सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 645, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 645

( ५८३ )
“तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्” इत्यव्याकृते प्रधाने जगतः प्रलय-
मभिधाय “तन्नामरूपाभ्यां व्याक्रियत” इत्यव्याकृतादेव जगतः सृष्टि-
श्चाभिधीयते । अव्याकृतं अव्यक्तम् , नामरूपाभ्यां न व्याक्रिय ते न
व्यज्यत इत्यर्थः । अव्यक्तं प्रधानमेव । अस्य च स्वरूप नित्यत्वेन
परिणामाश्रत्वेन च जगत्कारणवादिवाक्यगतौ सदसच्छब्दौ ब्रह्म-
णीवास्मिन्न विरोत्स्येते । एवं अव्याकृत कारणत्वे निश्चिते सतीक्ष-
णादयः कारणगताः सृष्ट्यौन्मुख्याभिप्रायेण योजयितव्याः । ब्रह्मा-
त्मशब्दावपि बृहत्त्वप्यपित्वाभ्यां प्रधान एव वर्त्तेते अतः स्मृतिन्याय-
प्रसिद्धं प्रधानमेव जगत्कारणं वेदांतवाक्यैः प्रतिपाद्यते ।
“यह जगत् उस समय अव्याकृत था” इस वाक्य में अव्याकृत
शब्द वाच्य प्रकृति में प्रलय बतलाकर “वह अव्याकृत ही नाम रूप से
व्याकृत हो गया”इस वाक्य में उस अव्याकृत प्रकृति से ही जगत् की सृष्टि
भी बतलाई गई है । अव्याकृत का अर्थ है अव्यक्त, अर्थात् जो नामरूप से
व्यक्त न हो । अव्यक्त तो प्रधान है ही। यह प्रधान स्वरूपतः नित्य और
संपूर्ण परिणामों का आधार होने से, जगत् कारण के प्रतिपादक सत् और
असत् दोनों पदों से व्यवहृत हो सकता है, जैसे कि—ब्रह्म का दोनों शब्दों
से प्रयोग होता है । इस प्रकार जगत् के कारण रूप से, अव्याकृत के
निश्चित हो जाने पर, कारण के संबंध में कहे गए ईक्षण आदि गुणों को
भी, सृष्ट्योन्मुखी भाव के अभिप्राय से, अव्यक्त के साथ ही जोड़ना होगा ।
ब्रह्म और आत्मा शब्दों को भी, जो कि वृहत्व और व्यापकत्व के द्योतकं
हैं, प्रधान के लिए ही मानना होगा । इसलिए निश्चित ही सांख्यस्मृति-
प्रसिद्ध प्रधान ही वेदांत वाक्यों में जगत कारण के रूप से प्रतिपादित
है ।
सिद्धान्तः—एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे—“कारणत्वेन चा काशाषि”
इत्यादि, च शब्दस्तुशब्दार्थे, सर्वज्ञात् सर्वेश्वरात् सत्यसंकल्पान्निरस्त
निखिलदोषगन्धात् परस्माद् ब्रह्मण एव जगदुत्पद्यत इति निश्चेतुं