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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1094, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1094

[ 8/59-60 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीकृष्णको कर्मार्पण करना—यह तो साधन दिखता है।
कर्त्ताने कुछ कर्म करके उन्हें अर्पण किया—यह तो
क्रिया है, साधन है। किन्तु यहाँ श्रीकृष्णके प्रति समस्त
कर्मोंके अर्पणको 'सर्वसाध्य सार' कहा है, क्योंकि गीता
(3/9) में कहा है—
“यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥”
अर्थात् “हे कुन्तीनन्दन! श्रीविष्णुके लिये अर्पित
निष्काम कर्मके अतिरिक्त अन्य कर्मोंके द्वारा मनुष्यको
कर्मबन्धन प्राप्त होता है। अतः तुम फलाकाङ्क्षारहित
होकर भगवान् विष्णुके उद्देश्यसे कर्मका भली-भाँति
आचरण करो।”
विष्णुके लिये किये गये कर्मके अतिरिक्त अन्यान्य
सभी कर्म लोक-बन्धक हैं अर्थात् उन कर्मोंसे लोग
बद्ध हो जाते हैं। इसलिये उन कर्मोंसे जन्म-मरणके
चक्रसे मुक्ति नहीं होती। इसके विपरीत परमेश्वरके
लिये अर्पित कर्म बन्धनका कारण नहीं हैं। इसलिये
कह रहे हैं—'यज्ञार्थात्'। श्रुतियोंमें यज्ञको ही विष्णु कहा
गया है—'यज्ञो वै विष्णु'। भागवत (11/19/39)में भगवान्ने
स्वयं उद्धवजीको कहा है—'यज्ञोऽहं भगवत्तमः' अर्थात्
मैं वसुदेवनन्दन ही यज्ञ हूँ। श्रीविष्णुके लिये अर्पित
निष्काम कर्म ही यज्ञ कहलाता है। परन्तु श्रीविष्णुको
अर्पित धर्म भी यदि कामनाके साथ किया जाय, तो
वह बन्धनकारी होगा। इसके लिये ही कहते हैं—'मुक्तसङ्गः'
अर्थात् फलाकाङ्क्षारहित। 'तदर्थम् कर्म कौन्तेय' अर्थात्
कर्म और सांसारिक वस्तुओंके प्रति आसक्तिको काटकर।
भव-बन्धनसे मुक्ति ही श्रीकृष्ण-कर्मार्पणका फल है—यह
साध्य है और श्रीकृष्ण-कर्मार्पण साधन है।”—श्रीभक्तिवेदान्त
नारायण गोस्वामी॥59॥
भोगलिप्त कर्मोंको श्रीकृष्णको कर्मार्पणका आदेश :—
श्रीमद्भगवद्गीता (9/27)—
यत् करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥60॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥60॥
अमृतप्रवाह भाष्य—गीतामें कहा गया है, —“हे
कौन्तेय! तुम जो कुछ भी करो, जो कुछ भी खाओ,
जो कोई भी यज्ञ करो, जो कुछ भी दान करो और
जो भी तपस्या करो, वह सभी मुझ कृष्णको अर्पण
करो।
श्रीरायके प्रथम उत्तरमें वर्णाश्रम-धर्मके अन्तर्गत
की जानेवाली श्रीकृष्ण-आराधनाको 'साध्य' निर्दिष्ट
करनेपर महाप्रभुने उसको 'बाह्य' कहकर अपने प्रश्नके
यथार्थ उत्तरको प्रदान करनेके लिये सामान्य वर्णाश्रम-
धर्मकी अपेक्षा जो श्रेष्ठ है, उसे बतानेकी आज्ञा दी।
उसे सुनकर श्रीरायने उत्तर दिया, —उस वर्णाश्रमके
अन्तर्गत किये जानेवाले सभी कर्मोंको श्रीकृष्णमें अर्पण
करना ही 'सभी साध्योंका सार' कहा गया है॥59-60॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—
हे कौन्तेय (अर्जुन) यत् कर्म करोषि, यत् अश्नासि, यत्
ददासि, यत् जुहोषि, यत् तपस्यसि, तत् सर्वं मदर्पणं कुरुष्व।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें।
इस सन्दर्भमें भाः 11/2/36 श्लोक भी देखें॥60॥
अमृतानुकणिका—'नारद पञ्चरात्रमें कहा है—
'लौकिकी वैदिकी वापि या क्रिया क्रियते मुने।
हरिसेवानुकूलैव सा कार्या भक्तिमिच्छता॥'
अर्थात् हे मुने! मनुष्य लौकिक और वैदिक जिन
समस्त कर्मोंको करते हैं, भक्त्याभिलाषी व्यक्ति वे सब
कर्म जो हरिसेवाके अनुकूल हैं, उन्हींको करेंगे।'
यहाँ कर्मोंमें लौकिक और वैदिक—दोनों ही कर्म
कहे गये हैं। लौकिक कर्म हैं—भोजन-पान आदि और
वैदिक कर्म हैं—दान, तप, होम आदि। भगवान् कह
रहे हैं कि लौकिकी-वैदिकी सभी क्रियाएँ मुझे अर्पण
करो। इसका यह अर्थ नहीं है कि हम जो कुछ करें,
जो कुछ खायें-पीयें, सभी कुछ भगवान्के चरणोंमें
समर्पण करनेसे दोष नहीं होगा। अथवा ऐसा भी नहीं
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