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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 696 में से

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पृष्ठ 502

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आत्मस्वरूप वैश्वानर अग्नि को उसने प्रक्षिप्त किया" तथा "यही प्राण
स्वरूप वैश्वानर अग्नि अनेक प्रकार से उद्‌गत होता है।" इत्यादि ।
वाक्य के प्रारंभ में विशेषार्थ ज्ञापक जो चिन्ह रहते हैं, उसी के आधार
पर संपूर्ण वाक्य का अर्थ किया जा सकता है ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते—वैश्वानरः साधारण शब्द विशेषात्-
वैश्वानरः पर एव आत्मा कुतः ? साधारण शब्द विशेषात् ।
विशेष्यत इति विशेषः—साधारणस्य वैश्वानर शब्दस्य परमात्मा-
साधारणैः धर्मविशेष्यमाणत्वादित्यर्थः । तथाहि—औपमन्यवादयः
पंचेमे महर्षयः समेत्य—"को न आत्मा किं ब्रह्म ?" इति विचार्य
"उद्दालको हि वै भगवन्तोऽयमारुणिः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानर-
मध्येति तं हन्ताभ्यागच्छाम" इत्युद्दालकस्य वैश्वानरात्मविज्ञानभव-
गम्य तमभ्याजग्मुः । स चोद्दालक एतान्वैश्वानरात्म जिज्ञासून-
भिलक्ष्यात्मनश्च तत्राकृत्स्नवेदित्वं मत्वा" तान हो वाच अश्वपतिर्वै
भगवतोऽय केकयः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानर मध्येति तं
हन्ताभ्यागच्छाम" इति । ते चोद्दालकषष्ठाः तमश्वपतिमभ्या-
जग्मुः ।
उक्त संशय पर सूत्रकार "वैश्वानरः साधारण शब्द विशेषात्"
सूत्र कहते हैं । अर्थात् वैश्वानर परमात्मा ही हैं, क्योंकि—साधारण
शब्द की अपेक्षा, विशेष शब्द का प्रयोग किया गया है जिसके द्वारा
विशेषित किया जाय उसे विशेष कहते है, अर्थात् वैश्वानर शब्द
साधारण अर्थ को बोधक होते हुए भी, परमात्मा के असाधारण
गुणों वाला होने से, उसी विशेषता का बोधक है । जैसा कि उल्लेख
मिलता है कि—उपमन्यु आदि पांच ऋषि एकत्र होकर "हमारा आत्मा
कौन है, ब्रह्म क्या है ?" ऐसा विचार कर रहे थे कुछ भी निर्णय करने
में अपने को असमर्थ पाकर उन्होंने सोचा कि—"आरुणि उद्दालक ही
इस समय वैश्वानर आत्मा के विशेषज्ञ हैं, चलें उन्हीं से इस विषय पर
ज्ञान प्राप्त करें" अतः वे आरुणि को वैश्वानर का विशेषज्ञ मानकर