श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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विरुद्ध प्रतीत होता है किन्तु निर्गुणश्रुति का तात्पर्य है कि ब्रह्म में कोई प्राकृत
गुण नहीं है सगुण श्रुति में सत्यसंकल्प सत्यकाम आदि उन अलौकिक गुणों
का उल्लेख है जो कि एकमात्र परमात्मा में ही है, जीव या जड़ में कदापि संभव
नहीं है। श्रुतियों में कहीं-कहीं ऐसा भी उल्लेख है कि ब्रह्म में कोई अवगुण नहीं
हैं अपितु अनेक कल्याण गुण हैं। श्रुतियों के उल्लेख निर्विकार आदि शब्द जगत
के आदि कारण रूप ब्रह्म के ज्ञापक हैं “जीव ब्रह्म भिन्न है” जीव ब्रह्म एक है
'ब्रह्म निर्गुण है” ब्रह्म सगुण है "इत्यादि वाक्यों का संदर्भानुसार अलग-अलग
अभिप्राय है। जहाँ एकता की बात है वहाँ जीव ब्रह्म और जीव प्रकृति में भेद
है ये प्रकृति और जीव, ब्रह्म के शरीर से भिन्न कुछ और नहीं है इस कथन में
वदतोव्याघात नहीं होता। यही विशिष्टाद्वैत का अभिप्राय है। इस मत के
समर्थन में आचार्य रामानुज ने अनेक प्रकार से विचार किया है जो कि संक्षेप
में इस प्रकार है ।
आचार्य के मत में ब्रह्म जिज्ञासा का वही अधिकारी है जिसे कर्म और
कर्मफल की अनित्यता का यथोचित ज्ञान हो चुका हो । उसे प्रथम शास्त्र चिन्तन
करना होगा तभी उसे कर्मफल की अनित्यता का परिज्ञान हो सकेगा तभी उसे
उससे मुक्त होने की अभिलाषा होगी तथा स्थिर फलावाप्ति की इच्छा के फल-
स्वरूप ब्रह्म की जिज्ञासा होगी। अविद्या की निवृत्ति ही वास्तविक प्रयोजन है।
उपासना द्वारा ब्रह्म साक्षात्कार हो जाने पर ही अज्ञान से छुटकारा संभव
है । मुक्त जीव ईश्वर के दास के रूप में ईश्वर की नित्यलीला में अपार आनन्द
का उपभोग करता है । ध्यान और उपासना ही मुक्ति के साधन हैं, ज्ञान मुक्ति
का साधन नहीं है. ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान से अविद्या की निवृत्ति नहीं हो सकती क्योंकि
जब बन्धन पारमार्थिक है तब इस प्रकार के ज्ञान से उसकी निवृत्ति कैसे संभव है।
वेदन, ध्यान' उपासना आदि शब्द भक्ति के ही सूचक हैं । भक्ति, साधन और फल
दो प्रकार की है ।
जिज्ञास्य ब्रह्म, सगुण और सविशेष हैं उसकी शक्ति माया है । वह अशेष
कल्याणकारी गुणों के आलय हैं उनमें हेयता नहीं है । सर्वेश्वरत्व सर्वेशितृत्व
सर्वफलप्रदत्व, सर्वाधारत्व, सर्वकार्योत्पादकत्व, समस्तद्रव्य शरीरत्व आदि उनके
लक्षण है । चिदचिच्छरीरत्व उनका मुख्य लक्षण है । समस्तचिदचिद् विशेष
रूप में वे जगत के उपादान कारण हैं, संकल्प विशिष्ट रूप में निमित्त कारण
हैं। भगवान नारायण, सृष्टिकर्त्ता, कर्मफलदाता, नियन्ता और सर्वान्तर्यामी
है । पर, व्यूह, विभव अन्तर्यामी और अर्चावतार भेद से वे पाँच प्रकार के