
प्रभाव है। साथ ही श्रीकृष्ण श्रीवृषभानुनन्दिनीके साथ
आलिङ्गित मध्य-स्थलमें भी सुशोभित हो रहे थे। ये
सब क्रीड़ाएँ श्रीभगवान्‌की भगवत्ता-विशेषके द्वारा नहीं
अपितु नृत्य-शक्तिके अपूर्व कौशलके कारण
हुईं।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 93-94॥
(ग) गोपियोंका श्रीकृष्णप्रेम साध्यकी सीमा होनेपर
भी महाप्रभुके द्वारा पुनः प्रश्न :-
प्रभु कहे, - "एइ 'साध्यावधि' सुनिश्चय।
कृपा करि' कह, यदि आगे किछु हय॥" 95॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 95॥
अमृतप्रवाह भाष्य - यहाँ तकका सिद्धान्त श्रवण
करके महाप्रभुने कहा, - "श्रीगोपीजनवल्लभ-प्रेम ही
साध्यतत्त्वकी सीमा है, तथापि यदि और भी कुछ हो,
उसे बोलो॥" 95॥
प्रश्नकर्त्ता महाप्रभुका 'असमोध्वैत्व'-रूपमें
श्रीरायको ज्ञान :-
राय कहे, - "इहार आगे पुछे हेन जने।
एतदिन नाहि जानि, आछये भुवने ॥ 96॥
अनुवाद - श्रीराम call? श्रीरामानन्द रायने कहा,- “मैं अब तक
नहीं जानता था कि इस त्रिभुवनमें ऐसा कोई व्यक्ति
होगा, जो इसके भी आगे कुछ और पूछेगा ॥ 96 ॥
(घ) श्रीराधाका श्रीकृष्णप्रेम ही-साध्यशिरोमणि :-
इँहार मध्ये राधार प्रेम-'साध्यशिरोमणि'।
याँहार महिमा सर्वशास्त्रेते बाखानि ॥ 97 ॥
अनुवाद-इस कान्ताप्रेमके बीचमें तो बस श्रीराधाका
प्रेम ही है, जो 'साध्यशिरोमणि' है और जिसकी महिमा
सभी शास्त्रोंमें वर्णन की गयी है॥ 97॥
अमृतप्रवाह भाष्य-साधारण गोपियोंका जो श्रीकृष्णप्रेम
है, उसमेंसे श्रीराधाजीका श्रीकृष्णप्रेम ही साध्य-
शिरोमणि-तत्त्व है। साधारण जीवोंके लिये इस भाव
(श्रीराधाजीके) जैसे भावको ग्रहण करनेका उपदेश नहीं
है। किन्तु उस भावके अनुगत अर्थात् उसके अनुरूप
श्रीकृष्णप्रेमके अति-उच्च भाव ग्रहण करनेकी जीवोंकी
योग्यता सिद्धावस्थामें हो सकती है। साधनावस्थामें
राधिकाकी सखी और उनकी परिचारिकाओं (दासियों)का
भाव ही अनुसरणीय है। उद्धव-दर्शनसे राधिकाके जो
भाव महाप्रभुमें लक्षित होते थे, वे भाव जीवोंके लिये
साध्य नहीं है, किन्तु कुछ अन्य प्रकारसे अनुसरणीय
हैं॥ 97॥
श्रीराधाके समान श्रीराधाकुण्ड भी श्रीकृष्णको प्रिय :-
लघुभागवतामृत (2/45)में उद्धृत पद्मपुराण वाक्य-
यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा।
सर्वगोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्तवल्लभा ॥ 98 ॥
। 271