श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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२. पूर्वपक्ष--भूमा की जीवता का संशय
३- (सिद्धान्त)-भूमा की परमात्मकता का निरूपण तथा
उसकी सुखरूपता आदि विशिष्ट गुणों का उप-
पादन । —पृ०४६२-७७
३. अक्षराधिकरण (सूत्र ९-११)
१. पूर्वपक्ष--वेदोक्त अक्षर शब्द की प्रधान, जीव और
पर ब्रह्म अर्थों में अभिशंका उत्थापन पूर्वक प्रधान
और जीव के अर्थ में संभावना का संशय ।
२. (सिद्धान्त) सर्व जगत् विधारकत्ता, सर्वशास्ता और
अच्युतत्व के आधार पर अक्षर तत्त्व की परब्रह्मार्थकता
का प्रतिपादन । —पृ०४७७-८३
४. ईक्षति कर्माधिकरण (सूत्र १२)
१. त्रैमात्रिक प्रणवोपासना की प्रतिपादक श्रुति के अर्थ
का विवेचन । उपास्य “पर पुरुष” की जीवार्थकता का
निरास, ईक्षणीय “पर पुरुष” की ब्रह्मात्मकता का
प्रतिपादन । —पृ०४८३-८७
५. दहराधिकरण (सूत्र १३-२२)
१. पूर्वपक्ष—“दहराकाश” की जीवात्मकता और भूता-
काशता का संशय ।
२. (सिद्धान्त) सत्यकामता, आदि विशिष्ट गुणों के आधार
पर दहर की परब्रह्मता का निरूपण ।
३. सुषुप्ति में जीवों की दहराकाश गति की प्रकाशिका
श्रुति, दहर के लिए प्रयुक्त ब्रह्मलोक शब्द के उल्लेख
तथा दहर के ब्रह्म संबंधीय गुणों के आधार पर उसकी
परमात्मकता का समाधान ।
४. गति श्रुति के अन्यार्थ का निरूपण । विश्वधारण
महिमा, अपहतपाप्मता आदि विशिष्ट गुण, के
अनुसार दहर की ब्रह्मात्मकता का उपपादन ।
५. दहर की जीवताविषयक संभावना का समाधान
जीव की अविद्या रहित अवस्था के प्रदर्शन के निमित्त