श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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जानने की इच्छा को जिज्ञासा कहते हैं, इच्छा क्रिया में इष्यमाण
वस्तु प्रधान होती है, जिज्ञासा पद में इष्यमाण वस्तु ज्ञान है; इसलिए
ब्रह्म जिज्ञासा का तात्पर्य है, ब्रह्म ज्ञान । मीमांसा के पूर्व भाग से ज्ञात
कर्म की अल्प और अस्थिर फलता तथा उत्तर भाग से ज्ञात ब्रह्म ज्ञान
की अनन्त और अक्षय फलता से मन में निर्वेद होता है, जिसके फलस्वरूप
कर्म तत्त्व को भली भाँति जानकर ब्रह्म तत्त्व को भी जानना चाहिए
ऐसा भाव होता है। ऐसा ही वृत्तिकार ने कहा भी है—"कर्मतत्त्व को
भली भाँति जानने के बाद ब्रह्म ज्ञान की इच्छा होती है।"
वक्ष्यति च कर्मब्रह्ममीमांसयोरेकशास्त्र्यम्—"संहितमेतच्छा-
रीरकं जैमिनीयेन षोडशलक्षणेनेति शास्त्रैकत्वसिद्धिः” इति । अतः
प्रतिपिपादयिषितार्थभेदेन षट्कभेदवदध्यायभेदवच्च पूर्वोत्तर-
मीमांसयोर्भेदः । मीमांसाशास्त्रम्—"अथातो धर्मजिज्ञासा” इत्या-
रभ्य "अनावृत्तिश्शब्दादनावृत्तिश्शब्दात्” इत्येवमन्तं संगति-
विशेषेणाविशिष्टक्रमम् ।
वृत्तिकार कर्ममीमांसा और ब्रह्ममीमांसा दोनों को एक ही शास्त्र
बतलाते हैं—"यह शारीरक मीमांसा, जैमिनि कृत धर्म मीमांसा के
सोलह अध्यायों से मिलकर ही संपूर्ण एक शास्त्र के रूप में पूरी होती
है।" प्रतिपाद्य विषय को जैसे पाद और अध्यायों में बाँटकर अलग-
अलग वर्णन किया गया है, वैसे ही मीमांसा के पूर्व और उत्तर दो भेद
हैं। मीमांसा शास्त्र पूर्व मीमांसा के आदिम सूत्र "अथातो धर्म जिज्ञासा”
से लेकर उत्तर मीमांसा के अंतिम सूत्र "अनावृत्तिश्शब्दात्" में जाकर
संगति विशेष के विशिष्ट क्रम से पूरा हुआ है ।
तथाहि प्रथमं तावत् "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" इति अध्ययनेनैव
स्वाध्यायशब्दवाच्यवेदाख्याक्षरराशेर्ग्रहणं विधीयते ।
सर्व प्रथम विद्यार्थी को आदेश होता है "स्वाध्ययोऽध्येतव्यः", तथा
अध्ययन से स्वाध्याय शब्द वाच्य वेद नामक अक्षर राशि को ग्रहण करने
का विधान बतलाया जाता है ।
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