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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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द्वितीय प्रकार भी वैकल्पिक है, अर्थात् यह अजा, तेज जल पृथवी
रूप से विकृत ब्रह्म है, अथवा स्वरूपावस्थ अविकृत ब्रह्म है ? उसका
विकृत रूप तो हो नहीं सकता, क्योंकि विकृत रूप अनेक होता है, और
अजा एक है । अविकृत रूप भी "लोहित शुक्ल कृष्णा" इस विकृत वर्णन
से विरुद्ध है । इसलिए तेज जल पृथ्वी आदि रूप वाली स्वरूपावस्थिति
है ऐसा तो कह नहीं सकते ।
तृतीय प्रकार में भी, अजा शब्द से तेज जल पृथिवी आदि निर्दिष्ट
उसकी कारणावस्था ही माननी पड़ेगी । यदि ऐसा ही मानना है तो,
श्रुतिसिद्ध कारणावस्था के निर्देश को मानना ही श्रेष्ठ है ।
यत्पुनरस्याः प्रकृतेरजाशब्देन छागत्वपरिकल्पनमुपदिश्यत इति,
तदप्यसंगतम्, निष्प्रयोजनत्वात् । यथा-“आत्मानं रथिनं विद्धि”
इत्यादिषु ब्रह्मप्राप्त्युपायताख्यापनाय शरीरादिषु रथादिरूपणं
क्रियते तद्वदस्यां प्रकृतौ छागत्वपरिकल्पनं क्वोपयुज्यते ? न केवल-
मुपयोगाभाव एव, विरोधश्च, कृत्स्न जगत् कारणभूतायाः स्वस्मि-
न्नादिकाल संबद्धानां सर्वेषामेव चेतनानां निखिल सुखदुःखोपभोगा-
पवर्ग साधनभूतायाः अचेतनायाः अत्यल्प प्रजासर्गकरागंतुक संगम-
चेतन विशेषैकरूपा अत्यल्प प्रयोजन साधन स्वपरित्यागाहेतुभूत
स्वसंबंधिपरित्याग समर्थ चेतन विशेषरूपच्छागस्वभावख्यापनाय
तद्रूपत्वकल्पनं विरुद्धमेव । “अजामेकां” अजो ह्येकः “अजोऽन्यः”
इत्यत्राजाशब्दस्य विरूपार्थकल्पनं च न शोभनम् । सर्वत्र छागत्वं
परिकल्प्यत इतिचेत् “जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः” इति विदुष
आत्यंतिक प्रकृति परित्यागं कुर्वंतो अनेन वान्येन वा पुनरपि संबंध-
योग्छागत्वपरिकल्पनमत्यंत विरुद्धम् ।
यदि यह कहें कि--अजा शब्द का अर्थ बकरी है, ऐसा कहना भी
असंगत है, ऐसे अर्थ में अजा शब्द के प्रयोग का कोई प्रयोजन समझ में
नहीं आता । जैसे कि-“आत्मा को सारथी जानो” इत्यादि वाक्य में,
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