श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री यामुनाचार्य को वैष्णव धर्म के प्रचार कार्य में सबसे बड़ी कठिनाई चोल
देश के राजा कुलोत्तुङ्ग शैव की कट्टरता और बर्बरता थी, इसीलिए उन्हें श्रीरामानुज
के सहयोग की अपेक्षा थी । आचार्य ने बड़े संघर्ष और धैर्य से उस बर्बर शासक का
सामना किया । उसने श्री रामानुज को शासकीय अधिकार से दरबार मे बुलाकर
समाप्त करने का ही निश्चय कर लिया, किन्तु कूरेश स्वामी ने आचार्य को चुपचाप
ममूर रवाना कर दिया और स्वयं दरबार में उपस्थित हो गए । उस क्रूर धर्मान्ध
शासक ने कूरेश स्वामी की आँखें निकलवाली थीं । यह भारत के सांस्कृतिक समाज
की लज्जास्पद घटना है जिसे वैष्णव समाज आज तक नहीं भुला पाता । अभी भी
वैष्णवों का अन्तःकरण उक्त संकीर्ण विचार वाले उपासकों के प्रति क्षुब्ध है ।
आचार्य ने मैसूर के राजा विट्तिदेव को प्रभावित कर वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित
किया और उसके सहयोग से अपनी अभीष्ट सिद्धि की । १११८ ई० में कुलतुङ्ग की
मृत्यु हो जाने के बाद आचार्य पुनः श्री रंगम आ सके, वहाँ उन्होंने आलवार सन्त
की मूर्तियों की स्थापना की । आचार्य के बढ़ते हुए प्रभाव से श्री रङ्गम के अर्चक
भी आचार्य श्री से ईर्ष्या करते थे, एकवार उन्होंने आचार्य को समाप्त करने की भी
योजना बनाई किन्तु अर्चक की पत्नी ने जो कि आचार्य की लीला से अभिभूत थीं
आचार्य को आगाह कर दिया जिससे उनका षड़यंत्र विफल हो गया । आचार्य ने
तिरुपति में गोविन्द राज की मूर्ति की स्थापना की । आचार्य चरण ने ७४ शिष्य
बनाए । आचार्य श्री का जीवन अत्यन्त संघर्षमय था, दक्षिण भारत के प्रचलित
शैव सम्प्रदाय से ही आचार्य को संघर्ष नहीं करना पड़ा अपितु पूर्व प्रचलित अन्यान्य
वैष्णव मतावलम्बियों से भी उनका संघर्ष हुआ । जिसका आजतक अंशतः प्रभाव
चला आ रहा है । आचार्य श्री रामानुज का सा संघर्षमय जीवन किन्हीं भी अन्य
का नहीं था आचार्य श्री ने जो कार्य किया है वह वैष्णव सम्प्रदाय के ऐतिह्य में
चिरस्मरणीय रहेगा, इनकी असीम कृपा से श्री वैष्णव सम्प्रदाय उपकृत है, अन्यथा
दक्षिण भारत तो वैष्णवता विहीन हो जाता ।
प्रयागस्थ श्री निम्बार्काचार्य पीठाधीश, जगद्गुरु स्वामी श्री राधाकृष्ण जी
महाराज के बालक स्वामी ललित कृष्ण जी ने श्री भाष्य का हिन्दी रूपान्तर कर
वैष्णव समाज के समक्ष श्लाघ्य आदर्श प्रस्तुत किया है । आशा है वैष्णवजन पर-
म्परित तथा पारस्परिक कथितभेदभाव को अनादृत कर समादर पूर्वक इसको ग्रहण
करेंगे । आचार्य ललित कृष्ण जी ने कई वर्ष पूर्व श्री निम्बार्काचार्य जी के भाष्य
वेदान्त पारिजात सौरभ का भी लोकभाषा में रूपान्तर किया है । श्री वल्लभाचार्य
के अणुभाष्य तथा श्री मध्वाचार्य के पूर्णप्रज्ञभाष्य के हिन्दी रूपान्तर भी इस
भाष्य के साथ प्रकाशित हुए हैं । निश्चित ही समस्त वैष्णव सम्प्रदाय के लिए यह
गौरव की बात है, ब्रह्मसूत्र के परम्परित वैष्णव भाष्यों को हिन्दी भाषियों के
समक्ष प्रस्तुत कर जो स्तुत्य प्रयास किया है उसके लिए लेखक धन्यवादार्ह हैं ।
श्री रामानुज जयन्ती, सं० २०३०
गतश्रम नारायण मंदिर \hfill रामानुज आचार्य
विश्रान्त घाट
मथुरा
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