श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1108, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/77-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य— श्रीशुकदेवके द्वारा यशोदाजीके श्रीकृष्णवात्सल्यके वर्णनको सुनकर विस्मित राजा परीक्षितकी उक्ति—
हे ब्रह्मन्, नन्दः एवं महोदयं (महान् श्रेष्ठः उदयः उत्कर्षः यस्मिन् तत् अपूर्वफलोदयं) श्रेयः (मङ्गलप्रदं कर्म) किम् अकरोत्, महाभागा (अतिशय-सौभाग्यशालिनी) यशोदा वा किम् अकरोत्, हरिः यस्याः (यशोदायाः) स्तनं पपौ?
श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 77॥
यशोदाके यशका गान :—
श्रीमद्भागवत (10/9/20)—
नेमं विरिञ्चो न भवो न श्रीरप्यङ्गसंश्रया।
प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत् प्राप विमुक्तिदात् ॥ 78 ॥
अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78॥
अमृतप्रवाह भाष्य— यशोदा गोपीने साधारण जीवोंके मुक्तिदाता श्रीकृष्णसे जिस कृपाको प्राप्त किया था, वह ब्रह्मा, शिव अथवा विष्णुके वक्षःस्थलपर आश्रित लक्ष्मीको भी प्राप्त नहीं हुई॥ 78॥
अनुभाष्य— रस्सी द्वारा बाँधनेके लिये उद्यत माताको असमर्थ और थकी हुई देखकर श्रीकृष्ण स्वयं ही बँध गये; यशोदाजीके इस श्रीकृष्ण-वशकारिता-गुणके दर्शनसे परीक्षितके प्रति शुकदेवकी उक्ति—
गोपी (यशोदा) विमुक्तिदात् (श्रीहरेः सान्निध्यात्) यत् प्रसादं प्राप, तत् इमं प्रसादं विरिञ्चः (पुत्रो ब्रह्मापि) न, भवः (आत्मतुल्यः शम्भुः) न, अङ्गसंश्रया (पत्नी) श्रीः (लक्ष्मीः) अपि न लेभिरे।
श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78॥
अमृतानुकणिका— गौड़ीय वेदान्त प्रकाशनसे प्रकाशित श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामीके द्वारा सम्पादित “श्रीरायरामानन्द-संवाद” ग्रन्थ देखें॥ 77-79॥
(4) ‘कान्तभाव’ ही सर्वश्रेष्ठ प्रेमभक्ति :—
प्रभु कहे,—“एहो उत्तम, आगे कह आर।”
राय कहे,—“कान्तभाव—प्रेमसाध्यसार ॥” 79॥
अनुवाद— महाप्रभुने कहा, — “यह वात्सल्यप्रेम उत्तरोत्तर उत्तम है, पर आगे और जो है, उसे कहिये।” श्रीरामानन्द रायने कहा, — “श्रीकृष्णके प्रति कान्तभाव ही सब साध्योंका सार है॥” 79॥
अमृतप्रवाह भाष्य— महाप्रभुने कहा, — यद्यपि यह उत्तरोत्तर उत्तम हुआ है, तथापि इसको पार करके और एक रस है, जिसको ही 'साध्यसार' कह सकते हो। श्रीरायने उत्तर दिया, — श्रीकृष्णके प्रति 'कान्तभाव' ही प्रेमकी पराकाष्ठा रूप साध्योंका सार है। तात्पर्य यह है, — साधारण-प्रेममें 'ममता'का अभाव, दास्यरसमें 'विश्रम्भ' अथवा 'विश्वास'का अभाव, सख्यरसमें 'स्नेहाधिक्य'का अभाव और वात्सल्यरसमें 'निःसङ्कोच-भाव'का अभाव होनेके कारण साध्यप्रेमकी पूर्णता उन-उन रसोंमें नहीं होती। श्रीकृष्णके प्रति जब कान्तभाव उदित होता है, तभी सभी अभावोंसे शून्य, सभी साध्योंके सार एक अखण्ड प्रेमतत्त्वको प्राप्त किया जा सकता है॥ 79॥
अनुभाष्य— सख्यप्रेमकी अपेक्षा 'वात्सल्यप्रेम' उत्तम है, किन्तु जब महाप्रभुने श्रीरायको और भी अग्रसर होनेके लिये कहा, तब श्रीरामानन्दने 'कान्तभाव'को ही प्रेमका 'साध्यत्व' कहकर उल्लेख किया॥ 79॥
व्रजगोपियोंका माहात्म्य :—
(श्रीमद्भागवत 10/47/60)—
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः।
स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः।
रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ-
लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम्॥ 80 ॥
अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 80॥
अमृतप्रवाह भाष्य— श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरियोंके प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे
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