स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
द्वितीयः निष्यन्दः २९९
ध्येय के साथ तन्मय हो जाय— 'ध्येयः प्रत्यक्षतां याति ध्याता तन्मयतां व्रजेत् ॥' कैसे
साक्षात्कार हो पाता है ?
(१) ऋच्छतस्त्विति (२) पाठाद्वा (३) चिन्तयतोऽत्र या फिर इससे होती है—
तदात्मतासमापत्तिरैक्यं तस्योदयः स तु ॥' मन्त्र देवता के साथ जो तादात्म्य प्राप्त होता है
और जो कि अन्तः संवेदन के द्वारा आत्मग्रह का कारण बनता है उस मन्त्रन्यासात्मक
आत्मग्रह का आविर्भाव ही 'उदय' है । (उत्पलदेवाचार्य) ।
रामकण्ठ की व्याख्या—तस्य = उसके । उस । किसी । ध्येय = उन उन
आकारों के द्वारा स्मर्तव्य, मन्त्र-वाच्य देवता विशेष ॥
उदयः = उस-उस अर्थ क्रिया के संपादक अमोघ शक्ति के द्वारा उन-उन उपास्यों
का आकारात्मक प्रथन । इच्छतः = इच्छा करने वाले का । इच्छावस्था में स्थित मन्त्रजप
की इच्छा करने वाले का । समापत्तिः = एकीभाव । 'तदात्मता' ध्येय की जो आत्मा है
(उसका स्वस्वरूप है) उसका भाव ही 'तदात्मता' । उसके द्वारा प्राप्त 'समापत्ति'
(एकीभाव) ।
न्यासादिक के अभिप्राय से मन्त्रोच्चारणावस्था में मन्त्ररूद्ध देवाकार में साधक के
चित्त में बिना प्रयत्न के संपद्यमान अभिन्न रूपत्व है वही है परामर्श करने में सक्षम
संवित्ति वाले ध्याता का (मुख्याराध्य देवता का) प्रत्यक्ष देव दर्शन स्वरूप 'उदय' ॥ यही
है शिवरूपतापत्ति ॥
रामकण्ठाचार्य कहते हैं कि— इयमेव = यही । यथाप्रतिपादित शरीरादिक
विनश्वर वस्तु में अहं प्रत्यय का आलम्बन ग्रहण करने वाले स्वप्रकाश व्यतिरिक्त
वेद्यभाव प्रतीति युक्त मिथ्या ज्ञान के उच्छेद के द्वारा अनवच्छिन्न-स्वच्छ-स्वच्छन्द
स्वभावमात्रैक तत्त्वोपलब्धिरूपा संवित् (सम्यक् ज्ञान) ही 'अमृत प्राप्ति' है— 'अमृत' का
अर्थ है अविनाशी शिवात्मक आत्मा 'प्राप्ति' = उपलब्धि ।
अमृतप्राप्ति—अविनाशीशिवात्मक आत्मा की प्राप्ति न कि जड़ अमृत की
प्राप्ति ॥ ('न तु द्रव्यविशेषात्मकस्य') जड़, अनित्य एवं सामुद्र अमृत को यहाँ अमृत
नहीं कहा गया है । आत्मग्रह = इस प्रकार के मन्त्रोच्चारण के काल में क्षणभाविनी जो
संवित् तत्त्व रूप आत्मा है । उसका ग्रहण = आत्मग्रह ॥ या दीक्षा के समय गुरु द्वारा
शिष्य की आत्मा का ग्रहण = आत्म ग्रह ॥
निर्वाण दीक्षा = द्वैतप्रत्यय से निवृत्ति ही 'निर्वाण' है । यह निर्वाण है क्या?
रामकण्ठाचार्य कहते हैं—यह द्वैत प्रत्यय के परिक्षय से प्राप्त आत्यन्तिकी प्रशान्ति है ।
यह संवित्तत्त्व के स्वस्वभाव की व्यवस्थिति है ।
'दीक्षा' क्या है? 'स्वरूप संबोधदानात्मक भेदमय बन्धक्षपणलक्षण वाला
संस्कारविशेष दीक्षा है— 'दीक्षा स्वरूपसंबोधदानात्मको भेदमयबन्धक्षपणलक्षणसंस्कार-
विशेषः' ।
शिवसद्भावदायिनी = स्वस्वभावात्मक शिव (परमात्मा) का जो सद्भाव (सत्ता)
३०० स्पन्दकारिका
है वही है शिवसद्भाव। इसके द्वारा 'अहमेवास्मि' (मैं ही हूँ)—इस अबाधित प्रतिपत्ति
का अनुभव सिद्धावस्था में हुआ करता है। इस अनुभव को प्रदान करने वाली—'शिव
सद्भावदायिनी'।
यह एक निरुत्तर संस्कार है और यह सुप्रबुद्ध गुरुओं को ही अनुभूत होता है अन्य
को नहीं। यह क्या है? यह है परमशिवात्मकस्वरूप की प्राप्ति। यह कोई बाह्य साधनों
से साध्य विधिविशेषात्मक विधि नहीं है।
'दीक्षा के समय गुरु शिष्य की आत्मा को ग्रहण करें' 'आत्मनो ग्रहणं कुर्याद्दीक्षा-
काले गुरुर्धिया'—ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। अतः सुस्पष्ट है कि दीक्षावसर पर गुरु
शिष्य की आत्मा का ग्रहण करते हैं।
भट्टकल्लट की व्याख्या का सारांश—'इयमेव .... ग्रहः ॥
(१) यही वह मिथ्याज्ञानशून्य साधक की निरावरणस्वस्वरूप संवित्त। यह किसी
भौतिक पदार्थ (धातुसार से निर्मित स्थूल वस्तु) का रसास्वाद नहीं है और न तो इसकी
प्राप्ति अमृतत्व प्राप्ति ही है।
'पारद' रस कहलाता है। 'रस' से निर्मित औषधियाँ चिरञ्जीवत्व प्रदान करती हैं
और शक्तिदायिनी होती हैं किन्तु उन्हें तथा सामुद्र पीयूष को अमृत नहीं कहा गया है।
'आत्मग्रह' आत्मा की अनुभूति है। यह तब होती है जब मन्त्र के उच्चारण से
मन्त्रस्वरूप में अवस्थिति होती है—अर्थात् मन्त्र-देवता के साथ स्वरूपसाक्षात्कार की
स्थिति प्राप्त होती है। अन्तर्विमर्श की स्थिति में शिष्य को प्रदत्त मन्त्र की देवता के
स्वरूप में अवस्थान ही 'आत्मग्रह' है।
(२) आकारशून्य आत्मा को मिट्टी के ढोंके या किसी अन्य स्थूल पदार्थ की भाँति
हाथ से पकड़ा नहीं जाता। इस कारण यह आत्मानुभूति ही 'निर्वाण दीक्षा' होती है।
यह साधक के भीतर अनुत्तर शिवभाव को अभिव्यक्त कर देती है।
इच्छतः = इच्छया ॥ भट्टकल्लट ने 'इच्छतः' का अर्थ इच्छा ही किया है।
प्रश्न है कैसी इच्छा?
(१) 'परा' गता इच्छा = सूक्ष्मतम आत्मस्पर्श = आन्तरिक विमर्श से संबद्ध
अव्यक्त ध्वनि ॥
(२) पश्यन्ती गता इच्छा = सूक्ष्मतर आत्मस्पर्श = अव्यक्त ॥
(३) मध्यमा गता इच्छा = सूक्ष्म आत्मस्पर्श = अव्यक्त ध्वनिरूपा ॥
(४) वैखरी गता इच्छा = स्थूल आत्मस्पर्श = व्यक्त ध्वनिरूपा ॥
स्थूल शब्दोच्चारण की स्थितियाँ—(१) आन्तर्विमर्शात्मिका, अव्यक्त नाद से
सम्बद्ध ॥ अन्तर्मुख। (२) अव्यक्तानुगामिनी व्यक्तध्वनिमयी, वैखरीमयी ॥ बहिर्मुख
इच्छतः पद में (मन्त्रोच्चारण के संदर्भ में) विमर्शात्मिका अव्यक्त इच्छा ॥
('शाक्तोपाय' वाले साधकों के सभी कार्य विमर्शात्मक होते हैं।)
द्वितीयः निष्यन्दः ३०१
वैखरीवाक् आणव उपाय से सम्बद्ध है। इस स्तर पर मन्त्र साधकों का (निम्न-
स्तरीय साधकों का) मन्त्रोच्चारण वैखरीवाक् के स्तर पर स्थूल वर्णों द्वारा स्थूल पद्धति से
किया जाता है और उच्चारित ध्वनि एवं मन्त्र व्यक्त होते हैं न कि अव्यक्त ॥
मन्त्रों का विमर्शात्मक उच्चारण इतना शक्तिसम्पन्न होता है कि साधक का
चित्त एवं परप्रकाशात्मक 'बिन्दु' ('यथा शरो धनुः संस्थो यत्नेनाताड्य धावति ।
तथा बिन्दुर्वरारोहे उच्चारेणैव धावति ।) की तीव्रता धनुष से चलाए गए शर की भाँति
होती है।
भट्टकल्लट ने जिस 'संवेदन' का उल्लेख किया है उसका स्वरूप क्या है? यहाँ
उस 'संवेदन' का उल्लेख किया गया है जिसमें कि विकल्पों को संस्कारित करने से योगी
की एकाग्रता इतनी तीव्र हो जाती है कि वह इन्द्रियों के द्वारों से बाह्योन्मुख होती हुई
संवित् तत्त्व के प्रवाह को अलंग्रास द्वारा हृदय के अन्तरतम् में संकेन्द्रित कर लिया जाता
है। इस अवस्था में मन्त्र-विमर्श के बाद तत्काल ही मन्त्रदेवता के साथ चित्त का
तादात्म्य (एकीभाव) हो जाता है। इस साक्षात्कार को संवेदनात्मक इसलिए कहा जाता
है क्योंकि देवता अपने यथार्थ स्वस्वरूप से पृथक् कोई शारीरिक सत्ता नहीं है। यह
भूमिका शाक्तोपाय के उस उच्च स्तर पर स्थित है जिसमें परमेश्वर का तीव्र शक्तिपात
होता है। ऐसे सिद्ध योगियों का आध्यात्मिक स्तर इस प्रकार का होता है—
(१) अस्मिंश्च यागे विश्रान्तिं कुर्वतां भवाडम्बरः ।
हिमानीव महाग्रीष्मे स्वयमेव विलीयते ॥
(२) केतकी कुसुम सौरभे भृशं भृंग एवं रसिको न मक्षिका ।
भैरवीय परमाद्वयार्चने कोऽपि रज्यति महेशचोदितः ॥
अर्थात् यथा ग्रीष्मर्तु में हिमसन्तति स्वयं गल जाती है उसी प्रकार योगी के लिए
संसार एक व्यर्थाडम्बर है। केतकी सुमन के परिमल का प्रेमी भौंरा ही होता है न कि
मक्षिका। इसी प्रकार भैरवीय अभेद भूमिका के प्रति किसी विरले योगी की ही उत्कण्ठा
होती है न कि सामान्य व्यक्ति की ॥ 'निर्वाण दीक्षा' में 'दीक्षा' का क्या अर्थ है?
'कुलार्णवतन्त्र' में कहा गया है—
दीयते ज्ञानसद्भावः क्षीयन्ते कर्म वासनाः ।
दानक्षपणसंयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता ॥ (तं० वि०: क्षेमराज)
'दीक्षा' के अनेक प्रकार हैं यथा (१) 'हौत्री' (२) 'वैधी' (३) 'कलावती' (४)
'स्पार्शी' आदि ।
मन्त्र के देवता और चित्त का सम्बन्ध—ध्येय देवता का ध्याता साधक के चित्त
में 'उदय'—देव साक्षात्कार ध्याता योगी के चित्त में ध्येय (ध्यानालम्बन देवता) का
प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना इसे ही कहते हैं कि उसके चित्त में इच्छा (देव-साक्षात्कार की
इच्छा) होते ही (साधक की) देवता के साथ उसका तादात्म्य प्राप्त हो जाय ॥
भट्टकल्लट कहते हैं—संवेदन के माध्यम से जो उस ध्येय (मन्त्रस्वरूप या मन्त्र-
३०२ स्पन्दकारिका
ध्येय परमात्मा) का आत्म रूप से ग्रहण हो जाता है—तादात्म्य प्राप्त हो जाता है उसी
को साधक के चित्त में उस देवता का उदय (देव साक्षात्कार) कहा जाता है।
तादात्म्यप्राप्ति या भगवत्प्राप्ति—'तादात्म्य' शब्द का अर्थ है—उसके स्वभावत्व
की प्राप्ति अर्थात् साधक द्वारा अपने लक्ष्यभूत इष्टदेवता के स्वभाव का अधिगम ॥
मन्त्रयोगी मन्त्रोच्चारण करने की इच्छा मात्र से मन्त्र के देवता के साथ तादात्म्य प्राप्त
कर लेता है—
'तत्संवदेनद्वारेण यः तदात्मग्रहो मन्त्रन्यासात्मकः स एवोदयः तस्य ध्येयेस्य मन्त्रा-
त्मनः साधकचेतसि, तादात्म्यं तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य मन्त्रोच्चा-
रणरूपेच्छया संपादिता: ॥'१
अमृतप्राप्ति—साधक के द्वारा देवता के स्वभाव की प्राप्ति ही—'अमृतप्राप्ति'
है। इसे ही आत्मा का ग्रहण ('आत्मग्रह') भी कहते हैं यही 'निर्वाणदीक्षा' है। यही
साधक को शिवभाव प्राप्त करा देती है।
भट्टकल्लट का कथन है कि निर्मल स्वात्मसंवेदन ही अमृतत्व (अक्षय शिवभाव)
प्राप्त कराना है। धातुओं के संमिश्रण (यथा स्वर्णभस्म, ताम्र भस्म, रजत भस्म) से
संरचित, शारीर धातुओं के पुष्टिवर्धक एवं स्वादिष्ट रस का आस्वाद ग्रहण ही अमृतत्व
की प्राप्ति नहीं है। आध्यात्मिक साधना के पंथ में आत्मग्रह (आत्मानुभूति) उस स्थिति
की संज्ञा है जिसमें मन्त्र का उच्चारण करने से ही मन्त्रस्वरूप में अवस्थान—मन्त्र के
देवता के साथ तद्रूपता स्वरूप-तादात्म्य प्राप्त होती है। इसीलिए यह कहा गया है
कि—'दीक्षावसर पर गुरु आत्मा का ग्रहण करें ।
निराकार आत्मा को मिट्टी के ढेले या किसी स्थूल पदार्थ की भाँति नहीं पकड़ा
जा सकता अतः यह आत्मानुभव निर्वाणदीक्षा ही है जो अनुत्तर शिवभाव अभिव्यक्त
करता है।
भट्टकल्लट अपने शब्दों में कहते हैं—'इयमेव सा मिथ्याज्ञानशून्यस्य साधकस्य
निरावरणस्वरूपसंवित्तिः अमृतत्वप्राप्तिः न तु रसास्वादरूपस्य धातुसारस्य स्थूलस्या-
स्वादनम् अमृतप्राप्तिरुक्ता, यैव मन्त्रोच्चारणमात्रेणैव मन्त्रस्वरूपावस्थिति प्राप्तिः सैवा-
त्मनो ग्रहणमित्युक्ता । यस्मात् 'आत्मनो ग्रहणं कुर्याद्दीक्षाकाले गुरुर्धिया' इति ॥ न
पुनर्लोष्टादिवत् हस्तेन्तस्यामूर्तस्य ग्रहणं भवति, अत एव चेयमेव सा निर्वाणदीक्षा
शिवसद्भावदायिनी, परमशिवस्वरूपाभिव्यंजिका ॥'२
१-२. स्पन्दसर्वस्व।
[६] तृतीयो निष्यन्दः
विभूतिस्पन्दनिष्यन्दः
विभूतियाँ और स्पन्द— भट्टकल्लट की 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में अन्तिम निष्यन्द
'विभूति स्पन्द' के नाम से है । दो निष्यन्दों (रामकण्ठाचार्य की 'विवृति' में अनेक
निष्यन्दों) में सामान्य स्पन्द तत्त्व के स्वरूप का और उसमें समाविष्ट सुप्रबुद्ध प्रमातृभाव
में अवस्थित होने की प्रक्रिया का विवेचन किया गया है । 'विभूतिस्पन्द' में शाक्त भूमिका
की अनुभूति प्राप्त करने पर योगी में अनेक सिद्धियाँ आविर्भूत हो जाती हैं । ये
'मितसिद्धियाँ, एवं 'अमितसिद्धियाँ' कहलाती हैं ।
'अमितसिद्धियाँ' उत्कृष्ट योगियों में होती हैं और सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व,
सर्वव्यापकत्व, अमित तुष्टि आदि के स्वरूप वाली हैं । तीव्र आत्म शक्ति से सांसारिक
आसक्तियों का त्याग करके योगी 'चक्रेश्वर' पद प्राप्त करता है—
'यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोदयौ ।
नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥ (स्पन्द का० ५१)
'नो निश्चयः पशुजनस्य जडोऽस्मि कर्म संपाशितोऽस्मि मलिनोस्मि परेरितोऽस्मि ।
इत्येतदन्यदृढनिश्चयलाभसिद्ध्या सद्यः पतिर्भवति विश्ववपुश्चिदात्मा ॥
'विभूतिस्पन्द' में सर्वप्रथम दिदृक्षानुरूप, यथेच्छित—(तं०सा०अ० ४) पदार्थों के
साक्षात्कार हेतु 'सोमसूर्योदय' के विधान तथा 'स्वप्न स्वातन्त्र्य' का उल्लेख किया गया
है । तदुपरान्त स्वरूपाश्रयस्वरूप स्वबलाश्रय प्राप्त करके त्रिकाल-दर्शित्व की सिद्धि का
विवेचन किया गया है । बुभुक्षा-निवृत्ति सार्वत्रिक सर्वज्ञता, 'बिन्दु' 'नाद' 'रूप' एवं
'रस' की सिद्धि, दिदृक्षामात्र से समस्त पदार्थों का साक्षात्कार, कला-समूहों के द्वारा
अप्रभावित (अपीड़ित) रहने, क्रियात्मिका शक्ति को शिवमार्ग पर आरूढ़ करने से अनेक
सिद्धियों की प्राप्ति—'ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका' (४८) का वर्णन तो किया ही गया है साथ
ही इसमें—अज्ञानोत्पन्न 'ग्लानि' के द्वारा धातु, बल आदि के क्षय, पशुत्व की प्राप्ति,
परामृतरस से वंचित होने, अस्वतन्त्रता की प्राप्ति, आत्मस्वरूप पर आवरण, बन्धन
('सेयं क्रियात्मिकाशक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी बन्धयित्री स्वमार्गस्था') पुर्यष्टक के पाश
द्वारा बन्धकत्व आदि का भी विवेचन किया गया है ।
पातञ्जल योगसूत्र का अध्यायीकरण—(१) 'समाधिपाद' (२) 'साधनपाद' एवं
'विभूतिपाद' के नाम से किया गया है । किन्तु इसमें (योगसूत्र) में अन्तिम 'पाद'
'कैवल्यपाद' हैं जब कि स्पन्दकारिका में अन्तिम 'निष्यन्द' विभूति निष्यन्द' है ।
योगशास्त्र में 'कैवल्य' को विभूतियों से उच्चतर मानकर इसको अन्त में रखा
३०४ स्पन्दकारिका
गया है और विभूतियों के समानार्थक नहीं माना गया है । 'स्पन्दशास्त्र' में मितसिद्धियों
को तो हेय माना गया है किन्तु अमित सिद्धियों को हेय न मानकर (कैवल्य के समतुल्य
मानकर) 'विभूति' एवं 'कैवल्य' दोनों अध्यायों को अंतिम अध्याय के रूप में एकीकृत
करके रक्खा गया है ।
विभूतियाँ और योगसूत्र—योगसूत्र के विभूतिपाद में—'प्रज्ञालोक' (सूत्र ५),
अतीतानागत ज्ञान (सूत्र १६), संपूर्ण प्राणियों की वाणी का ज्ञान (सूत्र १७), पूर्वजन्मों
का ज्ञान (सूत्र १८), परचित्त का ज्ञान (सूत्र १९), अन्तर्धान (सूत्र २१), मृत्यु का पूर्व
ज्ञान (सूत्र २२), दूरदेश स्थित पदार्थों का ज्ञान (सूत्र २५), समस्त लोकों का ज्ञान (सूत्र
२६), समस्त ताराव्यूह का ज्ञान (सूत्र २७), ताराओं की गति का ज्ञान (सूत्र २८), शरीर
व्यूह का ज्ञान (सूत्र २९), क्षुत्पिपासानिवृत्ति की क्षमता (सूत्र ३०), स्थैर्य (सूत्र ३१),
सिद्धों के दर्शन (सूत्र ३२), समस्त बातों का (प्रातिभबल से), ज्ञान (सूत्र ३३), चित्त के
स्वरूप का ज्ञान (सूत्र ३४), पुरुष का ज्ञान (सूत्र ३५), श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद
की अनुभूति (सूत्र ३६), परचित्त का ज्ञान एवं परशरीरावेश (सूत्र ३८), ऊर्ध्वगति (सूत्र
३९), शरीर की दिव्यता (सूत्र ४०), दिव्य श्रवण (सूत्र ४१), आकाशगमन (सूत्र ४२),
महाविदेहावस्था (सूत्र ४३), पञ्चभूतों पर विजय (सूत्र ४४), अणिमादिक अष्टसिद्धियों की
प्राप्ति (सूत्र ४५), शरीर सम्पदाओं की प्राप्ति (सूत्र ४६), मन सहित इन्द्रियों पर विजय
(सूत्र ४७), शरीर के बिना भी विषयानुभव एवं प्रधान (प्रकृति) पर विजय (सूत्र ४८),
सर्वभावाधिष्ठातृत्व एवं सर्वज्ञातृत्व (सूत्र ४९), सिद्धियों में भी वैराग्य होने पर
(दोषबीजक्षय द्वारा), कैवल्य विवेक ज्ञान (सूत्र ५२), विवेकज ज्ञान (सूत्र ५४), बुद्धि-
पुरुष दोनों की समशुद्धि से 'कैवल्य' (सूत्र ५५) आदि सिद्धियों का सविस्तार विवेचन
किया गया है किन्तु स्पन्दशास्त्र में विभूतियों का अत्यल्प विवेचन किया गया है।
योगियों की यथाकांक्षित अभीष्टों की तत्काल सिद्धि—
यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रत्यर्थान् हृदि स्थितान् ।
सोम-सूर्योदयं कृत्वा सम्पादयति देहिनः ॥ ३३ ॥
तथा स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थान् प्रणयस्यानतिक्रमात् ।
नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितवद् यं प्रकाशयेत् ॥ ३४ ॥
जिस प्रकार आत्मस्वभाव स्रष्टा (धाता) योगियों के द्वारा दिदृक्षा रूपा अभ्यर्थना
किये जाने पर उनके सोम-सूर्य (दोनों नेत्रों) में तीव्र अवधानात्मक शक्ति को उदित करके
उनके हृदय में स्थित अभीष्ट पदार्थों को जाग्रत अवस्था में ही प्रकाशित (उदित) कर देता
है उसी प्रकार वह (योगियों की) सुषुम्णा नाड़ी में सतत स्थित रहने के कारण (योगियों
के) प्रणय का अतिक्रमण न करने के कारण (योगियों को उनके) स्वप्न में भी उनके
अभ्यर्थित पदार्थों का अतद्वय साक्षात्कार कराता है ॥ ३३-३४ ॥
- सरोजिनी *
स्थितान् = अभिमत अर्थों को । सम्पादयति = प्रकट करता है । प्रकाशयति
इच्छया = दिदृक्षात्मक रूप से । अभ्यर्थित = याचित ।
तृतीयः निष्यन्दः ३०५
जाग्रति = जाग्रदवस्था में। धाता = स्रष्टाऽऽत्मस्वभाव (उत्पल)।
धाता = जो संपूर्ण विश्व को अपने भीतर धारण करता है। जो शङ्कर से अभिन्न
अपने यथार्थ स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। यथेच्छाभ्यर्थितो = 'अन्तर्मुख-
स्वरूपविमर्शबलेन प्रसादितो' 'धाता' = शङ्करात्मा स्वभाव। (धत्ते सर्वात्मानं इति धाता)।
जाग्रतः = जागरावस्था ॥ अतिक्रम = उपेक्षा करना (To overlook) ।
देहिनः = प्राणी (अभिव्यक्तस्वातन्त्र्य देहिनः देहभूमिकायां एव प्रकटीभूतः) ।
जाग्रत = परतत्त्व में जागरुक।
सोमसूर्ययोः = चन्द्रमा एवं सूर्य दोनों के (ज्ञान-क्रिया नामक दोनों शक्तियों
के) ॥ सोमसूर्य = प्राणापान ।
हृदि = चित्त में । प्रणय = प्रार्थना ।
अर्थान् = प्रयोजनों को । मध्ये = सौषुम्न धाम में ।१
सम्पादयति = निष्पादित करता है। योगी के शरीर में अनुप्रविष्ट होकर परमात्मा
संपादित करता है।
ज्ञान की शक्ति के द्वारा भास्यमान होकर ही कोई क्रिया क्रियाशक्ति द्वारा उन्मीलित
हुआ करती है।२ सोमसूर्ययोः = 'अपान-प्राणयोश्चक्षुषोश्चोदयं कृत्वा चक्षुरादिषु अव-
धानेन (उत्पल)।
आत्मस्वभावरूप स्रष्टा स्वबल के आश्रय से जागृतावस्था में अपनी इच्छा से ही
प्रेरित होकर हृदयस्थित अभिमत अर्थों को सोम-सूर्य (प्राणापान) को उदित करके
सम्पादित करता है। कोई पदार्थ इच्छानुगामी होकर सृष्टि में अस्तित्व में आता है स्वतन्त्र
रूप से नहीं। पदार्थ इच्छा का उल्लंघन नहीं कर सकता ।३
जिस प्रकार धाता उत्कण्ठा पूर्वक प्रार्थित होने पर जाग्रत एवं शरीरधारी प्राणियों
को हृदय में पदार्थों को, सूर्य एवं चन्द्रमा को प्रकट कराकर प्रदान करता है उसी प्रकार
वह स्वप्नावस्था (Dreaming state) में भी इच्छित पदार्थों को व्यक्त करता है।
परमेश्वर योगी की नित्य, अक्षय एवं प्रार्थनापूर्ण प्रवृत्ति के कारण उसके समक्ष उसके
केन्द्रीय पथ (सुषुम्ना) में प्रकट होकर उसकी समस्त अभिलाषायें पूर्ण करता है ।
‘विज्ञानभैरव’ में भी कहा गया है।
अनागतायां निद्रायां विनष्टे बाह्यगोचरे ।
सावस्था मनसा गम्या परादेवी प्रकाशयेत् ॥ (७५)
पीनां च दुर्बलां शक्तिं ध्यात्वा द्वादशगोचरे ।
प्रावेश्य हृदये ध्यायन् स्वप्नस्वातन्त्र्यमाप्नुयात् ॥ (५५)४
धाता अनाच्छादित रूप में सौषुम्नधाम में स्थित होकर स्वप्न में भी अभीष्ट
आणव-शाक्त-शांभव समावेशो को एवं अन्य समावेशाभ्यास से रसोन्मृष्ट दर्पण के
१-४. स्पन्दनिर्णय ।
स्पं० २०
३०६ स्पन्दकारिका
जिज्ञासित पदार्थों को अवश्य प्रकट करता है । ऐसे योगियों को स्वप्न एवं सुषुप्ति में भी
व्यामोह नहीं होता ॥ १
'यथेच्छाभ्यर्थितो धाता जाग्रतो जाग्रतोऽर्थान् हृदि स्थितान्' — नित्यात्मक स्वस्वभाव
के अन्तरावलोकन (Introspection) के माध्यम से उत्कण्ठापूर्वक प्रार्थित किये जाने
पर जाग्रत योगी के द्वारा या उसे जिसके प्रति उसकी अपनी यथार्थ स्वतन्त्रता ने
जाग्रतावस्था में अपने को व्यक्त किया हो, जो शरीरधारी हो, या जिसके प्रति सूक्ष्म जगत्
के ज्ञान ने सशरीरी अवस्था में भी अपने को अभिव्यक्त कर दिया हो, 'वह' हृदय में
मूलबद्ध पदार्थों को प्रदान करता है या प्रकाश, ध्वनि आदि के ज्ञान के रूप में प्रार्थित
पदार्थों को प्रदान करता है तथा बुद्धि उन्मेष प्रदान करता है तथा ज्ञान के सामान्य विघ्नों
से परिचय कराता है । २
'सोमसूर्योदयं कृत्वा संपादयति देहिन:' — सोम-सूर्य अर्थात् ज्ञान एवं क्रिया शक्ति
(Cognitive and operative energies) को प्रकट करके ।
ज्ञानशक्ति के द्वारा जिसे प्रकट किया जाता है उसे क्रियाशक्ति विकसित करती
है—'ज्ञानशक्त्या भास्यमानं हि क्रियाशक्त्या उन्मील्यते' । ३
परमेश्वर योगी के शरीर में अनुप्रविष्ट होने के उपरान्त दक्षिण एवं वाम प्रकाशों
के क्रमिक विकास के द्वारा (ध्यान द्वारा उद्बुद्ध बुद्धि के रूप में स्थित एवं क्रमशः क्रिया
एवं ज्ञान का प्रतिनिधित्व करने वाले) ज्ञानों के विशिष्ट रूपों के अन्तःप्रवाहों को संपादित
करता है ।
'धाता' स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है या योगी के सुषुम्णा मार्ग में अनाच्छादित
(अनावृत) रूप में व्यक्त होता है । जो योगी (१) भगवत् प्रार्थनापरायण है (२) योग-
निद्रारूढ़ है (३) प्रणयपरायण है—उसके प्रगाढ़ ध्यान के उपाय से उसके सुषुम्नापथ में
धाता परमेश्वर अनाच्छादितरूप से प्रकट होता है । ४
वह योगी उस 'चितिशक्ति' (Power of consciousness) का ध्यान करता है
जो कि विश्व का मन (विश्वोद्गिरण) करने एवं विश्व को ग्रास बनाने में तत्पर है और
साथ ही जो दो सृष्टि के ध्रुवों के मध्य संघर्ष या घर्षण (विसर्गरिणि) के रूप में स्थित है
और जो कि विश्व-वमन एवं विश्व-कवलीकरण का प्रतिनिधित्व करते हैं ।
वमन एवं ग्रासीकरण में निरत विसर्गरिणि के रूप में संस्थित चिति शक्ति के
परामर्श द्वारा नित्य आराधना करने पर भगत्प्रार्थना पर योगनिद्रारूढ़ योगी के सुषुम्ना पथ
में धाता अनावृत रूप से स्थित होकर स्वप्न में भी अभीष्ट पदार्थों को, आणव-शाक्त-
शांभव समावेश से रसोन्मृष्ट दर्पण प्रदान करता है अर्थात् समस्त जिज्ञासित अर्थों को
प्रकट कर देता है । ५
धाता उस योगी के प्रति जिसका बुद्धि रूपी दर्पण (Intellectual mirror)
विशुद्ध हो चुका है, निःसंदेह निद्रावस्था (Sleeping state) में भी आणव-शांभव—
शाक्त समावेश आदि इच्छित अभीष्टार्थ प्रदान करता है ।
१-५. स्पन्दनिर्णय ।
तृतीयः निष्यन्दः ३०७
इस योगी को स्वप्न एवं सुषुप्ति किसी भी दशा में जड़ता (Insentiency :
चैतन्य-राहित्य) के वशीभूत नहीं होना पड़ता । (यहाँ 'स्वप्न' के द्वारा 'सौषुप्त' भी
उपलक्षित है ।) योगी को स्वप्न एवं सुषुप्ति में भी व्यामोह नहीं होता ।
इस उपर्युक्त प्रसंग में अभीष्टार्थ के प्रकाशन में नित्य प्रार्थनासंवलित एवं भगवतो-
न्मुखी प्रवृत्ति ही उपाय है । परमात्मा देवी आराधना (Divine propitiation) की
उपेक्षा कभी नहीं करता । परमात्मा की प्राप्ति का साधन क्या है? अन्तर्मुख स्वरूप का
परिशीलन (Devotional meditation on internal nature) अन्तःस्वभाव का
भक्तिसंवलित ध्यान ॥
'परमेश्वरो हि चिदात्मा यद्यन्तर्मुखोचितसेवाक्रमेण अर्थ्यते तत्तत्संपादयत एव ॥'
(चैतन्य का स्वामी परमात्मा वे सारे अभीष्ट प्रदान करता है जो उससे माँगे जाते हैं
किन्तु यह तभी देता है जब कि अन्तर्मुखी सेवा की जाय) ।
यदि योगी इस प्रकार एकाग्रचित्त नहीं है तो वह 'योगी' नाम धारण नहीं कर
सकता । 'यदि पुनरेवं सावधानो न भवति तदा नास्य योगिता' । अतः योगी के लिए
सावधानी अत्यावश्यक है । आचार्य उत्पलदेव इन कारिकाओं के प्रारंभ में कहते हैं—
'स्पन्दतत्त्वोदयं प्रोच्याकृत्रिमं तत् एव च ।
मन्त्रोदयं च तद्वीर्यं तद्विभूतीरथाऽऽह तु ॥'
भाव यह कि अकृत्रिम स्पन्दतत्त्व के उदय का वर्णन करके अब उसीसे मन्त्रोदय,
उसका प्रभाव और उसकी विभूतियों का वर्णन किया जा रहा है । स्पन्दतत्त्व का उदय
होने पर जाग्रतावस्था में ही निजभाव की प्राप्ति होने पर 'स्वातन्त्र्य' प्राप्त हो जाता है ।
वैसा ही स्वप्न में भी होता है । इसी दृष्टि को उपबृंहित करते हुए कारिकाककार ने
तैंतीसवीं एवं चौंतीसवीं कारिकायें कही हैं ।
ये दोनों कारिकायें 'विभूतिस्पन्द' की प्रथम एवं द्वितीय कारिकायें हैं । उत्पल-
देवाचार्य कहते हैं—जैसे आत्मस्वभाव रूप स्रष्टा जाग्रत अवस्था में अपनी इच्छा से ही
प्रेरित होकर हृदयदेश में स्थित अभिमत अर्थ का सम्पादन करता है । यह सम्पादन
स्वबल के श्राश्रय से किया जाता है । प्रश्न उठता है यह कैसे? सोम-सूर्य, अपान एवं
प्राण तथा नेत्रों को उदित करके अवधानपूर्वक इच्छित पदार्थ को ही देखता है । अभिप्राय
यह है कि मनुष्य के सामने असंख्य वस्तुएँ रहती हैं—गणिका, नट, मल्ल, दर्शक
आदि । उनमें से वह जिस वस्तु को देखना चाहता है उसी को देखता है क्योंकि उसी में
स्वरूप का अनुप्रवेश होता है । ठीक इसी प्रकार स्वप्नावस्था में भी अपने स्वभाव में
स्थित रहकर हृदय में अभीष्ट पदार्थों को ही स्पष्ट करके देखता है क्योंकि आत्मसंवित्
इच्छा का अतिक्रमण नहीं करती । प्राचीन कथन है—'दृढ़ अभीष्ट विषयक इच्छा को
छोड़कर दूसरी वृत्ति नहीं होती ।'—'मुक्त्वा दृढामभीष्टेच्छां नाऽन्यवृत्तिर्यदा भवेत् ॥'
यह कहना चाहते हैं कि इच्छानुगामी ही पदार्थ सृष्टि में होता है, स्वतन्त्र रूप से
किसी पदार्थ का उदय नहीं होता । पदार्थ इच्छा का अतिक्रमण नहीं करता ।
'रहस्यस्तोत्र' में कहा गया है कि—बुद्धि विस्मृत पदार्थ का स्मरण करके
३०८ स्पन्दकारिका
अशेषवित आत्मा के सम्मुख रख देती है । बुद्धि जो-जो रसपूर्वक अभ्यर्थना करती है,
आत्मसंवित् स्वप्न में भी उसका अतिक्रमण नहीं करती'—
'विस्मृतार्थमभियुज्यधीर्यया त्वामशेषविद्माशु शंसति ।
यद्यदित्यमनयाऽर्थ्यते रसात् स्वप्न गोऽपि विलंघयिष्यति ॥
एक सिद्ध ने भी कहा है—चिदाकाशं में स्थित होकर जो अनुसंधान करता है वह
अखण्डित ही देखता है ।।'—
'चिद्व्योम्निस्थोऽनुसन्धत्ते यत्तत्पश्यत्यखण्डितम्' ज्योतिःशास्त्र में भी कहा गया है
कि— 'येन येनेन्द्रियार्थेन विद्धः स्वपिति मानवः ।
तस्य तस्येन्द्रियार्थस्य सुप्तः कर्माणि पश्यति ॥'
अर्थात् मनुष्य जिस-जिस इन्द्रियार्थ से अनुविद्ध होकर शयन करता है । स्वप्ना-
वस्था में उन्हीं-उन्हीं पदार्थों के कर्म देखता है ।¹
यथा देहिनो = जिस प्रकार प्राणी । देही = देह मात्र को ही आत्मा के रूप में
मानने वाला (देहात्मप्रतिपन्न) संसारी प्राणी ।
जाग्रतो = यथास्वविषयग्रहण व्यग्र इन्द्रियवृत्तीलक्षण वाली जागृतावस्था में ।
हृदिस्थितान् = आशयनिविष्ट अभीष्टों को देखने हेतु ।। अभीष्ट = भाव ।। इच्छा-
भ्यर्थित् = इच्छा के द्वारा अर्थात् देखने की इच्छा के द्वारा अभ्यर्थित । उस अवस्था में
स्थित स्वबल के द्वारा, तादात्म्यसमापत्ति के द्वारा उस अभीष्ट संपत्ति की याचना ।। धाता
= सर्वकर्मकर्ता, परमेश्वर या परमात्मा ।।²
संपादयति = यथाभिप्राय प्रकाशित करता है ।
क्या करके? सोमसूर्ययोः सूर्य-चन्द्ररूपी आँखों के ।
उदयम् = अभिप्रेतार्थवधारणमात्रावधानरूपस्वरूपप्रथन ।।
कृत्वा = करके (विधाय) । तात्पर्य—जो कोई संसारी पुरुष जिस किसी भी पदार्थ
को देखने की इच्छा करता है वह उस दिदृक्षावस्था में शीघ्र ही धाता परमात्मा में अभेद
(अभिन्न रूप) के साथ (उसमें) प्रवेश करता है (आविशति) ।। उसकी यह अवस्था उसकी
प्रार्थना कही जाती है । वह उसके द्वारा अभ्यर्थित धाता उस मात्रा में अर्थप्रथन (अभीष्ट
पदार्थ को प्रदान करना) के लिए अवधानात्मक क्रिया द्वारा नेत्रों को उदित करके —
स्वरूपाभिव्यक्ति रूप उदय को संपादित करके—सन्निहित अन्य अनेक दृश्यों की दिदृक्षा
के द्वारा ही अभ्यर्थित पदार्थ को प्रदर्शित करता है अन्य अनाभीष्ट पदार्थों को नहीं ।
सोमसूर्ययोः = चन्द्रमा एवं सूर्य दोनों के । अर्थात् दोनों आँखों के । चन्द्रमा
एवं सूर्य रूपी नेत्र द्वय के ।
उसके द्वारा शुश्रूषाभ्यर्थित दोनों कानों को उदित करके श्रव्यान्तर के संनिधि में रहने
पर भी सुश्रूषित पदार्थ को ही सुनाता है (श्रावयति) ।। इस प्रकार यहाँ समस्त इन्द्रियों को
योजित करके कारिका का अर्थ स्पष्ट करना चाहिए । समस्त इन्द्रियाँ योज्य हैं ।
१. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' । २. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३०९
भगवान् के दो नेत्र सूर्य एवं चन्द्रमा के रूप में जगत्-प्रख्यात हैं। यहाँ पर
'सोमसूर्य' शब्द को आँखों के रूप में प्रयुक्त करके कारिकाकार ने जीव को विश्वरूप
परमात्मा के साथ एकीभूत दिखाकर दोनों में अभेदत्व प्रतिपादित किया है। वृत्तिकार
कहते भी हैं—'चक्षुरादिष्ववधानेन'। इसी प्रकार सभी जीवों का सर्वार्थप्रथन (अभीष्ट
वस्तुओं की सम्प्राप्ति) स्वेच्छा से निष्पादित हुआ करता है। वह संसारियों की इच्छा
परमकारण भेदरूपा है: 'सा च इच्छावस्था संसारिणः परमकारणाभेदरूपा ।।'
स्वतन्त्र परमेश्वर ही यथेष्ट रूप में समस्त पदार्थों को प्रकाशित करता है। इस
प्रकार परमात्मा की मायाशक्ति से सञ्जात देहादिव्यवच्छेद वाले (पार्थक्य, विभाग, खण्ड
या पृथकता से युक्त) संसारी प्राणी परमार्थ प्राप्त नहीं कर पाते ।।
जो साधक प्रबुद्ध हैं, उक्तोपदेशाभ्यास प्रकर्ष के कषण-पाषाण पर जिनका प्रज्ञा-
कृपाण निशितीकृत (धारदार किया हुआ, तीक्ष्ण किया हुआ) हो चुका है, जो सत्यात्म-
संवित् हैं, जो अहंकारादिक कषायों से मुक्त हैं उनके लिए प्रत्यभिज्ञा का उपदेश नहीं
दिया गया है। ऐसे सिद्ध, 'समाधियोगी' को उपदेश की क्या आवश्यकता?
तथैव = उसी प्रकार ।। नित्यं = सदैव सभी ज्ञातृ-ज्ञेय संबन्ध दशाओं में ।
प्रणयस्य = इच्छावस्था में तादात्म्य प्रतिपत्तिरूपा प्रार्थना का ।। अनतिङ्क्रमात् =
उल्लंघन न करने से । 'प्रत्यवमर्शाविहितत्वेन अनुपेक्षणात्' ।।
स्वप्नेऽपि = स्वव्यापार से उपरत चक्षु आदि इन्द्रियों के द्वारा मनोमात्रग्राह्य-
स्वसृष्टिविषय वाली स्वप्नावस्था में ।
अभीष्टान् = इच्छित पदार्थों को, साधकाभिमत पदार्थों को ।
स्फुटतरं = स्पष्टतापूर्वक । मध्ये स्थितो = हृदय में सदासीन ।
अवश्यं = अवश्यमेव । नियमों के द्वारा यह धाता—प्रकाशयति = प्रथित करता
है (प्रथयेत्) ।। प्रकाशित करता है । प्रदान करता है ।
इसका तात्पर्य निम्नांकित है—१ जो सर्वदा, समस्त अनुभवों में, धातु सर्वेश्वर
स्वस्वभावा के तल्लीनत्व लक्षण वाले प्रणय को, (स्वसामर्थ्यसिद्ध प्रार्थना को) प्रतिक्षण
प्रत्यवमर्श द्वारा अवहित होने के कारण अतिक्रमित नहीं करता (नातिक्रामति) उसके लिए
यह 'धाता' जागृतावस्था के समान स्वप्नावस्था में भी अपने अभिमत (अभीष्ट) पदार्थों
को ही प्रकाशित करता है । उसके स्वप्न पदार्थ स्वतन्त्र रूप से प्रकाशित होते हैं क्योंकि
उसकी सर्वकर्तृत्वलक्षण वाली स्वशक्ति प्रतिबन्धों को उद्भावित नहीं करती क्योंकि वह
अंससारी है । वह अपनी शक्ति द्वारा स्वातन्त्र्यपूर्वक यथेष्ट पदार्थों का सृजन करती है—
'स्वतन्त्रः स्वशक्त्या यथेष्टं तान् सृजति' भर्तृहरि ने कहा भी है—
'प्रविभाज्यात्मनात्मानं सृष्ट्वा भावान् पृथग्विधान् ।
सर्वेश्वरः सर्वशक्तिः स्वप्ने भोक्ता प्रपद्यते ।।'
अतः स्वप्नस्वातन्त्र्य की बात कही गई है । उसके लिए स्वप्न एवं जागरण दोनों
में कोई अन्तर नहीं है—'तस्य स्वप्न जागरयोर्विशेषो नास्ति ।'
१. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' ।
४. चतुर्थ निःष्यन्द: पात-निःष्यन्द (समावेश-स्थिति, शिव-एकात्मता एवं ग्रन्थ उपसंहार)
३१० स्पन्दकारिका
देहाद्यहन्ताजनित अनवच्छिन्न स्वमाहात्म्य का निरोध ही 'तम' है उसके द्वारा जो
'वरण' अर्थात् स्थगन (स्वभाव-तिरोधान) होता है उसका निर्भेद (अनन्त निज वैभवाभि-
व्यक्ति के कारण विनाश) है वही उस अवस्था में आविर्भूत होता है । इसी को वृत्ति में
कहा गया है—(१) 'यथा अस्य अनभिव्यक्तस्वस्वरूपस्य', (२) 'स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थानैव
पश्यति' ।
'अयमेवोदयस्तस्य' 'इयमेवामृतप्राप्ति' वाली कारिका में—संवित्त्व की उपलब्धि
हेतु उत्तम विधि संस्कारों को कारण के रूप में प्रतिपादित किया गया था किन्तु प्रस्तुत
श्लोक द्वय में संसारी प्राणियों के व्यवहार-निदर्शन द्वारा सिद्धयन्तर कारणत्व का
प्रतिपादन किया गया है ।१
धाता = चित् शक्ति । देहिनः = जिसका स्वस्वरूप अभिव्यक्त नहीं हो पाया है
ऐसा योगी = 'अनभिव्यक्तस्वरूप योगी' ।। अभ्यर्थित = अभ्यर्थना का विषय बना हुआ ।
याचित । अभ्यर्थना = आन्तरिक इच्छा । योगी की आन्तरिक संकल्पात्मक वृत्ति । योगी
की संकल्पात्मक इच्छा । इसे ही 'दिदृक्षारूपा अभ्यर्थना' भी कहा जाता है । सोमसूर्य =
नेत्र द्वय । 'नेत्र' अन्य इन्द्रियों का भी उपलक्षक है—प्रतीक है—वाचक है । योगी जिस
भी इन्द्रिय के विषयों का साक्षात्कार करना चाहता है तो धाता (स्पन्द, चिति शक्ति,
आत्मा) उस-उस इन्द्रिय में विशिष्ट अवधानात्मक शक्ति को उदित कर देता है ।
कारिका ३४ में भट्टकल्लट ने 'स्वप्न स्वातन्त्र्य, का उल्लेख किया है । कल्लट
कहते हैं कि—ऐसे योगी के 'मध्य' (सुषुम्णा) में निरन्तर, प्रतिक्षण 'हृदय' (चित् शक्ति)
की अनुभूति स्पष्टतर रूप में प्राप्त होती रहती है । इसी अवस्था का नाम 'स्वप्न
स्वातन्त्र्य' है क्योंकि एक सिद्ध योगी स्वप्नावस्था में अपने समस्त 'आकांक्षित पदार्थों
का साक्षात्कार कर लेता है । उसकी आकांक्षा को धाता कभी उपेक्षित नहीं कर सकता ।
सोमसूर्य तीव्रतम अवधानात्मक शक्ति का नाम है । (कल्लट)२
इस तीव्रतम अवधानात्मक शक्ति के विकास का परिणाम—नटों, मल्लों के
आकर्षक प्रदर्शनों के सामने रहने पर भी आकांक्षित पदार्थों के स्वरूप में ही आवेश तथा
आकर्षक से आकर्षक दृश्यों, स्थानों, पदार्थों से अप्रभावित रहने की शक्ति का
आयत्तीकरण ।। अर्थात् तीव्र एकाग्रता ।
स्वप्न स्वातन्त्र्य का अधिकारी = मध्यनाड़ी में प्राणापान का लय किए हुए सिद्ध
योगी । भट्टकल्लट कहते हैं—
'यथास्थानाभिव्यक्तस्वरूपस्य योगिनो जाग्रदवस्थायां यथा-यथा इच्छा भवति, तथैव
तस्यानेकार्थ संनिधानेऽभिमतस्यैव कस्यचिदर्थस्य दर्शनं भवति नटमल्लप्रेक्षादिषु सोम-
सूर्योदयं कृत्वा चक्षुरादिष्ववधानेन ।। ३३ ।।'—(भट्टकल्लट)३
१. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' ।
२. भट्टकल्लट—'सोमसूर्य' = ज्ञानेन्द्रियों में आकांक्षित पदार्थों के प्रति तीव्रतम
अवधानात्मक शक्ति उदय = विकास । प्रकटीकरण ।
३. 'स्पन्दसर्वस्व' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३११
उस योगी को जिसके स्वस्वरूप की पूर्णाभिव्यक्ति नहीं हो पाई हो उसको अपनी
जाग्रत अवस्था में (अपने समक्ष अनेक पदार्थों के विद्यमान रहने पर भी) अपनी इच्छा के
अनुसार अपना अभिलषित विशिष्ट पदार्थ ही दृष्टिगत होता है अन्य (अपने समक्ष स्थित
अन्य) पदार्थ नहीं। इसका कारण क्या है? कारण यह है कि ऐसे अवसरों पर धाता
(चिदात्मा) उस योगी में सोम-सूर्य को उदित कर देता है अर्थात् उसकी ज्ञानेन्द्रियों में
आकांक्षित ग्राह्य विषय के प्रति तीव्र एकाग्रता की शक्ति आविर्भूत कर देता है यथा नटों
आदि के चमत्कारपूर्ण 'कार्यों में दिखाई पड़ती है ऐसी अद्भुत एकाग्रता (वृत्ति-
निरोधात्मक एकाग्रदृष्टि) आविर्भूत हो जाती है।
भाव यह है कि - जिस प्रकार प्रेक्षक अपने समक्ष स्थित अनेक वस्तुओं के
विद्यमान रहने पर भी नटों के चमत्कार-प्रदर्शन-स्थल पर केवल चमत्कारों को ही देखता
अन्य को नहीं।
उसी प्रकार एक योगी नटों की भाँति चमत्कार प्रदर्शन करने वाली प्रकृति के द्वारा
योगी के समक्ष अनेक आकर्षक, चमत्कार पूर्ण एवं मोहक पदार्थों को प्रस्तुत करने के
बाद भी एक योगी सभी का त्याग करके केवल स्वाभीष्ट पदार्थों का ही प्रेक्षण, चुनाव
एवं साक्षात्कार करता है।
'तथा स्वप्नेऽपि अभीष्टार्थानैव पश्यति, प्रणस्यानतिक्रामात् इच्छाभ्यर्थनाया अनति-
क्रमात् । यच्च तन्मध्ये हृदयं स्फुटतरम् अभिव्यक्तं नित्यं तदेतत् 'स्वप्नस्वातन्त्र्यम्'
इत्युच्यते, अयमेव तमोवरणनिर्भेद इत्यर्थः' ।। ३४ ।। (भट्टकल्लट) १
प्रत्येक योगी अपनी स्वप्नावस्था में भी स्वाकांक्षित वस्तुओं को ही साक्षात्कृत
करता है। चिदात्मा उसके 'प्रणय' (आभ्यन्तर आकांक्षास्वरूप अभ्यर्थना) को कभी नहीं
टालती - इसीलिए ऐसा होता है। ऐसे योगी के सुषुम्णा वर्त्म में चिदात्मा, की स्फुटतर
अनुभूति प्रतिक्षण विद्यमान रहती है। इसे ही 'स्वप्न स्वातन्त्र्य' की संज्ञा दी गई है।
प्रणय = आभ्यन्तर उत्कट आकांक्षा ।। स्फुटतरं = सुस्पष्टतर । मध्ये =
मध्यमार्ग (सुषुम्ना मार्ग) में । स्फुटतरं = और अधिक स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त है। यह
'स्वप्न स्वातन्त्र्य' कहलाता है । अन्य शब्दों में इसे 'तमोवरणनिर्भेद' कहते हैं-इस
समय योगी के मानस पर तमावरण नहीं रहता।
भट्टकल्लट ने इन तीन कारिकाओं में योगियों की श्रेणीत्रय की ओर भी संकेत
किया है - का० (३३) में - जाग्रतो देहिनः का० (३४) में 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये
स्थितो? का० (३५) में - अन्यथा शब्दों का प्रयोग करके संभवतः 'असिद्ध' 'सिद्ध' एवं
'अनावधात' (प्रमादी) तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है। इन तीन कारिकाओं में इन
योगियों की पृथक् पृथक् संकल्प शक्ति का भी प्रस्तुतीकरण किया गया है। देहिनः का
अर्थ है - 'अनभिव्यक्तस्वरूप योगी' (कल्लट) है। (ये 'अपरिपक्व' 'असिद्ध' योगी हैं।
'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितः' की व्याख्या- 'यच्च तन्मध्ये हृदयं 'स्फुटतरम् अभिव्यक्त
१. 'स्पन्दसर्वस्व'।
३१२ स्पन्दकारिका
नित्यम्' (कल्लट) है । निष्कर्ष—सुषुम्णा में 'हृदय' (स्वरूपभूत स्पन्द) की अनुभूति
सुस्पष्ट होती है । १
'देहिन' का अर्थ देहाभिमानी सांसारिक प्राणी नहीं है क्योंकि भट्टकल्लट ने
अपनी 'वृत्ति' में कहा है कि वे 'योगी' हैं किन्तु वे योगी हैं जो सांसारिक प्रपंच (मायिक
बन्धनों) में मग्न होकर बन्धनग्रस्त हो गए हैं किन्तु वे साधनारत भी हैं किन्तु उनका
स्वस्वरूप अभिव्यक्त नहीं हो पाया है—'अनभिव्यक्तस्वस्वरूपस्य, योगिनो' जिस प्रकार
आत्मस्वभावरूप स्रष्टा जाग्रत अवस्था में अपनी इच्छा से प्रेरित होकर हृद्देशस्थ अभिमत
को स्वबल के आश्रय से सोम सूर्य (प्राणापान) एवं नेत्रों को उदित करके अवधानपूर्वक
सम्पादित करता है उसी प्रकार स्वप्नावस्था में भी अपने स्वभाव में स्थित रहकर हृदय में
अभीष्ट पदार्थों को ही देखता है क्योंकि आत्म संवित् इच्छा का अतिक्रम नहीं करता ।
मनुष्य के सामने असंख्य वस्तुओं के वर्तमान रहने पर भी मनुष्य जिसे देखना चाहता है
उसी को देखता है क्योंकि उसी में स्वरूपानुप्रवेश हुआ करता है । पदार्थ कभी भी
इच्छा का अतिक्रमण नहीं कर सकता । 'बुद्धि जो जो रसपूर्वक (सतृष्ण होकर) अभ्यर्थना
करती है आत्म उसे उसके समक्ष प्रस्तुत कर देती है । मानव जिस-जिस इन्द्रियार्थ
से अनुविद्ध होकर शयन करता है स्वप्नावस्था में उन्हीं उन्हीं पदार्थों को देखता है ।
स्पन्दतत्त्व का उदय होने पर जाग्रत अवस्था में ही निजभाव की प्राप्ति होने पर
प्रमाता स्वतन्त्र हो जाता है ।
धाता = चित शक्ति ॥ हृदिस्थितान् = मन में कल्पित, इच्छित् । यथाभिलषित
पदार्थ, यथा अनभिव्यक्तस्वस्वरूप वाले योगी को जाग्रदवस्था में जो-जो इच्छायें होती हैं
(सामने सैकड़ों अन्य वस्तुओं के विद्यमान रहने पर भी) अपनी अभीष्ट वस्तु को ही देखता
है अन्य को नहीं उसी प्रकार इस प्रसंग में भी समझना चाहिए ॥—(भट्टकल्लट) ।
जिस प्रकार 'धाता' (चिदात्मा = चित् शक्ति) इच्छात्मक अभ्यर्थना किये जाने पर
सामान्य व्यक्तियों को भी उनकी आँखों के सामने उन पदार्थों का दर्शन करवाता है जिन्हें
कि उन्हें हृदय में देखने की इच्छा होती है । उसी प्रकार योगियों को भी स्वप्नावस्था में
उन अभीष्ट पदार्थों का साक्षात्कार करवाता है । वह धाता (चिदात्मा) ऐसे योगियों के
मध्यधाम (सुषुम्ना मार्ग) में प्रतिक्षण स्फुटतर स्थिति में विद्यमान रहता है और उनके
प्रणय का कभी भी अतिक्रमण नहीं करता ।
इसके विरुद्ध—यदि योगी, स्वरूप-साक्षात्कार अधिगत कर चुकने पर भी उस
भाव पर निश्चलतापूर्वक अवस्थित नहीं रह पाता तो उसके लिए जाग्रत-स्वप्न दोनों
अवस्थाओं में भावों की सर्जना उसी प्रकार स्वतन्त्रतापूर्वक चलती रहती है जिस प्रकार
सामान्य प्राणियों की चलती रहती है ।
भावों की पूर्णस्वातन्त्र्यपूर्वक उत्तरोत्तर सृष्टि करते रहना स्पन्द शक्ति का अकाट्य
स्वभाव है ।
१. ऐसा योगी जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में शाक्त स्पन्दना की
अनुभूति करता रहता है तथा सृष्टि, संहार आदि के अधिकार प्राप्त करता है ।
तृतीयः निष्यन्दः ३१३
भट्टकल्लट की व्याख्या—यथा = जिस प्रकार की । इच्छा = अभिलाषा होती
है । सोमसूर्योदय = आँख । यदि किसी भी व्यक्ति को आँख एवं अन्य ज्ञानेन्द्रिय के
ग्राह्य विषयों में से किसी भी आकांक्षित विषय का साक्षात्कार करने की इच्छा होती है तो
उसकी उसी ज्ञानेन्द्रिय में उसके अनुकूल ग्रहण शक्ति का आविर्भाव होता है । 'सोमसूर्य'
= (भट्टकल्लट) = आँख । आँख सभी ज्ञानेन्द्रियों का उपलक्षण है अतः यहाँ सभी के
ज्ञानेन्द्रियाँ के प्रतीक के रूप में उल्लिखित हैं ।
स्पष्टीकरण—'सोमसूर्योदयं कृत्वा' 'मध्ये' 'यथेच्छाभ्यार्थितो' आदि शब्दों की
व्याख्या आवश्यक है । 'सोमसूर्योदयं कृत्वा' = (१) भट्टकल्लट 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में
इसकी व्याख्या 'सोमसूर्योदयं कृत्वा चक्षुरादिष्ववधानेन' के रूप में करते हैं । सोमसूर्य =
दोनों नेत्र ॥
(२) भट्टकल्लट ने नेत्रेन्द्रिय (सोमसूर्य) को अन्य ज्ञानेन्द्रियों (श्रवणेन्द्रिय,
त्वगेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय) का उपलक्षण (बोधक) मानकर यह सूचित करने का
प्रयास किया है कि धाता (चित् शक्ति, आत्मा) योगियों के हृदय में इच्छा के रूप में
स्थित (अर्थात् अव्यक्त इच्छा के रूप में आकांक्षित) पदार्थों को उनकी आकांक्षाओं से
सम्बंधित समस्त ज्ञानेन्द्रियों में तदनुकूल अवधानात्मक शक्ति का उदय करके (योगियों)
की आकांक्षाओं की पूर्ति कर देता है यथा—
(१) सुश्रूषा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित शब्द को सुनने हेतु
श्रवणेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति ।
(२) दिदृक्षा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित पदार्थ के देखने हेतु
चक्षुरेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति ।
(३) घ्राणेच्छा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित सुगंधों एवं सुगंधित
पदार्थों की सुगंधों को प्राप्त करने हेतु घ्राणेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति ।
(४) स्पर्शेच्छा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित पदार्थों के स्पर्शों
को प्राप्त करने हेतु त्वगेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधानशक्ति ।
(५) स्वादेच्छा होने पर—विश्व के किसी भी दूर से दूर स्थित पदार्थों के स्वाद
ग्रहण करने हेतु रसनेन्द्रिय में तदनुकूल तीव्रावधान शक्ति उत्पन्न कर देता है ।
इसे ही योगशास्त्र में पञ्चतन्मात्र साधना की सिद्धि कहा जाता है । शब्द संवित्,
स्पर्श संवित्, रूप संवित्, रस संवित् एवं गंध संवित् की साधना में सिद्धि होने पर
योगियों में इन विषयों की संवेदना बिना पदार्थों की उपस्थिति के भी हो जाती है ।
यथा—इत्र न होने पर इत्र-गंध, स्वादिष्ट पदार्थ न होने पर भी जीभ में उसका स्वाद आने
लगना आदि-आदि ।
भट्टकल्लट कहते हैं—'नटमल्लप्रेक्षादिषु सोमसूर्योदयं कृत्वा चक्षुरादिष्ववधानेन' ।
नटमल्ल = भाव यह है कि गणिका, नट, मल्ल, दर्शक आदि सभी के अपने समक्ष
विद्यमान रहने पर भी द्रष्टा जिसे देखना चाहता है उसी में स्वरूप का अनुप्रवेश होता है ।
उसी प्रकार द्रष्टा स्वप्नावस्था में भी अपने स्वभाव में स्थित रहकर हृदय में स्थित अभीष्ट
पदार्थों को देखता है। क्योंकि आत्मसंवित् इच्छा का अतिक्रमण नहीं करती—'प्रणयस्या
नतिक्रमात्' (स्पन्द का० ३४)।
यथेच्छाभ्यर्थितो = अभ्यर्थना (याचना) शब्दों के माध्यम से व्यक्त की जाती है।
किन्तु यह अभ्यर्थनाभिव्यक्ति शब्दवृत्ति के माध्यम से नहीं प्रत्युत (शब्दानभिव्यक्त) मात्र
हृदय में इच्छा के माध्यम से व्यक्त होने पर भी उसे अभ्यर्थना मान लिया जाता है अर्थात्
भले योगी किसी पदार्थ को न माँगे किन्तु यदि वह उसकी इच्छा मात्र कर ले तो भी
धाता उसे उसकी अभ्यर्थना (याचना) मानकर उसे पूरा कर देता है—
'सोमसूर्योदयं कृत्वा' (१) वाक्य के सोम-सूर्य को भट्टकल्लट ने चक्षु क्यों
कहा? कारण यह है कि—'चक्षोः सूर्योऽजायत्' आँखों से सूर्य की उत्पत्ति हुई है अतः
'सूर्य' चक्षु के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त मान लिया गया।
(२) अगली कारिका में 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये' शब्द का प्रयोग किया गया है।
'मध्य' सुषुम्णा नाड़ी को कहते हैं। योगी के प्राण एवं अपान इसमें प्रवेश करते ही
निरुद्ध हो जाते हैं—इड़ा पिंगला का प्रवाह रुक जाता है—सुषुम्णा में प्राण प्रवाह होने
लगता है और ऊर्ध्वपथ से जाते जाते यह प्राणापान निरुद्ध हो जाता है।
इन्हीं दृष्टियों से रामकण्ठाचार्य ने (स्पन्द का०वि०) में—'चक्षुषोरुदयं कृत्वा—
इति उपलक्षणमात्रमेतत् मन्तव्यम्' कहा है और इसकी व्याख्या इस प्रकार की है—
'सोमसूर्ययोः चक्षुषोः उदयम् अभिप्रेतार्थावधारणामात्रावधानरूपस्वरूपप्रथनं विधाय
—इति उपमानवाक्यम्'।
स्पन्दप्रदीपिकार उत्पलाचार्य ने 'सोमसूर्य' को प्राणापान का द्योतक माना है—
'सोमसूर्ययोरपानप्राणयोश्चक्षुषोश्च उदयं कृत्वा—चक्षुरादिष्ववधानेन इत्यर्थः ॥'
निष्कर्ष—भट्टकल्लट के 'अनेकार्थसन्निधाने—नटमल प्रेक्षादिषु' की व्याख्या को
ध्यान में रखकर स्पन्दप्रदीपिकाकार भी कहते हैं—'अनेकार्थसन्निधानेपि गणिका नट-
मल्लप्रेक्षाकादिषु मध्याद्यदेव वस्त्वभिमतं तदेव यथा पश्यति—स्वरूपानुप्रवेशात्।'
'जाग्रत्येव निजभावाप्त्या स्वातन्त्र्यं तथा स्वप्नेऽप्यस्तीति वक्तुमाह ... यथेच्छा-
भ्यर्थितो ... प्रकाशयेत् ॥ (स्पन्द प्र०)
'स्वबलावष्टम्भात्' हृदिस्थितान् अभिमतानर्थान् पदार्थान् सम्पादयति प्रकाशयति ॥
'स्वप्नेऽप्यभीष्टानेवार्थान् ॥ मध्ये हृदि स्वस्वभावे स्थितः सन् स्फुटतरं कृत्वा सदैव
प्रकाशयति दर्शयति कुतः? प्रणस्येच्छाभ्यर्थनाया अनतिक्रमात् अत्यागात् ॥'
प्राणी प्रथमतः इच्छा करता है फिर कहता है (प्रार्थना करता है—अभीष्टप्राप्त्यर्थ
वाणी द्वारा उसे व्यक्त करता है) अतः 'इच्छावस्था संसारिणः परकारणाभेदरूपा।
परमेश्वर एव स्वतन्त्रों यथेष्टमिदमखिलं प्रकाशयति—इति परमार्थ तदीयमायाशक्ति-
जनितदेहादि व्यवच्छेदाः संसारिणो न प्रपद्यन्ते ॥ (रामकण्ठाचार्य)।
मध्ये (रामकण्ठ की दृष्टि में) = हृदय में। मध्ये = हृदि स्वस्वभावे (उत्पल) ॥
मध्ये—हृदयं (भट्टकल्लट) ॥
तृतीयः निष्यन्दः ३१५
वैसे 'मध्य' का अर्थ सुषुम्णा भी होता है।
अभ्यर्थना—यो यः कश्चित्, संसारी यमेवार्थं द्रष्टुमुत्प्रेक्ष्छो भवति, स तद्दिदृक्षा-
वस्थायां झगित्युवश एवं परमात्मानं धातारमभेदेन आविशति, सा अवस्था अस्य प्रार्थना
(रामकण्ठाचार्य) ॥
स्वप्न स्वातन्त्र्य—जो योगी मध्यमार्ग (सुषुम्णा) में 'हृदय' (स्पन्द तत्त्व = संवित्
तत्त्व) की निरन्तर सुस्पष्ट अनुभूति प्राप्त करते रहते हैं उनकी इस अवस्था को 'स्वप्न-
स्वातन्त्र्य' कहते हैं। योगी के हृदय पर से तमोगुण का आच्छादन दूर हो जाता है। इस
'स्वातन्त्र्य' के भी तीन प्रकार हैं—(१) 'जाग्रत स्वातन्त्र्य' (२) 'स्वप्न स्वातंत्र्य' और
(३) 'सुषुप्ति स्वातन्त्र्य' : 'स्वप्नेन सौषुप्तमत्युपलक्षितम्' (स्प० नि०) ।
योगी के स्वरूपस्थित न रहने के परिणाम—
अन्यथा तु स्वतन्त्रा स्यात् सृष्टिस्तद्धर्मकत्वतः ।
सततं लौकिकस्येव जाग्रत्स्वप्नपदद्वये ॥ ३५ ॥
नहीं तो (स्वस्वरूप का साक्षात्कार कर लेने के अनन्तर अपने स्वरूप में अविचल
रूप से स्थिर न रहा जा सका तो) ('उसके अर्थात् योगी की) जाग्रत एवं स्वप्न दोनों
अवस्थाओं में सांसारिक प्राणियों की ही भाँति निरन्तर स्वतन्त्र रूप से भावों की सृष्टि
चलती रहती है—क्योंकि स्वातन्त्र्यपूर्वक भावों की निरन्तर सर्जना करते रहना 'उसका'
(स्पन्द शक्ति का अपना) धर्म है ॥ ३५ ॥
- सरोजिनी *
अन्यथा = स्वरूपस्थिति के अभाव में (भट्टकल्लट)—आत्मस्वरूप का
साक्षात्कार हो जाने के अनन्तर भी यदि योगी अपने निश्चल, नित्य, चिद्रूप आत्मस्वरूप
में स्थिर न रह सके तो इस स्थिति के अभाव में । सृष्टि = आलविड़ालदर्शनरूपा सृष्टि
(भट्टकल्लट), विचारों और दृश्यों का सर्जन कल्पनाओं की सृष्टि ।
सृष्टि स्वतन्त्रा स्यात् = (स्वरूप में निश्चल अवस्थान के अभाव में) योगी की
जाग्रत्-स्वप्न दोनों अवस्थाओं में आलविड़ालदर्शनरूपा (असंगत) भावसृष्टि निरन्तर
स्वतन्त्र रूप में चलती रहती है। 'सृष्टि' = जाग्रत् एवं स्वप्न की अवस्थाओं में मन के
भावों की सर्जना, कल्पनाओं, भावनाओं एवं विचारों का असंगत प्रवाह (सृष्टि) ।
तद्धर्मकत्वतः = उसके उस प्रकार के धर्म वाला होने के कारण अर्थात् चूँकि
स्पन्द शक्ति का यह अविचल धर्म या स्वभाव ही है इसलिए । लौकिकस्येव—
सांसारिक प्राणियों की भाँति ही । जाग्रत्स्वप्नपदद्वये = जाग्रतावस्था एवं स्वप्नावस्था
दोनों में 'धर्म' = सृष्टिस्वभाव, प्रसवधर्म (भट्टकल्लट) ।
सततं = निरन्तर ।
अन्यथा योगी एक सामान्य व्यक्ति के समान जाग्रत् एवं स्वप्नावस्थाओं में सदैव
सृष्टि का विषय (Subject of creation) बना रहेगा क्योंकि सृष्टि स्वतन्त्र है क्योंकि वह
३१६ स्पन्दकारिका
जाग्रत एवं स्वप्न में स्वातन्त्र के लक्षण से उपहित है । यदि पूर्वोक्त रीति से धाता सदैव
आराधित नहीं हो पाता तो अपने आन्तर स्वरूप की अभिव्यक्ति का अभाव होने के कारण
यह योगी जाग्रत एवं स्वप्न दोनों अवस्थाओं में सदैव एक अति सामान्य लौकिक व्यक्ति
की भाँति ही होगा और परमात्मा की उस सृष्टि से अधिशासित रहेगा जो कि विश्व की
सामान्य एवं विशिष्ट वस्तुओं के प्रकटीकरण एवं निश्चयीकरण के कार्य में निरत रहती
है ।१ अर्थ यह है कि यह सृष्टि योगी को भी अति प्राकृत व्यक्ति की भाँति फेंक देगी—
सांसारिक जीवन के गर्त में । भगवान् की सृष्टि स्वप्न-जागरादि पद के प्रकाशन से
स्वातन्त्र्यस्वभावा है । इस प्रकार स्वप्न एवं स्वप्न-शून्य स्थिति के उन्मूलन की विवेचना
एवं स्पष्टीकरण करने के उपरान्त ग्रन्थकार यह विवेचन करना चाहता है कि पूर्ण प्रबुद्ध
व्यक्ति स्पन्द तत्त्व में समावेश पाता है । इसी साधन से ज्ञेय पदार्थों का ज्ञान भी होता है ।२
स्वरूप स्थिति न होने पर चित्त की चंचलता के कारण इच्छारूप स्वप्नादि सृष्टि
स्वतन्त्र हो जाएगी । यहाँ स्वतन्त्र होने का अर्थ है—असमञ्जस-असंगत ही दिखाई पड़ना
क्योंकि सृष्टि का स्वभाव ही ऐसा है । तत्त्व का स्वभाव ही है—इच्छाओं का प्रसार ।
जैसे पुरुष की इच्छायें जाग्रत एवं स्वप्न दोनों में ही स्वतन्त्र चलती रहती हैं—वे
अज्ञानजन्य नहीं हैं—संविद् का स्वमत ही है और वे सहस्रों होती हैं—उनका स्वरूप
है—सम्बद्ध एवं असम्बद्ध विकल्प, किन्तु ज्ञानी की स्वाधीन होती है और अज्ञानी की
उच्छृंखला३ । प्राणी स्वप्न में भी अपने अभीष्ट पदार्थों को ही देखता है अन्य को नहीं ।
‘स्वप्नेऽप्यभीष्टार्थानिव पश्यति ॥'
इस प्रकार के समाधि व्युत्थान मात्र से योगी एवं सांसारिक प्राणी एक समान
दृष्टिगोचर होने लगते हैं । नित्ययुक्तता के दृढ़ीकरणार्थ कारिकाकार ‘अन्यथा तु स्वतन्त्रा
स्यात्' वाली कारिका कह रहा है ।
अन्यथा तु = उक्त प्रकार के विपरीत अन्य प्रकार से । सर्वकर्ता, स्वतन्त्र एवं अद्वैत
परमेश्वर की—ममैवेदं जगत्कार्यम्—(‘यह समस्त जगत् मेरा ही कार्य है') इस प्रकार
की प्रतिपत्ति के अभाव के कारण योगी के 'जागृति एवं स्वप्न पद' दोनों तद्धर्मक होने के
कारण, सर्वगुणात्मकता के कारण, नानाभावविनिर्मिति रूपा सृष्टि हुआ करती है ।
आत्मसंवित् से आविर्भूत होने के कारण स्वातन्त्र्यशक्ति या तदुत्पन्न नियति (सृष्टि)
स्वतन्त्र हैं । जब तक कि साधक अपने को स्वतन्त्रकर्ता, सर्वप्रभु, विभु एवं आत्मस्वरूप
मानकर सृष्टि को अपनी शक्ति समझकर उसका परामर्शन नहीं करता तब तक यह इस
प्रकार अपरामृश्यमाना होने के कारण विचित्र विभ्र उत्पन्न करने में समर्थ रहती है तथा
दुर्निवार रूप में उस सामर्थ्य का विस्तार करती रहती है ।
लौकिकस्येवं—सांसारिक प्राणियों की भाँति ।
सारांश यह है कि—जागरावस्था एवं स्वप्नावस्था दोनों सर्गस्वभावा हैं । वहाँ
ज्ञानज्ञेयभाव से पारमेश्वरी शक्ति की ही स्थिति प्रतिपादित की गई है । उस इस द्वयात्मक
१-२. स्पन्दनिर्णय । ३. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३१७
पदद्वय में जो योगी यथोक्त संवित्ति में समाधान (एकाग्रता, ब्रह्म में मन को लगाना) के
अपरित्याग से जो उत्थित हुआ हो उस सर्वथा स्वतन्त्र, सर्वकर्ता स्वात्मा में सुव्यवस्थित
योगी के लिए सृष्टिस्वभाव रूप पदद्वय (जागृति-स्वप्न) शक्ति को प्रतिबंधित नहीं करता
जो व्यक्ति इससे विपरीत अर्थात् 'अन्यथा' जीवन बिताता है तब सांसारिक प्राणियों की
भाँति आत्मगत भावसृष्टि के द्वारा परवश बन जाते हैं- 'लोकवन्निजयेव भावसृष्ट्या पर
वशीक्रियते ।।' इसीलिए कहा गया है-
'अन्यथा स्वरूपस्थित्यभावे' ।१
भट्टकल्लट स्पन्दकारिकावृत्ति में इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं- 'अन्यथा तु
स्वरूपस्थित्यभावे स्वतन्त्रा स्यात् स्वप्ने आलम्बिडालदर्शनरूपा सृष्टिः, यस्मात् तत्तत्त्व
सृष्टिस्वभावं प्रसवधर्मत्वात् यथा सततं सर्वस्य लोकस्य जाग्रद्वृत्तौ स्वप्नावस्थायां च
सम्बन्धा सम्बन्धविकल्पाः ।।'२
स्वबल का महत्व-
यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि ।
भूयः स्फुटतरो भाति स्वबलोद्योगभावितः ॥ ३६ ॥
यथा यत् परमार्थेन येन यत्र सदा स्थितम् ।
तत्तथा बलमाक्रम्य न चिरात् सम्प्रवर्तते ॥ ३७ ॥
जिस प्रकार किसी व्यक्ति को कोई दूर देश-स्थित पदार्थ, चित्त के सावधान होने
पर भी, प्रथम दृष्टि में स्पष्टतया दृष्टिगत नहीं होता है, किन्तु आत्मबल का प्रयोग करके
देखने पर उसको वही पदार्थ सुस्पष्ट रूप में दृष्टिगत होने लगता है । उसी प्रकार योगी के
लिए स्पन्दात्मक आत्मबल पर आरूढ़ होने की स्थिति में, स्वल्प समयावधि में ही
समस्त पदार्थ, जो जिस समय, जिस देश और जिस आकार-प्रकार में विद्यमान हों, ठीक
उसी अवस्था में बोध का विषय बन जाते हैं ॥ ३६-३७ ॥
- सरोजिनी *
अर्थोऽस्फुटो = दूरस्थित अस्पष्ट कोई पदार्थ, स्वबलोद्योग = प्रयत्नविशेष ।
बलमाक्रम्य = स्वबलं स्वस्वरूप का आश्रय लेकर । अचिरेण = बिना बिलम्ब के
सामान्य व्यक्ति एवं योगी की तुलना की गई है ।
जिस प्रकार यदि कोई व्यक्ति किसी पदार्थ को प्रथम दृष्ट्या देखता है तो उसे वह
अस्पष्ट दिखाई पड़ता है किन्तु विशेष प्रयत्न करने पर वह उसे सुस्पष्ट दिखाई पड़ने
लगता है । उसी प्रकार यदि योगी भी आत्मबल का प्रयोग करता है तो उसे स्वल्प काल में
ही उन पदार्थों का ज्ञान हो जाता है । आक्रम्य = अपनी आत्मा में विलय कर लेने पर ।
यत्र = जहाँ शङ्करात्मा स्वस्वभाव में । आक्रम्य = पकड़कर ।
यथा = जिस प्रकार । अभेद व्याप्ति के द्वारा ।
१. रामकण्ठाचार्य- 'स्पन्दविवृति' । २. भट्टकल्लट- 'स्पन्दसर्वस्व' ।
३१८ स्पन्दकारिका
स्वबलोद्योगेन = अन्तर्मुखतदेकात्मता परिशीलन प्रयत्न द्वारा ।
प्रवर्तते = अभिव्यक्त होता है । अचिरात् = शीघ्र ही । हि = निश्चय ही ।
परमार्थेन = आनन्दघनरूप से ।
जिस प्रकार वही वस्तु पूर्ण एकाग्रता पूर्वक मनन किये जाने पर भी इसके पूर्व
अस्पष्ट रूप में समझ में आती थी—अपनी निजी शक्ति के बल से देखी जाने पर
सुस्पष्टतया दृष्टिगोचर होने लगती है । इसी प्रकार प्राणशक्ति पर अधिकार कर लेने पर
उस वस्तु की वस्तुता उसी सत्ता के द्वारा, उसी स्थान में जिसमें कि वह रहती है—
तत्काल अभिव्यक्त हो जाती है ।
वस्तु के वस्तुत्व का सम्यक् यथार्थ ज्ञान कैसे हो? इसी के उत्तर में ग्रन्थकार
कहता है—‘यथा ह्यर्थोऽस्फुटो .... सम्प्रवर्तते ।'
यथा दूरत्वादि दोषों के कारण अस्फुट (अस्पष्ट) रूप में दिखाई पड़ने वाली
वस्तु पुनः अध्यक्ष निरीक्षण द्वारा स्वबलोद्योग से भावित पूर्णावलोकित होने पर स्फुटतर
(सुस्पष्ट) दृष्टिगोचर होती है वह स्पन्दततत्त्वात्मक बल है जिसके द्वारा आनन्दघन शङ्क-
रात्मा स्वस्वभाव में, व्याप्त होकर परिशीलन प्रयत्न द्वारा स्फुटतापूर्वक अभिव्यक्त होता है ।
मानसिक अवधान के बाद भी कोई वस्तु दूर होने के कारण अस्पष्ट दिखाई पड़ती
है किन्तु अपनी दर्शन-शक्ति से सूक्ष्मतापूर्वक देखी जाने पर वही वस्तु सुस्पष्ट रूप में
दृष्टिगत होने लगती है । इसी प्रकार वह स्पन्द तत्त्व की प्राणशक्ति (Vital power)
स्पन्दतत्त्वात्मक बल जो कि अपने निजी स्वरूप के साथ अभिन्न रूप से स्थित है
आनन्दघन शङ्कर के साथ अद्वैतभाव से स्थित है—ज्यादा सुस्पष्ट रूप में व्यक्त होता है ।
किन्तु यह तभी होता है जबकि ध्यानावस्था में परमसत्य के साथ ऐकात्म्य प्राप्त कर
लिया जाय ।
कृत्रिम ज्ञातृत्व की भूमि का विलय कर लेने पर योगी जो भी चाहता है वह पदार्थ
तत्काल उपस्थित हो जाता है ।
आक्रम्य = आराधक द्वारा अपनी कल्पित देहादिक प्रमातृभूमि को अपने में
निमग्न या लीन करके । 'स्पन्दात्मकं बलं आक्रम्य' ।
स्पन्दात्मक बल को अर्जित कर लेने पर योगी के समस्त जिज्ञास्य समक्ष प्रकट
होते हैं । कर्तृत्व शक्ति केवल इस स्पन्दात्मक बल के माध्यम से ही अपने को व्यक्त
करती है ।
आत्मा की विभूतियों में स्वातन्त्र्य की युक्ति का निरूपण करके अब ज्ञातृत्व और
कर्तृत्व-सामर्थ्य की युक्ति बतलाते हैं । उनसे सूक्ष्म और व्यवहित आदि में ज्ञातृत्व की
युक्ति कारिका ३६-३७ में बताई गई है ।
जैसे दूरस्थित घट पट आदि कोई पदार्थ अस्पष्ट, संदिग्ध दृष्टिगत होता है किन्तु
चित्त को सावधान करके दूसरी ओर से हटाकर अपने प्रयत्न विशेष से विचार करने पर
जिस समय दिखाई पड़ती है—विशेष प्रयास के अनन्तर दृष्टिगोचर होती है—विकसित