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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1078

सातवाँ अध्याय 7/144-154 ]
अधम अवस्थामें ही अच्छा था, क्योंकि अब मुझमें
सुन्दर शरीरका अभिमान आ जायेगा॥"144-146 ॥
महाप्रभुके द्वारा वासुदेवको आचार्य होकर श्रीकृष्णनामका
उपदेश करते हुए जीवोंके उद्धार करनेका आदेश :—
प्रभु कहे,—"कभु तोमार ना हबे अभिमान।
निरन्तर कह तुमि 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम ॥ 147 ॥
कृष्ण उपदेशि' कर जीवेर निस्तार।
अचिराते कृष्ण तोमा करिबेन अङ्गीकार ॥"148 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"तुम निरन्तर 'कृष्ण'
'कृष्ण' नामका कीर्तन करना, तब तुम्हें कभी भी
अभिमान नहीं होगा। सभी जीवोंको श्रीकृष्णनामका
उपदेश देकर उनका उद्धार करना, श्रीकृष्ण तुम्हें शीघ्र
ही अङ्गीकार करेंगे॥"147-148 ॥
महाप्रभुकी कृपाको स्मरण करके
कूर्म और वासुदेवका क्रन्दन :—
एतेक कहिया प्रभु कैल अन्तर्धाने।
दुइ विप्र गलागलि कान्दे प्रभुर गुणे ॥ 149 ॥
अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभु वहाँसे अन्तर्धान
हो गये। तब कूर्म एवं वासुदेव ब्राह्मण परस्पर
आलिङ्गन करके महाप्रभुके गुणोंका गान करते हुए रोने
लगे॥ 149 ॥
इस आख्यानका नाम—वासुदेवका उद्धार,
महाप्रभुका नाम—'वासुदेवामृतप्रद' :—
'वासुदेवोद्धार' एइ कहिल आख्यान।
'वासुदेवामृतप्रद' हैल प्रभुर नाम ॥ 150 ॥
एइ त' कहिल प्रभुर प्रथम आगमन।
कूर्म-दरशन, वासुदेव-विमोचन ॥ 151 ॥
चैतन्यलीला-श्रवण करनेसे अचैतन्य-सेवकको
चैतन्यकी प्राप्ति :—
श्रद्धा करि' एइ लीला ये करे श्रवण।
अचिराते मिलये तारे चैतन्य-चरण ॥ 152 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने (ग्रन्थकारने) 'वासुदेव-
उद्धार' नामक कथाका वर्णन किया है और इस कारण
महाप्रभुका एक नाम 'वासुदेवामृतप्रद' हो गया। यह मैंने
महाप्रभुके द्वारा प्रथम यात्राके समय किये गये श्रीकृष्णदेवके
दर्शन और वासुदेवके उद्धारका वर्णन किया। जो
श्रद्धापूर्वक महाप्रभुकी इन लीलाओंका श्रवण करता है,
उसे शीघ्र ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति
होती है॥ 150-152 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम-कृत महाप्रभुके सौ
नामोंमें यह नाम भी है॥ 150 ॥
सातवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—'एइ लीला'—श्रीकृष्णचैतन्यके द्वारा भक्तिहीन
जीवोंको भक्ति दिये जानेपर वे सब श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख
जीव, पुनः आचार्यके रूपमें अन्य भक्तिहीन जीवोंको
भक्ति प्रदान करके उन्हें श्रीकृष्णसेवाोन्मुख कराते रहते
हैं। इस प्रकार अच्युत-गोत्रकी वृद्धि अर्थात् श्रौत-पन्था
प्रसारके द्वारा यह श्रीगौरसुन्दरकी अवतारवाद-माहात्म्य-
प्रदर्शन-लीला है॥ 152 ॥
सातवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
गुरुमुखसे श्रवणके फलस्वरूप अथवा
श्रौतपन्थासे ही श्रीचैतन्य-सेवा :—
चैतन्यलीलार आदि-अन्त नाहि जानि।
सेइ लिखि, येइ महान्तेर मुखे शुनि ॥ 153 ॥
शुद्धभक्तके चरणोंमें शरणागति ही
श्रीचैतन्यकी प्राप्तिका उपाय :—
इथे अपराध मोर ना लइओ, भक्तगण।
तोमा-सबार चरण—मोर एकान्त शरण ॥ 154 ॥
अनुवाद—मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाके
आदि-अन्तको नहीं जानता हूँ। मैं तो केवल वही
लिख रहा हूँ, जो मैंने महाजनोंके मुखसे श्रवण किया
है। इसलिये हे भक्तों! मेरा अपराध मत लेना, आप
सभीके चरणकमल ही मेरा एकमात्र आश्रय हैं॥ 153-154॥
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