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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 696 में से

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जल और दूध के दृष्टान्त से प्रकृति जगत्कारणता
के किए गए समर्थन का निराकरण ।
२. ब्रह्म की सृष्टिकर्तृ'ता में जीव के पुण्यपापानुसार
प्रकृति की कारणता का समर्थन । पुण्य पाप की
शास्त्रगम्यता, परमेश्वर की दयालुता, और
निग्रहानुग्रह के आधार पर प्रकृति की जगत्कारणता
का खंडन ।
३. धेनु भुक्त तृण आदि की दुग्धाकार परिणिति की
तरह, ईश्वर प्रेरणा निरपेक्ष प्रकृति की जगदाकार
परिणिति के सिद्धान्त का खंडन ।
४. पंगु सहायक अंध तथा लोह सन्निहित चुम्बक मणि
की तरह, पुरुष निकटस्थ प्रकृति स्फुरण सिद्धान्त
का खंडन । सत्त्व, रज और तमोगुण में गुण प्रधान
भाव की अनुपपत्ति ।
५. प्रधान में ज्ञान शक्ति के अभाव के आधार पर
तत्संबंधी अन्यान्य अनुमानों की अनुपपत्ति का
प्रदर्शन । अनुमान के साहाय्य से प्रधान की स्थिति
की सिद्धि होते हुए भी उसकी व्यर्थता ज्ञापन ।
परस्पर विरोधी सिद्धान्तों के आधार पर सांख्यमत
की असमंजसता का दिग्दर्शन ।
६. शांकर सम्मत निर्विशेष चिन्मात्र की असत् बंध मोक्ष
भागित सिद्धान्त का खंडन । —७४३-६६
२. महद्दीर्घाधिकरण [सूत्र १०-१६]
१. वैशेषिक परमाणु कारणवाद का वर्णन एवं उसकी
अनुपपत्ति का प्रदर्शन । १०वें सूत्र की शांकर
व्याख्या में दोष दिग्दर्शन ।
२. परमाणुगत प्राथमिक क्रियोत्पत्ति की असंभवता का
वर्णन । समवाय संबंध का खंडन । युत सिद्धि और
अयुतसिद्धि का विचार तथा समवाय स्वीकृति में
अनवस्था दोष की शंका । समवाय संबंध की नित्यता