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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 696 में से

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पृष्ठ 409

( १४६ )
पृषोदरादित्वात्पश्यच्छब्दावयवस्य यच्छब्दस्यलोपं कृत्वा व्युत्पादितो
विपश्चिच्छब्दः । यद्यपि मुक्तस्य विपश्चित्वं संभवति, तथापितस्यै-
वात्मनः संसारदशायामविपश्चित्वमप्यस्तीत निरुपाधिकं विपश्चित्त्वं
नोपपद्यते । निर्विशेषचिन्मात्रतापन्नस्यमुक्तस्य विविध दर्शनाभावा-
त्सुतरांविपश्चित्त्वं न संभवतीति न केनापि प्रमाणेन निर्विशेषवस्तु
प्रतिपाद्यत इति च पूर्वमेवोक्तम् ।
परमात्मा से भिन्न जीव, मुक्तावस्था में भी ब्रह्म नहीं हो सकता ।
मंत्रों से उसकी अभिज्ञता सिद्ध नहीं होती । उसका अभिन्न रूप से किसी
भी मंत्र में उल्लेख नहीं मिलता । निर्विशेष विशुद्ध स्वरूप आत्मा का
निरुपाधिक विपश्चित्व “सोऽकामयत" इत्यादि मंत्र में सत्य संकल्पत्व
के रूप से बतलाया गया है । अनेक तत्त्वों की युगपत दर्शन शक्ति को ही
विपश्चित्त्व कहते हैं । "पृषोदरादि" व्याकरणोय सूत्र से पश्यत् पद के
अवयव यत् अंश को लुप्त करके विपश्चित् शब्द बनाया जाता है । यद्यपि
मुक्त जीवात्मा में भी विपश्चित्व हो सकता है, उसी आत्मा का संसार
दशा में अविपश्चित्व भी संभव है, उसमें निरुपाधिक विपश्चित्त्व नहीं
हो सकता । निर्विशेष चिन्मात्र अवस्था वाले मुक्तात्मा में एक साथ सब
कुछ जान लेने की क्षमता भी नहीं है, इसलिए उसमें विपश्चित्त्व नहीं
हो सकता, और न किसी भी प्रमाण से निर्विशेष वस्तु प्रमाणित की जा
सकती है, ऐसा हम पहिले ही बतला चुके हैं ।
“यतो वाचो निवर्तन्ते" इति च वाक्यं यदि वाङ्मनसयोर्ब्रह्मणो
निवृत्तिमभिदधीत, न ततो निर्विशेषतां वस्तुनोऽवगयितुं शक्नुयात् ।
अपितु वाङ्मनसयोस्तत्राप्रमाणतां वदेत्, तथा च सति तस्य तुच्छ-
त्वमेवापद्यते । “ब्रह्मविदाप्नोति” इत्यारभ्य ब्रह्मणोविपश्चित्त्वं जगत्-
कारणत्वं ज्ञानानन्दैकतानतामितरान्प्रत्यानंदयितृत्वं कामादेव चिद-
चिदात्मकस्यकृत्स्नस्य स्रष्टृत्वं सृज्यवर्गानुप्रवेशकृततदात्मकत्वं
भयाभयहेतुत्वं वाग्वादित्यादीनां प्रशासितृत्वं शतगुणितोत्तरक्रमेण
निरतिशयानंदत्वमन्यच्चानेकं प्रतिपाद्य वाङ्मनसयोः ब्रह्मणि प्रवृत्त्य-